दशहरे के दिन जब ढाक की थाप, शंखध्वनि और जयकारों के बीच मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन के लिए निकलती है, तो मन में एक सवाल उठना स्वाभाविक है-जिस देवी की नौ दिनों तक पूजा-अर्चना की, आखिर उनकी प्रतिमा को जल में प्रवाहित क्यों किया जाता है? क्या यह परंपरा किसी प्राचीन ग्रंथ में लिखी है? और अगर घर के मंदिर में मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित है, तो क्या उसे हमेशा अपने पास रखा जा सकता है?
इन सवालों का उत्तर केवल यह कहकर नहीं दिया जा सकता कि विसर्जन संसार की नश्वरता का प्रतीक है। इसके पीछे पूजा-पद्धतियों, क्षेत्रीय परंपराओं और धार्मिक ग्रंथों का एक लंबा इतिहास है। उपलब्ध स्रोतों की पड़ताल से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है: देवी की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा करने का उल्लेख दुर्गा सप्तशती में मिलता है, लेकिन उसके तेरहवें अध्याय में प्रतिमा-विसर्जन का निर्देश नहीं मिलता। विसर्जन के स्पष्ट संकेत मध्यकालीन पूजा-ग्रंथों में उद्धृत कुछ उपपुराण-परंपराओं से मिलते हैं।
1. क्या दुर्गा सप्तशती में प्रतिमा बनाने और विसर्जन का उल्लेख है?
दुर्गा सप्तशती, जिसे देवी माहात्म्य भी कहा जाता है, मार्कण्डेय पुराण का एक प्रसिद्ध अंश है। इसके तेरहवें अध्याय में राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य की कथा आती है। दोनों देवी के दर्शन के लिए नदी के किनारे तपस्या करते हैं।
इस प्रसंग के श्लोक 10 में कहा गया है कि दोनों ने नदी के तट पर देवी की मिट्टी से बनी प्रतिमा तैयार की और फूल, धूप, अग्नि तथा तर्पण से उनकी पूजा की। इसके बाद के श्लोकों में उनकी आराधना और देवी से वरदान प्राप्त करने का वर्णन है।
संस्कृत में संबंधित पंक्ति है:
तौ तस्मिन् पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम्।
अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः॥
सरल अर्थ: उन दोनों ने नदी के तट पर मिट्टी से देवी की प्रतिमा बनाई और फूल, धूप, अग्नि तथा जल-अर्पण से उनकी पूजा की।
यह प्रसंग मिट्टी की प्रतिमा बनाकर देवी की आराधना का महत्वपूर्ण उदाहरण है। लेकिन एक अंतर समझना जरूरी है-इस अध्याय में यह नहीं बताया गया कि पूजा पूरी होने के बाद उस प्रतिमा का विसर्जन किया गया था। इसलिए इस प्रसंग को दुर्गा विसर्जन का प्रत्यक्ष शास्त्रीय आदेश बताना सही नहीं होगा।
2. फिर मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन करने की परंपरा कहां मिलती है?
इस प्रश्न के उत्तर के लिए मध्यकालीन पूजा-साहित्य को देखना पड़ता है। संस्कृत धर्मशास्त्र और पूजा-पद्धतियों के अध्येता आर. सी. हाज़रा ने अपनी पुस्तक Studies in the Upapuranas में नंदिकेश्वर पुराण और बृहन्नंदिकेश्वर पुराण से जुड़े उद्धरणों का अध्ययन किया है।
हाज़रा के अध्ययन के अनुसार, रघुनंदन के दुर्गापूजातत्त्व में नंदिकेश्वर पुराण के नाम से कुछ श्लोक उद्धृत हैं। इनमें देवी की प्रतिमा को नाव या लोगों के कंधों के सहारे ले जाकर बहते जल में प्रवाहित करने की बात आती है। हाज़रा दशमी तिथि पर प्रतिमा-विसर्जन और उससे जुड़े उत्सव का उल्लेख भी करते हैं। उनके अनुसार, इन ग्रंथों में वर्णित दुर्गापूजा-पद्धति विशेष रूप से बंगाल की परंपरा से जुड़ी है।
यहां एक सावधानी आवश्यक है। नंदिकेश्वर पुराण का पूरा मूल पाठ स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह संदर्भ हाज़रा द्वारा बाद के पूजा-ग्रंथों में उद्धृत श्लोकों के अध्ययन के माध्यम से मिलता है। उनकी पुस्तक का ऑनलाइन पाठ भी कुछ पृष्ठों पर अप्रमाणित OCR के रूप में उपलब्ध है। अतः इस प्रमाण को महत्वपूर्ण द्वितीयक विद्वत संदर्भ के रूप में देखना चाहिए, न कि इस दावे के रूप में कि मूल पुराण का पूरा पाठ आज उपलब्ध है और सीधे जांच लिया गया है।
फिर भी, यह अध्ययन बताता है कि प्रतिमा-विसर्जन केवल आधुनिक जुलूसों की परंपरा नहीं है। इसके संकेत पुराने क्षेत्रीय पूजा-विधि साहित्य में मिलते हैं।
3. क्या हर जगह नौ दिनों तक ही पूजा होती थी?
नवरात्रि का नाम सुनते ही नौ दिनों की पूजा का ध्यान आता है। लेकिन दुर्गा पूजा की सभी ऐतिहासिक विधियों में पूजा की अवधि एक जैसी नहीं रही है।
हाज़रा के अध्ययन में देवीपुराण से जुड़े विवरण का सार मिलता है, जिसमें आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक देवी-पूजन का उल्लेख है। वहीं बृहन्नंदिकेश्वर पुराण से जुड़े उद्धरणों में मिट्टी की प्रतिमा की पूजा सप्तमी से नवमी तक तीन दिनों के लिए बताई गई है।
बंगाल में प्रचलित दुर्गा पूजा का मुख्य सार्वजनिक आयोजन सामान्यतः षष्ठी से दशमी तक चलता है।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि पूजा की अवधि और विधि अलग-अलग धार्मिक तथा क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार बदल सकती है। इसलिए यह कहना कि हर जगह ठीक नौ दिनों की पूजा के बाद ही विसर्जन होना चाहिए, ऐतिहासिक परंपराओं की पूरी विविधता को नहीं दर्शाता।
4. आवाहन और विसर्जन का धार्मिक भाव क्या है?
पूजा-पद्धति में आवाहन का अर्थ है देवी का आदरपूर्वक आह्वान करना और स्थापित प्रतिमा या पूजा-स्थान पर उनकी उपस्थिति की प्रार्थना करना। पूजा के समापन पर उत्तरपूजा तथा विदाई से जुड़े अनुष्ठान किए जाते हैं। जिन परंपराओं में अस्थायी प्रतिमा स्थापित की जाती है, उनमें विसर्जन इसी समापन-विधि का हिस्सा होता है।
इसे केवल मिट्टी की प्रतिमा को पानी में डालने की क्रिया के रूप में देखना अधूरा होगा। भक्त के लिए यह आराधना के एक चरण का समापन और देवी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है।
हालांकि, आवाहन और विसर्जन की सटीक विधि सभी संप्रदायों और पूजा-पद्धतियों में एक जैसी नहीं मानी जा सकती। किसी विशेष मंत्र को किसी पुराण का प्रमाणित मंत्र बताने से पहले उसका मूल ग्रंथ-संदर्भ और पाठ जांचना आवश्यक है। इस लेख के लिए किए गए शोध में प्रचलित “उत्तिष्ठ देवि चण्डेशि…” मंत्र का प्रामाणिक मूल संदर्भ निश्चित नहीं हो सका है। इसलिए उसे किसी खास पुराण का प्रमाणित श्लोक बताकर उद्धृत नहीं किया जा रहा है।
5. क्या घर में मां दुर्गा की मूर्ति हमेशा रख सकते हैं?
यह उन सवालों में से एक है जिनका उत्तर कई परिवार जानना चाहते हैं। उपलब्ध शोध में ऐसा कोई सर्वमान्य शास्त्रीय निषेध नहीं मिला, जिसके आधार पर कहा जा सके कि घर में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थायी रूप से नहीं रखी जा सकती। कई घरों में देवी की धातु, पत्थर या अन्य स्थायी प्रतिमाओं की नियमित पूजा की जाती है।
लेकिन घर में स्थायी प्रतिमा रखना और नवरात्रि के लिए अस्थायी मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करना एक ही बात नहीं है। अलग-अलग पूजा-पद्धतियों में प्रतिष्ठा, दैनिक पूजा, उत्तरपूजा और विसर्जन के नियम अलग हो सकते हैं। कुछ आधुनिक हिंदी कर्मकांड-स्रोत अस्थायी प्रतिमा और स्थायी प्रतिष्ठित प्रतिमा के बीच अंतर बताते हैं, लेकिन इस शोध में उन नियमों के लिए संबंधित मूल संस्कृत श्लोकों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी। इसलिए उन्हें सभी हिंदू परिवारों पर लागू होने वाला सार्वभौमिक नियम नहीं कहा जा सकता।
यदि घर में स्थायी रूप से देवी की प्रतिमा रखनी है, तो अपने परिवार की परंपरा, संप्रदाय और पूजा-विधि के जानकार पुरोहित से सलाह लेना उपयोगी होगा। यदि प्रतिमा नवरात्रि के लिए अस्थायी रूप से स्थापित की गई है, तो उसकी स्थापना और समापन उसी पूजा-पद्धति के अनुसार करना चाहिए जिसका परिवार पालन करता है।
एक जरूरी बात: केवल इस आधार पर कि प्रतिमा घर में रखी है, हर साल उसका विसर्जन अनिवार्य है—ऐसा निष्कर्ष उपलब्ध स्रोतों से नहीं निकलता। इसी तरह, किसी खास आकार की प्रतिमा रखने पर लागू होने वाला कथित नियम भी मूल ग्रंथ-संदर्भ के बिना सार्वभौमिक धार्मिक कानून की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
6. क्या विसर्जन का अर्थ पंचतत्त्व में विलय है?
लोकप्रिय धार्मिक व्याख्याओं में विसर्जन को प्रकृति में लौटने, परिवर्तन स्वीकार करने और संसार की अनित्यता का प्रतीक बताया जाता है। मिट्टी से बनी प्रतिमा का जल में विलय इस भाव को समझाने का एक सहज माध्यम बन सकता है।
लेकिन यहां धार्मिक भावार्थ और ग्रंथ में दिए गए प्रत्यक्ष निर्देश के बीच अंतर करना जरूरी है। इस शोध में ऐसा कोई मूल श्लोक नहीं मिला जो स्पष्ट रूप से कहता हो कि प्रतिमा-विसर्जन का आदेश केवल पंचतत्त्व में विलय का संदेश देने के लिए है।
इसलिए इसे एक अर्थपूर्ण दार्शनिक व्याख्या के रूप में समझना बेहतर है, न कि विसर्जन की परंपरा का एकमात्र प्रमाणित ऐतिहासिक कारण मानना।
7. दुर्गा पूजा की परंपरा कितनी पुरानी है?
दुर्गा पूजा का इतिहास किसी एक समय या एक ही ग्रंथ से नहीं समझा जा सकता। देवी-आराधना, प्रतिमा-पूजन, क्षेत्रीय अनुष्ठान और सार्वजनिक उत्सव अलग-अलग ऐतिहासिक चरणों में विकसित हुए हैं।
मध्यकालीन पूजा-पद्धतियों में दुर्गा पूजा के विस्तृत अनुष्ठानों के संदर्भ मिलते हैं। हाज़रा का अध्ययन यह भी बताता है कि बंगाल की दुर्गा पूजा में प्रयुक्त कुछ विधियों को समझने के लिए नंदिकेश्वर और बृहन्नंदिकेश्वर पुराणों के नाम से उद्धृत सामग्री महत्वपूर्ण है।
सार्वजनिक या सामुदायिक दुर्गा पूजा की शुरुआत को लेकर लोकप्रिय लेखों में 18वीं और 19वीं सदी के विभिन्न आयोजन बताए जाते हैं। हालांकि, इस शोध में उन शुरुआती आयोजनों की तिथियों को स्थापित करने के लिए पर्याप्त अकादमिक स्रोतों का स्वतंत्र मिलान नहीं हो सका। इसलिए किसी एक वर्ष या स्थान को निर्विवाद रूप से सार्वजनिक दुर्गा पूजा की शुरुआत बताना उचित नहीं होगा।
इतिहास को समझने का अधिक विश्वसनीय तरीका यह है कि धार्मिक ग्रंथों में वर्णित पूजा-विधियों, मध्यकालीन निबंधों में उद्धृत नियमों और आधुनिक सार्वजनिक उत्सवों के विकास को अलग-अलग देखा जाए।
मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन धार्मिक आस्था, पूजा-विधि और क्षेत्रीय परंपराओं से जुड़ी एक पुरानी प्रथा है। उपलब्ध स्रोतों के आधार पर तीन बातें विशेष रूप से सामने आती हैं।
पहली, देवी माहात्म्य के तेरहवें अध्याय में राजा सुरथ और समाधि वैश्य द्वारा मिट्टी की देवी-प्रतिमा बनाकर पूजा करने का उल्लेख है, लेकिन उसी प्रसंग में विसर्जन का निर्देश नहीं मिलता। दूसरी, प्रतिमा को बहते जल में प्रवाहित करने के स्पष्ट संकेत नंदिकेश्वर पुराण के नाम से उद्धृत मध्यकालीन पूजा-साहित्य में मिलते हैं, जिसकी जानकारी विद्वान आर. सी. हाज़रा के अध्ययन से प्राप्त होती है। तीसरी, घर में देवी की प्रतिमा स्थायी रूप से रखने पर कोई सार्वभौमिक निषेध इस शोध में प्रमाणित नहीं हुआ; पूजा की विधि परिवार और परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती है।
इसलिए विसर्जन को समझने के लिए केवल एक प्रचलित मान्यता पर निर्भर रहने के बजाय मूल ग्रंथ, ऐतिहासिक पूजा-पद्धतियों और स्थानीय परंपराओं के बीच अंतर करना जरूरी है। आस्था के साथ-साथ स्रोतों के प्रति यह सावधानी भी हमारी धार्मिक विरासत को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. मां दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन क्यों किया जाता है?
अस्थायी प्रतिमा की पूजा के समापन पर विसर्जन कई पूजा-पद्धतियों का हिस्सा है। मध्यकालीन पूजा-साहित्य में दशमी पर देवी-प्रतिमा को बहते जल में प्रवाहित करने के संकेत मिलते हैं।
2. क्या दुर्गा सप्तशती में विसर्जन का आदेश है?
देवी माहात्म्य के तेरहवें अध्याय में मिट्टी की प्रतिमा बनाकर देवी की पूजा का वर्णन है, लेकिन इस प्रसंग में प्रतिमा-विसर्जन का निर्देश नहीं मिलता।
3. क्या घर में मां दुर्गा की मूर्ति हमेशा रख सकते हैं?
इस शोध में घर में स्थायी रूप से देवी की प्रतिमा रखने पर कोई सर्वमान्य शास्त्रीय निषेध प्रमाणित नहीं हुआ। प्रतिमा की स्थापना और पूजा की विधि के लिए अपने परिवार की परंपरा या जानकार पुरोहित से सलाह लें।
4. क्या हर जगह नौ दिनों के बाद ही विसर्जन होता है?
नहीं। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों में अलग-अलग पूजा-अवधियां मिलती हैं। कुछ संदर्भ नौ दिनों के पूजन का सार बताते हैं, जबकि अन्य में सप्तमी से नवमी तक तीन दिनों की पूजा का उल्लेख है।
5. क्या विसर्जन पंचतत्त्व में विलय का प्रतीक है?
यह विसर्जन की एक प्रचलित दार्शनिक व्याख्या है। लेकिन इस शोध में इसे विसर्जन का एकमात्र शास्त्रीय कारण बताने वाला मूल श्लोक नहीं मिला।
- देवी माहात्म्य, अध्याय 13, विशेषकर श्लोक 9–13: Aurobharati — Chapter 13 और Digital Temple of the Divine Mother — Chapter 13।
- R. C. Hazra, Studies in the Upapuranas (1958), अध्याय 8.2, विशेषकर पृष्ठ 467–469: The Brihan-nandikeshvara-purana — अध्ययन। ऑनलाइन पाठ में कुछ पृष्ठों के OCR की अशुद्धियों के बारे में चेतावनी दी गई है; मूल मुद्रित संस्करण से मिलान करना बेहतर होगा।
- R. C. Hazra, Studies in the Upapuranas, देवीपुराण पर चर्चा: Wisdomlib — Studies in the Upapuranas।
- दुर्गा पूजा की क्षेत्रीय परंपरा: Durga Puja — सामान्य संदर्भ। यह सामान्य परिचयात्मक स्रोत है, प्राथमिक ऐतिहासिक प्रमाण नहीं।
देवी माहात्म्य के तेरहवें अध्याय में मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा करने का उल्लेख मिलता है; उसी प्रसंग में विसर्जन का निर्देश नहीं है।

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