झारखंड के बोकारो में सामने आए वन भूमि घोटाले को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने राज्य सरकार और जांच एजेंसियों पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि इस मामले में संगठित भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें उजागर हो रही हैं।
ईडी की जांच में बड़ा खुलासा
प्रवक्ता के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा दायर हलफनामे में 500 करोड़ रुपये से अधिक की मनी लॉन्ड्रिंग का खुलासा हुआ है। यह दर्शाता है कि मामला केवल साधारण अनियमितता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक अपराध है।
ईडी की जांच में शेल कंपनियों, प्रभावशाली खरीदारों और बिचौलियों के जरिए वन भूमि की अवैध खरीद-फरोख्त का नेटवर्क सामने आया है। इसमें कई स्तरों पर संगठित गिरोह के सक्रिय होने की बात कही जा रही है।
सीआईडी की जांच पर उठे सवाल
Criminal Investigation Department (CID) की जांच को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं। प्रतुल शाहदेव का आरोप है कि महीनों की जांच के बावजूद सीआईडी केवल कुछ करोड़ रुपये के सीमित लेन-देन तक ही पहुंच सकी, जबकि ईडी ने कम समय में पूरे घोटाले का खुलासा कर दिया।
उन्होंने कहा कि इससे यह संकेत मिलता है कि राज्य की एजेंसियों का इस्तेमाल सच्चाई को दबाने और दोषियों को बचाने के लिए किया जा रहा है।
राजनीतिक बयानबाजी भी तेज
भाजपा नेता ने कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री रामेश्वर उरांव के पुराने बयान का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने स्वयं विधानसभा में कहा था कि जिन मामलों को सरकार लटकाना या भटकाना चाहती है, उन्हें एसीबी और सीआईडी को सौंप दिया जाता है।
बड़े सवाल अब भी कायम
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि 500 करोड़ रुपये के इस कथित घोटाले में जांच का दायरा निचले स्तर के अधिकारियों तक ही क्यों सीमित है। क्या इस मामले में उच्च अधिकारी, राजनीतिक संरक्षण या प्रभावशाली लोग शामिल नहीं हैं?
बोकारो वन भूमि घोटाला अब झारखंड में प्रशासनिक पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में इस मामले की जांच और सियासी बयानबाजी राज्य की राजनीति को और गर्मा सकती है।












