पटना: छठ महापर्व आते ही घरों, गलियों और घाटों पर पारंपरिक छठ गीतों की गूंज सुनाई देने लगती है। खासकर पद्मश्री शारदा सिन्हा की आवाज में गाए गए गीत इस पर्व की पहचान बन चुके हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि छठ गीतों की रिकॉर्डिंग और उन्हें जन-जन तक पहुंचाने की परंपरा शारदा सिन्हा से पहले ही शुरू हो चुकी थी? इस इतिहास में बिहार की लोकगायिका पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वहीं, मुजफ्फरपुर की काली देवी यानी काली दासी का नाम भी पुराने छठ गीतों के संदर्भ में सामने आता है।
छठ गीतों के इतिहास को समझने के लिए इन लोकगायिकाओं के योगदान को जानना जरूरी है। हालांकि, सबसे पहले रिकॉर्ड किए गए छठ गीत और उसकी निश्चित तारीख को लेकर उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों में पूरी एकराय नहीं है।
विंध्यवासिनी देवी: छठ गीतों की शुरुआती रिकॉर्डिंग से जुड़ा महत्वपूर्ण नाम
बिहार की लोकसंगीत परंपरा में विंध्यवासिनी देवी का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। 5 जनवरी 1920 को मुजफ्फरपुर में जन्मीं विंध्यवासिनी देवी ने मैथिली, भोजपुरी और मगही सहित कई भाषाओं में लोकगीतों को अपनी आवाज दी। उन्होंने केवल गायिका के रूप में ही नहीं, बल्कि लोकगीतों के संग्रह, लेखन और संरक्षण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण काम किया।
वर्ष 1948 में पटना आकाशवाणी से जुड़ने के बाद उन्होंने बिहार के पारंपरिक लोकगीतों को रेडियो के माध्यम से व्यापक श्रोताओं तक पहुंचाया। उस दौर में रेडियो आम लोगों तक संगीत पहुंचाने का एक प्रमुख माध्यम था। विंध्यवासिनी देवी ने इसी माध्यम का उपयोग करते हुए छठ सहित विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीतों को नई पहचान दिलाई।
छठ के जिन पारंपरिक गीतों को आज भी श्रद्धा के साथ सुना जाता है, उनमें ‘उग हो सुरुज देव भइल भिनुसरवा’, ‘सोने के खरउआ हो दीनानाथ’ और ‘केरवा जे फरेला घवध से’ जैसे गीतों का विशेष उल्लेख मिलता है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, HMV यानी हिंदुस्तान रिकॉर्ड कंपनी ने भी उनके गाए पारंपरिक गीतों को ग्रामोफोन रिकॉर्ड के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया। इस तरह छठ गीतों की शुरुआती व्यावसायिक रिकॉर्डिंग और प्रसारण के इतिहास में विंध्यवासिनी देवी का नाम प्रमुखता से सामने आता है।
काली देवी का नाम भी छठ गीतों के पुराने इतिहास में शामिल
छठ गीतों के इतिहास की चर्चा में मुजफ्फरपुर की काली देवी का नाम भी सामने आता है। कुछ पुराने गीतों और उपलब्ध सांस्कृतिक संदर्भों में उनका उल्लेख काली दासी के नाम से भी मिलता है।
उनसे जुड़े गीतों में ‘मोरे भइया जालन महंगा मुंगेर’ और ‘कांच ह बांस के बहंगिया’ जैसे गीतों का जिक्र किया जाता है। इन गीतों की खासियत यह है कि इनमें छठ की धार्मिक परंपरा के साथ उस दौर के सामाजिक और आर्थिक जीवन की झलक भी दिखाई देती है।
इन गीतों के जरिए आम परिवारों की परिस्थितियों, महंगाई और सामाजिक जीवन से जुड़े अनुभव सामने आते हैं। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि छठ गीत केवल पूजा और भक्ति तक सीमित नहीं रहे, बल्कि लोकजीवन की भावनाओं और परिस्थितियों को भी अपने भीतर समेटे हुए थे।
हालांकि, काली देवी के जीवन, उनके संगीत सफर और उनकी रिकॉर्डिंग के समय को लेकर विस्तृत प्रमाणित दस्तावेज सीमित हैं। इसलिए उन्हें छठ गीतों की पहली रिकॉर्डेड गायिका घोषित करना अभी उचित नहीं होगा। फिर भी पुराने छठ गीतों के इतिहास में उनका उल्लेख महत्वपूर्ण है।
शारदा सिन्हा ने छठ गीतों को देश-दुनिया में दिलाई पहचान
छठ गीतों के इतिहास में पद्मश्री शारदा सिन्हा का योगदान बेहद खास है। उन्होंने अपनी विशिष्ट आवाज और गायकी के जरिए बिहार के पारंपरिक छठ गीतों को देशभर में लोकप्रिय बनाया।
उनकी आवाज में गाए गए ‘केलवा जे फरेला घवद से’, ‘कांच ही बांस के बहंगिया’ और ‘पहिले पहिल छठी मैया’ जैसे गीत छठ पर्व के दौरान खूब सुने जाते हैं।
शारदा सिन्हा ने पारंपरिक लोकधुनों और गीतों को अपनी गायकी के माध्यम से ऐसा विस्तार दिया कि छठ गीत बिहार की सीमाओं से निकलकर देश के दूसरे राज्यों और विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदायों तक भी पहुंचे।
उनके गीतों में छठ की धार्मिक आस्था के साथ घर-परिवार, मायके, गांव और मिट्टी से जुड़ी भावनाएं भी दिखाई देती हैं। यही वजह है कि छठ के अवसर पर उनकी आवाज आज भी लाखों श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखती है।
आखिर छठ का पहला रिकॉर्डेड गीत कब और किसने गाया था?
यह सवाल आज भी छठ गीतों के इतिहास को लेकर दिलचस्पी रखने वाले लोगों के बीच चर्चा का विषय है।
उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों में विंध्यवासिनी देवी को छठ गीतों की शुरुआती रेडियो और ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग से जुड़ी प्रमुख गायिका बताया गया है। वहीं, शारदा सिन्हा की रिकॉर्डिंग के शुरुआती वर्ष को लेकर भी अलग-अलग जानकारियां प्रकाशित हुई हैं। एक रिपोर्ट में शारदा सिन्हा ने अपने पहले ग्रामोफोन रिकॉर्ड का वर्ष 1977 या 1978 बताया है, जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया की 2011 की रिपोर्ट में उनके हवाले से 1973-74 में छठ गीत रिकॉर्ड करने का उल्लेख है।
इसलिए छठ गीत की पहली रिकॉर्डिंग का सटीक वर्ष और सबसे पहली रिकॉर्डेड गायिका तय करने के लिए पुराने HMV रिकॉर्ड, आकाशवाणी के अभिलेख और अन्य मूल दस्तावेजों की पड़ताल जरूरी है।
छठ गीतों के इतिहास में कई आवाजों का योगदान
छठ गीतों की परंपरा किसी एक कलाकार या एक दौर तक सीमित नहीं है। यह पीढ़ियों से लोकसमाज में गाए जाने वाले पारंपरिक गीतों की विरासत है। इन गीतों को सुरक्षित रखने और नई पीढ़ियों तक पहुंचाने में विंध्यवासिनी देवी, काली देवी और शारदा सिन्हा जैसी गायिकाओं की अलग-अलग भूमिका रही है।
आज जब छठ महापर्व के दौरान इन गीतों की गूंज सुनाई देती है, तो यह केवल संगीत नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और लोकआस्था की आवाज भी होती है। इन गीतों के पीछे छिपे इतिहास और उन्हें लोगों तक पहुंचाने वाली गायिकाओं को याद करना भी हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
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