नवरात्रि की शुरुआत होते ही हर घर में पूजा-पाठ, माँ दुर्गा के स्वागत और कलश स्थापना की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। कलश स्थापना के दौरान मिट्टी के बर्तन में जौ बोने की परंपरा बरसों से चली आ रही है। नौ दिन बाद जब ये छोटे-छोटे हरे अंकुर बाहर आते हैं, तो इन्हें देखकर मन खुश हो जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पूजा में जौ बोना इतना ज़रूरी क्यों माना जाता है?
धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार, इसके पीछे छिपे हैं कुछ बेहद ख़ास कारण:
1. सृष्टि का पहला अनाज है ‘जौ’
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब इस ब्रह्मांड की रचना हुई थी, तब धरती पर उगने वाली सबसे पहली फसल जौ ही थी। इसी वजह से हिंदू धर्म में जौ को ‘पूर्ण अनाज’ का दर्जा दिया गया है। किसी भी हवन, पूजा या शुभ कार्य में इसे सबसे पवित्र माना जाता है। नवरात्रि के पावन पर्व पर जौ बोना असल में जीवन की नई शुरुआत और अन्नपूर्णा स्वरूप माँ दुर्गा के प्रति आभार व्यक्त करने का एक तरीक़ा है।
2. जौ के अंकुर देते हैं भविष्य का संकेत
पुरानी लोकमान्यताओं की मानें तो जौ के उगने की गति और उसका रंग आपके घर के आने वाले समय की ओर इशारा करता है:
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तेज़ी से उगना और हरा-भरा होना: इसे घर में सुख, समृद्धि और देवी माँ की विशेष कृपा का प्रतीक माना जाता है।
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धीमी ग्रोथ या पीला पड़ना: इसे कई लोग आने वाली चुनौतियों या समस्याओं के संकेत से जोड़कर देखते हैं।
ध्यान दें: अगर आपके जौ कम उगें या पीले पड़ जाएँ तो घबराने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। अक्सर मिट्टी की नमी, पानी की मात्रा या धूप की कमी की वजह से भी ऐसा हो सकता है।
3. पूजा के बाद 9वें दिन क्या करें?
नवरात्रि समाप्त होने के बाद इन ज्वारों (जौ के पौधों) को फेंकना नहीं चाहिए:
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इन्हें प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बाँटा जाता है।
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कई लोग अच्छे भाग्य के लिए इन्हें अपने तिजोरी या पूजा स्थल में रखते हैं।
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बचे हुए ज्वारों को पवित्र नदी या बहते जल में प्रवाहित कर देना चाहिए।

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