Naxal Story: देश में 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद के खात्मे का ऐलान गृह मंत्री अमित शाह ने किया था। इस घोषणा के बाद यह दावा भी किया गया कि देश के अधिकांश हिस्से नक्सल मुक्त हो चुके हैं। लेकिन आज 5 मई 2026 है, यानी तय डेडलाइन को एक महीने से अधिक समय बीत चुका है, फिर भी झारखंड का सारंडा इलाका अब भी इस अभियान के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जहां देश के अन्य हिस्सों में यह मिशन सफल होता दिख रहा है, वहीं सारंडा में यह क्यों अटका हुआ है।
Naxal Story: छत्तीसगढ़ में हकीकत में बदलता दिख रहा अभियान
खबर में आगे बढ़ने से पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार विकास तिवारी का बयान जो काफी चर्चा में रहा, वो आपको बताना चाहता हूं। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि सरकार द्वारा तय की गई 31 मार्च 2026 की डेडलाइन शुरुआत में नामुमकिन लग रही थी, लेकिन अब यह देखकर आश्चर्य होता है कि यह लक्ष्य धीरे-धीरे हकीकत में बदलता दिख रहा है। देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों ने नक्सलवाद के खिलाफ अभियान में बहुत हद तक सफलता हासिल की है।
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अप्रैल महीने में दो बार हुआ मुठभेड़
लेकिन झारखंड के घटनाक्रम पर नजर डालें तो अप्रैल महीने में सारंडा क्षेत्र में सुरक्षा बलों और एक करोड़ के इनामी नक्सली नेता मिसिर बेसरा के दस्ते के बीच दो बार मुठभेड़ हुई। इन मुठभेड़ों में सुरक्षा बल के छह जवान गंभीर रूप से घायल हुए, जबकि एक लाख के इनामी नक्सली इजराइल को मार गिराया गया। यह घटनाएं साफ संकेत देती हैं कि इलाके में नक्सलियों की सक्रियता अब भी बरकरार है।
नक्सलबाड़ी से बस्तर तक नक्सली शांत
वहीं अगर नक्सलवाद के इतिहास पर गौर करें तो इसकी शुरुआत नक्सलबाड़ी में हुई थी, जो अब शांत हो चुका है। वहीं छत्तीसगढ़, जो कभी नक्सल प्रभावित राज्यों में सबसे ऊपर गिना जाता था, अब काफी हद तक इस समस्या से उबर चुका है। वहां कई कुख्यात नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में वापसी की है। इसके उलट झारखंड अब भी इस चुनौती से पूरी तरह नहीं निपट पाया है।
सारंडा की भौगोलिक स्थित है सबसे बड़ी चुनौती
इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण सारंडा की भौगोलिक स्थिति है। एशिया के सबसे घने साल जंगलों में गिना जाने वाला यह क्षेत्र नक्सलियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बना हुआ है। यहां भारी मात्रा में लौह अयस्क मौजूद है, जिसके कारण सुरक्षा बलों के मेटल डिटेक्टर तक प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाते। यही वजह है कि नक्सलियों द्वारा बिछाए गए आईईडी का पता लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है, जिससे जवानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
झारखंड की आत्मसमर्पण नीति है दूसरा बड़ा कारण
दूसरा बड़ा कारण झारखंड की आत्मसमर्पण नीति को भी माना जा रहा है। जहां छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना जैसे राज्यों में नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए लचीली और प्रोत्साहन आधारित नीतियां अपनाई गई हैं, वहीं झारखंड में अपेक्षाकृत सख्त प्रावधान हैं। यहां आत्मसमर्पण के बाद भी जेल या ओपन जेल में रहने की व्यवस्था है, जबकि अन्य राज्यों में सीधे पुनर्वास और रोजगार से जोड़ने पर जोर दिया जाता है। यही वजह है कि झारखंड में नक्सलियों के आत्मसमर्पण की संख्या अपेक्षा से कम है।
बेसरा और मंडल अपने 45 दस्ते के साथ है सक्रिय
इसके अलावा छत्तीसगढ़ में सरकार और प्रशासन ने संवाद की रणनीति अपनाई, जहां गृहमंत्री ने बातचीत कर नक्सलियों को आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया गया। लेकिन झारखंड में इस तरह की पहल नजर नहीं आती है। वर्तमान में सारंडा क्षेत्र में मिसिर बेसरा और असीम मंडल जैसे कुख्यात नक्सली नेताओं के साथ 45 से अधिक सशस्त्र दस्ते सक्रिय बताए जाते हैं।
सुरक्षा बल लगातार अभियान चला रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद सारंडा अब भी एक अभेद किले की तरह बना हुआ है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आखिर कब तक यह इलाका पूरी तरह नक्सल मुक्त हो पाता है।

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