New Delhi: दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को फिर अहम सुनवाई हुई। कोर्ट के पहले के आदेश — जिसमें आठ सप्ताह के भीतर सड़कों से सभी कुत्तों को हटाकर शेल्टर होम में रखने का निर्देश दिया गया था — पर आज समर्थन और विरोध, दोनों पक्षों से दलीलें सामने आईं।
दिल्ली सरकार की दलील: समस्या का समाधान चाहिए
सुनवाई के दौरान भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जानवरों से नफरत नहीं करता, लेकिन इस समस्या का समाधान बेहद जरूरी है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “मैंने कई लोगों को मांस खाते हुए वीडियो पोस्ट करते और फिर खुद को पशु प्रेमी बताते देखा है।”
चौंकाने वाले आंकड़े: हर साल लाखों मौतें
मेहता ने अदालत को बताया कि देश में हर साल करीब 37 लाख लोग कुत्तों के काटने से मर रहे हैं, यानी रोज़ाना लगभग 10,000 मौतें। रेबीज से अकेले 305 मौतें दर्ज हैं, लेकिन WHO के मॉडल में यह संख्या इससे कहीं अधिक बताई गई है।
एनजीओ की आपत्ति: शेल्टर होम की क्षमता नहीं
एक एनजीओ की ओर से पेश कपिल सिब्बल ने कहा कि वर्तमान में पर्याप्त शेल्टर होम नहीं हैं। जो हैं, वे सभी कुत्तों को रखने में सक्षम नहीं होंगे। उन्होंने मांग की कि जब तक इस मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई न हो, तब तक सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रोक लगाई जाए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: जिम्मेदारी लेनी होगी
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की तीन-सदस्यीय पीठ ने कहा कि स्थानीय अधिकारी अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह नहीं निभा रहे हैं। जस्टिस नाथ ने स्पष्ट किया कि जो लोग हस्तक्षेप के लिए आ रहे हैं, उन्हें भी इस मुद्दे की जिम्मेदारी लेनी होगी।
पृष्ठभूमि: 11 अगस्त का आदेश
11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए दिल्ली-एनसीआर से सभी आवारा कुत्तों को आठ हफ्ते में हटाने का आदेश दिया था। साथ ही, अधिकारियों को निर्देश दिया गया था कि उनके लिए शेल्टर होम बनाएं और उन्हें वापस सड़कों पर न छोड़ें।













