Karam Festival 2026: झारखंड में आगामी 22 सितंबर 2026 को करम पर्व मनाया जाएगा। पर्व को लेकर राज्य के विभिन्न हिस्सों में तैयारियां शुरू हो गई हैं। इसी बीच झारखंडी संगीत जगत में भी करम पर्व की छटा दिखाई दे रही है। इस वर्ष नागपुरी, सादरी, खोरठा, संथाली, पंचपरगनिया समेत विभिन्न झारखंडी भाषाओं में करम पर्व पर आधारित बड़ी संख्या में नए लोकगीत और वीडियो जारी किए गए हैं।
इन गीतों में करम पर्व की परंपरा, प्रकृति के प्रति लगाव, भाई-बहन के रिश्ते, सामुदायिक जीवन और झारखंड की लोकसंस्कृति को केंद्र में रखा गया है। पारंपरिक लोकधुनों के साथ आधुनिक संगीत संयोजन का इस्तेमाल कर इन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश की गई है।
करम गीतों में दिख रही झारखंड की लोकसंस्कृति
करम पर्व झारखंड के प्रमुख पारंपरिक पर्वों में शामिल है। इसका संबंध प्रकृति, कृषि जीवन और सामुदायिक आस्था से जुड़ा हुआ है। पर्व के दौरान गांवों में करम डाली की पूजा, अखड़ा में सामूहिक नृत्य-संगीत और पारंपरिक रीति-रिवाजों का आयोजन होता है।
करम पर्व को लेकर जारी किए गए नए लोकगीतों और वीडियो में भी अखड़ा, करम डाली, पारंपरिक परिधान, नृत्य-संगीत और ग्रामीण परिवेश को प्रमुखता से दिखाया गया है। इससे झारखंड की पारंपरिक जीवनशैली और लोक संस्कृति की झलक मिलती है।
इस साल बड़ी संख्या में करम आधारित गीत रिलीज
झारखंडी संगीत और मनोरंजन जगत से जुड़े लोगों के मुताबिक, इस वर्ष करम पर्व को लेकर लगभग 70 से 80 के आसपास करम आधारित गीत और वीडियो अलग-अलग झारखंडी भाषाओं में जारी किए गए हैं। इनमें नागपुरी, संथाली, खोरठा, कुरमाली, पंचपरगनिया और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में तैयार किए गए गीत शामिल हैं।
इन गीतों को डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से श्रोताओं तक पहुंचाया जा रहा है। इससे पारंपरिक पर्व से जुड़े लोकगीतों को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचने का माध्यम भी मिल रहा है।
पारंपरिक धुनों के साथ आधुनिक संगीत का मेल
इस बार करम पर्व के लिए तैयार किए गए कई गीतों में पारंपरिक झारखंडी वाद्ययंत्रों और लोकधुनों के साथ आधुनिक संगीत तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। कलाकारों का प्रयास है कि लोकसंगीत की मूल भावना को बनाए रखते हुए उसे आज के श्रोताओं की पसंद के अनुरूप प्रस्तुत किया जाए।
झारखंडी कलाकारों का मानना है कि लोकभाषा और लोकसंगीत नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हो सकते हैं।
करम पर्व केवल पूजा नहीं, सामुदायिक संस्कृति का हिस्सा
करम पर्व को झारखंड में केवल धार्मिक आयोजन के तौर पर नहीं देखा जाता। इससे जुड़े सामूहिक नृत्य, गीत, अखड़ा और पारंपरिक रीति-रिवाज ग्रामीण सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
करम गीतों में भाई-बहन के रिश्ते के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण, कृषि जीवन, सामूहिकता और सामाजिक संबंधों जैसे विषय भी देखने को मिलते हैं। यही वजह है कि करम पर्व से जुड़े लोकगीत झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को सामने रखने का काम करते हैं।
कलाकारों के लिए भी लोकसंस्कृति को मंच देने का अवसर
गीतकार एवं फिल्म निर्देशक रंजू मिंज के अनुसार, करम पर्व झारखंड की संस्कृति, प्रकृति और सामुदायिक जीवन से जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि झारखंडी गीत-संगीत को आधुनिक मंच उपलब्ध कराने के साथ लोकभाषाओं और संस्कृति को व्यापक स्तर तक पहुंचाने की जरूरत है।
22 सितंबर को मनाए जाने वाले करम पर्व से पहले राज्य में गीत-संगीत के माध्यम से बन रहा यह सांस्कृतिक माहौल झारखंड की समृद्ध लोकपरंपरा की ओर भी ध्यान आकर्षित कर रहा है।
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कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।







