Jharkhand News: Jharkhand का सबसे घना, खतरनाक और लाल आतंक का सबसे सुरक्षित माने जानेवाला गढ़ Saranda अब पूरी तरह से नक्सल मुक्त हो गया है। आज की तारीख में वहां एक भी नक्सली मौजूद नहीं हैं। एक समय था, जब वहां सैकड़ों की संख्या में नक्सली अपने को सुरक्षित महसूस करते थे। चार – पांच राज्यों के नक्सली संगठन और उनके पोलित ब्यूरो सदस्य बेखौफ बैठक कर नक्सली हिंसा की रणनीतियाँ बनाया करते थे। उनमें से अधिकांश को केंद्रीय और राज्य सुरक्षा बलों ने विभिन्न मुठभेड़ों में ढेर कर दिया। जो बचे हैं, उन्हें वहां से खदेड़ दिया गया है। जानकारी के अनुसार एक करोड़ के इनामी नक्सली मिसिर बेसरा के साथ कुल 15 नक्सली अब भी बचे हुए हैं, जो Saranda का इलाका छोड़ भागे भागे फिर रहे हैं। केंद्रीय सुरक्षा बलों ने जो नकेल कसा है और घेराबंदी की है, उससे वे ज्यादा दिनों तक लुका छुपी का खेल नहीं खेल सकते हैं। सूचना है कि मिसिर बेसरा और असीम मंडल के साथ बचा हुआ 15 सदस्यीय नक्सली दस्ता जल्द ही मुख्यधारा में वापस लौटेगा, आत्मसमर्पण को मजबूर होगा अथवा केंद्रीय बलों द्वारा उनका भी वही अंजाम होगा, जो पूर्ववर्ती नक्सलियों का हुआ है।
दरअसल नक्सलियों के बढ़ते आतंक और हिंसा को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश को नक्सलमुक्त करने की ठानी। इसके लिए उन्होंने केंद्रीय सुरक्षा बलों को 31 मार्च 2026 तक का डेडलाइन दिया। इस दौरान केंद्रीय सुरक्षा बल के डीजीपी और आईजी ऑपरेशन साकेत सिंह के नेतृत्व में विभिन्न राज्यों के साथ मिलकर नक्सलियों के खिलाफ ज्वाइंट ऑपरेशन चलाया। झारखंड में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल को कोबरा बटालियन, झारखंड जगुआर और झारखंड पुलिस का साथ मिला।नक्सलियों का झारखंड से सटे चार राज्यों में खासा प्रभाव था और सारंडा उनमें से सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जाता था। इस पूरे अभियान को ऑपरेशन नवजीवन का नाम दिया गया।
आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) नष्ट करना बड़ी चुनौती
सारंडा से नक्सली तो भाग गए हैं, लेकिन आईईडी का खतरा वहां आज भी विद्यमान है और यह केंद्रीय बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। आईईडी को हिंदी में तात्कालिक विस्फोटक उपकरण भी कहा जाता है। जब हमारी टीम सारंडा के लिए निकली तो अधिकारियों ने साफ तौर पर हिदायत दी कि जो मुख्य पथ है, सिर्फ उसी का इस्तेमाल करना है। इसके अलावा कोई भी रास्ता अथवा पगडंडी का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना है। हमने उनके निर्देश का पूरा पालन किया। दरअसल केंद्रीय बलों के आक्रामक एक्शन के बाद नक्सलियों को यह समझ में आ गया कि अब सारंडा उनके लिए मुफीद स्थान नहीं रह गया है, तो जाते जाते उन्होंने केंद्रीय बलों के जवानों को क्षति पहुंचाने के उद्देश्य से जगह जगह काफी संख्या में आईईडी विस्फोटक को प्लांट कर दिया। नक्सली तो सारंडा से भाग गए, लेकिन आज ये केंद्रीय बलों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। जवानो को एसआरपी और एलआरपी पेट्रोलिंग में काफी एहतियात बरतना पड़ता है।
नक्सलियों के खौफ से माँ ने घर में ही बच्ची की लाश छुपाये रखा
ग्रामीणों में नक्सलियों का खौफ ऐसा था कि एक मां ने खून से लथ पथ अपने आठ साल की बच्ची की लाश को अपने ही घर के अंदर में छुपा कर रखा। सात जनवरी 2025 को आठ साल की बच्ची सनियारो गागराई आईईडी ब्लास्ट में मारी गई। वो पत्ता चुनने जंगल की तरफ गई थी। घटना स्थल के करीब पांच ग्रामीण मौजूद थे। ब्लास्ट में सनियारो की घटना स्थल पर ही मौत हो गई। वहीं आसपास नक्सली भी मौजूद थे। विस्फोट की आवाज सुनने के बाद कुछ ग्रामीण वहां पहुंचे और सनियारो की लाश को उठाकर घर ले आई। पीछे पीछे नक्सली भी आ धमके और सनियारो की मां को इस घटना की जानकारी केंद्रीय बल को नहीं देने की नसीहत दी और इसके बदले कुछ पैसे देने का आश्वासन भी दिया। लेकिन सनियारो की मां ने लाश को घर में ही छुपा दिया और नक्सलियों से कहा कि सनियारो को अस्पताल ले जाया गया है। इस बीच इस घटना की सूचना सीआरपीएफ को लग गई और उसके आने की सूचना पाते ही नक्सली वहां से निकल गए। इसके बाद सीआरपीएफ के जवानों ने न सिर्फ़ सनियारो को दफनाने में मदद की बल्कि इस ब्लास्ट में मारी गई सनियारो के परिजनों को सरकार से मुआवजा भी दिलाया। सनियारो को उसके घर के ही प्रांगण में दफनाया गया, जो आज भी उस घटना की गवाही देता है।









