Ranchi: झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में सुबर्णरेखा नदी के किनारे जो खुलासे हो रहे हैं, उन्होंने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया है। मार्च से अप्रैल 2026 के बीच बहरागोड़ा क्षेत्र में लगातार चार बम मिलने की घटनाएं सामने आई हैं। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक बड़े और छिपे हुए इतिहास की ओर इशारा करता है।
पहला बम 17 मार्च 2026 को बालू खनन के दौरान मिला। इसके बाद कुछ ही दिनों में दो और बम बरामद हुए और 16 अप्रैल को चौथा बम मिला। सभी बम एक ही इलाके में 50 से 100 मीटर की दूरी पर पाए गए, जिससे यह शक और गहरा हो गया है कि जमीन के नीचे अभी और भी खतरनाक विस्फोटक दबे हो सकते हैं।
कितना खतरनाक है यह खतरा?
विशेषज्ञों के मुताबिक ये सभी बम अमेरिकी AN-M64 500 पाउंड कैटेगरी के हैं, जिनका वजन करीब 227 किलो होता है। अगर इनमें विस्फोट हो जाए तो 1 से 1.5 किलोमीटर तक भारी तबाही मच सकती है।
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सबसे बड़ी चिंता यह है कि इतने सालों तक जमीन में दबे रहने के कारण ये बम और ज्यादा अस्थिर हो चुके हैं। यही वजह है कि स्थानीय बम निरोधक दस्ते ने सेना की मदद ली और ऑपरेशन चलाकर इन्हें निष्क्रिय किया गया।
क्या है World War 2 कनेक्शन?
इस पूरे रहस्य की जड़ें सीधे
द्वितीय विश्व युद्ध
के दौर से जुड़ी हैं।
पूर्वी सिंहभूम का
चाकुलिया एयरबेस
उस समय एक महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाना था। 1942 में बने इस एयरबेस पर अमेरिकी एयरफोर्स की तैनाती थी और यहीं से B-29 और B-25 जैसे बॉम्बर विमान उड़ान भरते थे।
यानी जहां आज बम मिल रहे हैं, वही इलाका कभी युद्ध की रणनीति का केंद्र हुआ करता था।
आखिर कैसे दबे रह गए ये बम?
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं। युद्ध के दौरान तकनीकी खराबी आने पर पायलट सुरक्षित लैंडिंग के लिए बम गिरा देते थे। ट्रेनिंग के दौरान भी कई बम फटते नहीं थे और जमीन में दब जाते थे।
एक और संभावना यह है कि युद्ध खत्म होने के बाद बचे हुए हथियारों को यहीं दफना दिया गया हो।
अब ही क्यों सामने आ रहे हैं ये बम?
80 साल बाद अचानक इन बमों का मिलना कई कारणों से जुड़ा है। गर्मियों में नदी का जल स्तर कम होने से दबे हुए बम सतह के करीब आ जाते हैं। बढ़ते बालू खनन से गहराई तक खुदाई हो रही है, जिससे ये बाहर निकल रहे हैं।
इसके अलावा नदी का कटाव भी जमीन के नीचे दबे इन विस्फोटकों को उजागर कर रहा है।
क्या अभी और खतरा बाकी है?
लगातार एक ही इलाके में कई बम मिलने से यह आशंका बढ़ गई है कि जमीन के नीचे और भी विस्फोटक मौजूद हो सकते हैं। स्थानीय लोग प्रशासन से पूरे इलाके का सर्वे कराने और सुरक्षा बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।
दुनिया में भी मिलता है ऐसा खतरा
यह समस्या सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं है। जर्मनी, फ्रांस और बेल्जियम जैसे देशों में आज भी
World War 2
के बम मिलते रहते हैं और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए विशेष सिस्टम मौजूद है।
अगर आपको ऐसा बम दिखे तो क्या करें?
किसी भी संदिग्ध धातु वस्तु को छूना या हटाना बेहद खतरनाक हो सकता है। तुरंत पुलिस या प्रशासन को सूचना देना ही सबसे सुरक्षित कदम है।
जमीन के नीचे छिपा है खौफनाक इतिहास
झारखंड में मिल रहे ये बम सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक चेतावनी हैं कि इतिहास कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता।
World War 2 के निशान आज भी जमीन के नीचे जिंदा हैं—और अब धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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