Ranchi: राजधानी रांची में शुक्रवार को ‘अबुआ अधिकार मंच’ के तत्वावधान में आयोजित ‘सेमिनार सह साझा संवाद’ कार्यक्रम में पर्यावरण और जल संकट को लेकर गंभीर मंथन हुआ। होटल बीएनआर चाणक्या में आयोजित इस कार्यक्रम में केंद्रीय कोयला राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे और ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह ने शिरकत की। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि झारखंड ने अपने जल प्रबंधन और विकास के मॉडल को नहीं बदला, तो राज्य भविष्य में एक भयावह संकट की ओर बढ़ जाएगा।
विकास का ‘विनाशकारी’ मॉडल और सूखता झारखंड
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने बेहद चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि झारखंड का 60 फीसदी भूजल भंडार खाली हो चुका है। राजेंद्र सिंह ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि वर्तमान ‘डेवलपमेंट मॉडल’ दरअसल ‘विनाश का मॉडल’ है। झारखंड उन 17 राज्यों की श्रेणी में आ गया है, जो बाढ़ और सुखाड़ की दोहरी मार झेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमें संविधान के अनुरूप प्रकृति का संरक्षण करना होगा और ‘सनातन विकास मॉडल’ को अपनाना होगा।
केंद्रीय मंत्री का बड़ा ऐलान: बंद खदानों की जमीन रैयतों को मिलेगी
मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद केंद्रीय मंत्री सतीश चंद्र दुबे ने कोयला क्षेत्र और पर्यावरण के बीच संतुलन पर जोर दिया। उन्होंने एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि 147 कोल खदानें, जो बंद पड़ी हैं, उन्हें स्थायी रूप से बंद करने का निर्णय लिया गया है। इसके बाद सेल्फ-हेल्प ग्रुप (SHG) बनाकर वह जमीन उन रैयतों को सुपुर्द की जाएगी, जिन्होंने खदानों के लिए जमीन दी थी। मंत्री ने विदेशी प्रजाति के पौधों को लगाने से परहेज करने और स्थानीय फलदार वृक्ष जैसे आम और कटहल लगाने की सलाह दी।
बारिश का पानी रोकना ही होगा: राजेंद्र सिंह का मंत्र
राजेंद्र सिंह ने राजस्थान के अनुभव साझा करते हुए कहा कि बिना सरकारी मदद के उन्होंने 15,800 बांध बनाए। उन्होंने झारखंड के लिए सुझाव दिया:
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मिट्टी और पत्थरों से स्थानीय स्तर पर बांध बनाएं।
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‘पानी पंचायतों’ का गठन करें ताकि नदियों और खेतों तक पानी पहुंचे।
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विकास की चर्चा में प्रकृति को केंद्र में रखें, न कि सिर्फ आर्थिक इंफ्रास्ट्रक्चर को।
युवाओं और विशेषज्ञों का साझा मंच
अबुआ अधिकार मंच के संस्थापक वेदांत कौस्ताव ने बताया कि मंच का उद्देश्य विशेषज्ञों के विचारों को युवाओं तक पहुंचाना और पर्यावरण संरक्षण के लिए आंदोलन खड़ा करना है। सेमिनार में स्वामी भवेशानंद, पीके दीक्षित, और रांची विश्वविद्यालय की कुलपति समेत कई गणमान्य लोगों ने अपने विचार रखे। इस अवसर पर एक स्मारिका का विमोचन भी किया गया और रांची की मरती नदियों पर एक शॉर्ट फिल्म दिखाई गई।









