Hukka Pati Tradition in Mithila: दिवाली का त्योहार देशभर में दीप जलाकर और माता लक्ष्मी की पूजा करके मनाया जाता है। लेकिन बिहार के मिथिलांचल में दीपावली की रात एक अनोखी लोकपरंपरा निभाई जाती है, जिसे हुक्का-पाती कहा जाता है। इस परंपरा के दौरान लोग जलती हुई हुक्का-पाती लेकर पारंपरिक बोल बोलते हैं-“हुक्का-पाती चल, सुक्रांति लक्ष्मी आवे, दरिद्र भागे।” मान्यता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है और दरिद्रता दूर होती है।
हुक्का-पाती क्या है? कैसे निभाई जाती है यह परंपरा?
हुक्का-पाती मिथिला की पारंपरिक लोकरीति है, जिसे दिवाली की रात लक्ष्मी पूजा के बाद निभाया जाता है। इसे बनाने के लिए सोन या पटुआ के सूखे डंठलों को इकट्ठा करके बांधा जाता है। इससे मशाल जैसी एक आकृति तैयार होती है, जिसे स्थानीय परंपरा में हुक्का-पाती कहा जाता है।
दिवाली की शाम पूजा के बाद इसे जलाया जाता है। इसके बाद परिवार के लोग जलती हुई हुक्का-पाती लेकर घर के अलग-अलग हिस्सों में जाते हैं और पारंपरिक शब्दों का उच्चारण करते हैं। इस दौरान माता लक्ष्मी के स्वागत और घर से दरिद्रता को दूर करने की कामना की जाती है।
‘लक्ष्मी आवे, दरिद्र भागे‘ का क्या है अर्थ?
हुक्का-पाती के दौरान बोली जाने वाली पंक्ति ‘लक्ष्मी आवे, दरिद्र भागे’ का अर्थ है कि घर में माता लक्ष्मी का आगमन हो और अभाव दूर हों।
इस लोकमान्यता में लक्ष्मी को सुख, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है, जबकि दरिद्रता को आर्थिक अभाव और परेशानियों से जोड़कर देखा जाता है। हुक्का-पाती जलाने की परंपरा घर में सकारात्मकता और समृद्धि की कामना से जुड़ी हुई है।
मिथिला के किन इलाकों में मनाई जाती है हुक्का-पाती?
बिहार के मिथिलांचल में हुक्का-पाती की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित मानी जाती है। मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, बेगूसराय और आसपास के ग्रामीण इलाकों में कई परिवार इस लोकपरंपरा को निभाते हैं।
हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में हुक्का-पाती बनाने, जलाने और पारंपरिक बोल बोलने के तरीकों में अंतर देखने को मिल सकता है। यह परंपरा मिथिला की सांस्कृतिक पहचान और लोकविश्वासों से जुड़ी हुई है।
दिवाली पर हुक्का-पाती जलाने का क्या है महत्व?
मिथिला में हुक्का-पाती जलाना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ी लोकपरंपरा है। दीपावली की रात दीपों की रोशनी के बीच इस परंपरा को निभाकर लोग माता लक्ष्मी के स्वागत और घर में खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।
आज भी मिथिलांचल के कई परिवार इस परंपरा को अपनी सांस्कृतिक विरासत के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। हुक्का-पाती मिथिला की उन लोकपरंपराओं में शामिल है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों की सांस्कृतिक स्मृतियों और त्योहारों से जुड़ी रही हैं।
मिथिला की हुक्का-पाती परंपरा दिवाली के उत्सव को एक अलग पहचान देती है। ‘लक्ष्मी आवे, दरिद्र भागे’ के पारंपरिक उद्घोष के साथ निभाई जाने वाली यह लोकरीति घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना का प्रतीक है।
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।









