कहते हैं कि बड़ा बदलाव लाने के लिए उम्र नहीं, बल्कि सोच बड़ी होनी चाहिए। तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले के वाट्रप गांव के रहने वाले तेनिथ आदिथ्या ने कम उम्र में ऐसा ही उदाहरण पेश किया है। महज 15 साल की उम्र में उन्होंने केले के पत्तों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की तकनीक विकसित करने का दावा किया है।
आमतौर पर केले के पत्ते कुछ दिनों में सूखकर खराब हो जाते हैं। लेकिन तेनिथ आदिथ्या की विकसित की गई ‘Banana Leaf Technology’ के जरिए इन पत्तों की उपयोग अवधि को करीब 3 दिन से बढ़ाकर 3 साल तक करने की बात सामने आई है। खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता।
11 साल की उम्र में आया था आइडिया
तेनिथ आदिथ्या के इस आविष्कार की शुरुआत तब हुई, जब वह सिर्फ 11 साल के थे। उन्होंने अपने गांव में किसानों को सूखे केले के पत्तों को जलाते या कचरे में फेंकते देखा।तेनिथ के मन में सवाल उठा कि जिन केले के पत्तों का इस्तेमाल भारतीय परंपरा में भोजन परोसने से लेकर कई दूसरे कामों में होता है, उन्हें बेकार समझकर क्यों फेंक दिया जाता है।
उन्होंने किसानों से इस बारे में जानकारी ली। किसानों ने बताया कि सूख जाने के बाद केले के पत्ते उनके किसी काम के नहीं रहते। यही बात तेनिथ के लिए प्रेरणा बन गई और उन्होंने इन पत्तों को दोबारा उपयोगी बनाने का तरीका खोजने का फैसला किया।
चार साल तक लगातार किया रिसर्च
आइडिया मिलने के बाद तेनिथ ने इसे हकीकत में बदलने के लिए कई वर्षों तक प्रयोग और शोध किया। करीब चार साल तक उन्होंने ऐसी तकनीक विकसित करने पर काम किया, जिससे केले के पत्तों को लंबे समय तक संरक्षित रखा जा सके।उनका लक्ष्य सिर्फ पत्तों की उम्र बढ़ाना नहीं था, बल्कि भविष्य में प्लास्टिक और कागज जैसे पारंपरिक उत्पादों के लिए एक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प तैयार करना भी था। लगातार प्रयोगों के बाद उन्होंने Banana Leaf Technology विकसित की।
3 दिन से 3 साल तक बढ़ाने का दावा
तेनिथ की तकनीक की सबसे बड़ी खासियत केले के पत्तों की उपयोग अवधि बढ़ाना बताई जा रही है। सामान्य परिस्थितियों में केले के पत्ते कुछ दिनों तक ही उपयोगी रहते हैं। उनके मुताबिक, विकसित तकनीक से इन्हें करीब तीन साल तक संरक्षित किया जा सकता है।बताया गया है कि संरक्षण की प्रक्रिया के बाद पत्तियों का प्राकृतिक रंग और उनका उपयोगी स्वरूप भी काफी हद तक बरकरार रहता है।
प्लेट से लेकर कप और बॉक्स तक बनाए जा सकते हैं
इस तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ केले के पत्तों को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है। इन पत्तों से पर्यावरण के अनुकूल कई तरह के उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
इनमें शामिल हैं:
* प्लेट
* कप
* बॉक्स
* लिफाफे
* स्ट्रॉ
* पैकेजिंग से जुड़े उत्पाद
इस तरह केले के पत्तों से बने उत्पाद प्लास्टिक आधारित वस्तुओं का एक प्राकृतिक विकल्प बन सकते हैं।
बेहद कम लागत में तैयार करने का दावा
इस तकनीक की एक और खासियत इसकी कम लागत बताई जाती है। द बेटर इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, एक केले के पत्ते को प्रोसेस करने की लागत करीब 0.01 अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 70 से 75 पैसे बताई गई है।
कम लागत और प्राकृतिक कच्चे माल के कारण इस तकनीक में ग्रामीण इलाकों के किसानों और छोटे उद्यमियों के लिए भी संभावनाएं देखी जा सकती हैं।
पर्यावरण के लिए क्यों अहम है यह तकनीक?
प्लास्टिक और कागज के बढ़ते इस्तेमाल के बीच प्राकृतिक और बायोडिग्रेडेबल विकल्पों की जरूरत लगातार बढ़ रही है। केले के पत्ते आसानी से उपलब्ध होने वाला प्राकृतिक संसाधन हैं, लेकिन जल्दी खराब होने के कारण उनका बड़े स्तर पर इस्तेमाल सीमित रहता है।
अगर इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखकर अलग-अलग उत्पादों में इस्तेमाल किया जा सके, तो यह किसानों के लिए अतिरिक्त आय का जरिया बनने के साथ पर्यावरण पर प्लास्टिक और कागज के दबाव को कम करने में भी मदद कर सकता है।
तेनिथ आदिथ्या को मिल चुके हैं कई सम्मान
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तेनिथ आदिथ्या की इस तकनीक को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार मिल चुके हैं। रिपोर्ट्स में उन्हें सात से अधिक अंतरराष्ट्रीय और दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने का उल्लेख किया गया है।
इन सम्मानों में पर्यावरण, ग्रीन टेक्नोलॉजी और भविष्य की तकनीक से जुड़े पुरस्कार शामिल बताए जाते हैं।
छोटी उम्र, बड़ा सपना
तेनिथ आदिथ्या की कहानी इस बात की मिसाल है कि किसी समस्या को अलग नजरिए से देखने की कोशिश एक बड़े आविष्कार का रास्ता खोल सकती है। किसानों द्वारा बेकार समझे जाने वाले केले के पत्तों से उन्होंने एक उपयोगी और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक विकसित करने की दिशा में काम किया।
अगर इस तकनीक को बड़े स्तर पर व्यावसायिक रूप दिया जाता है, तो आने वाले समय में यह किसानों, पर्यावरण और टिकाऊ उत्पादों के बाजार—तीनों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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