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मां दुर्गा की प्रतिमा की आंखें आखिर में क्यों बनाई जाती हैं? जानिए ‘चक्षुदान’ की परंपरा का रहस्य

मां दुर्गा की प्रतिमा की आंखें सबसे आखिर में क्यों बनाई जाती हैं? जानिए चक्षुदान क्या है, महालया से इसका क्या संबंध है और मूर्तिकारों के लिए यह प्रक्रिया क्यों खास होती है।

अक्टूबर 11, 2026
in धर्म-अध्याय
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मां दुर्गा की प्रतिमा की आंखें बनाते हुए मूर्तिकार, चक्षुदान की परंपरा

मां दुर्गा की प्रतिमा की आंखें बनाने की परंपरा को चक्षुदान कहा जाता है। बंगाल की दुर्गा पूजा में इसका विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।

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प्रतिमा तैयार हो जाती है, लेकिन आंखें बनाने का इंतजार क्यों?

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समय: ~13 मिनट•हिंदी बुलेटिन

नवरात्रि और दुर्गा पूजा के दिनों में आपने मां दुर्गा की खूबसूरत प्रतिमाएं जरूर देखी होंगी। लाल चुनरी, सुनहरे आभूषण, हाथों में अस्त्र-शस्त्र और चेहरे पर अद्भुत तेज। मूर्तिकार कई दिनों की मेहनत से प्रतिमा को आकार देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि कुछ परंपराओं में प्रतिमा का लगभग पूरा काम हो जाने के बाद भी उसकी आंखें बनाने का काम बाकी रखा जाता है?

Table of Contents

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  • प्रतिमा तैयार हो जाती है, लेकिन आंखें बनाने का इंतजार क्यों?
  • क्या है चक्षुदान? नाम में ही छिपा है अर्थ
  • आंखें आखिर में ही क्यों बनाई जाती हैं?
    • 1. धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रतिमा को पूर्णता देने का क्षण
    • 2. कला के लिहाज से आंखों में जरा-सी गलती भी पड़ सकती है भारी
  • महालया से क्या है मां दुर्गा की आंखें बनाने का संबंध?
  • क्या आंखें बनते ही मां दुर्गा की प्रतिमा में प्राण आ जाते हैं?
  • मां दुर्गा की आंखों में आखिर इतना खास क्या होता है?
  • झारखंड में भी इस परंपरा को करीब से समझने का मौका
  • एक छोटी-सी रेखा, लेकिन उसके पीछे वर्षों की साधना

आखिर ऐसा क्यों?

📌 यह भी पढ़ें:
  • सिंह या बाघ, कौन है मां दुर्गा का असली वाहन?
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क्या यह सिर्फ मूर्तिकारों की कला से जुड़ी परंपरा है, या इसके पीछे कोई धार्मिक मान्यता भी है?

इस परंपरा को ‘चक्षुदान’ कहा जाता है। बंगाल की दुर्गा पूजा परंपरा में इसे विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता के अनुसार, मां की प्रतिमा की आंखें बनाना केवल चित्रकारी का अंतिम चरण नहीं, बल्कि देवी के स्वरूप को पूर्णता देने का एक भावनात्मक और आध्यात्मिक क्षण है। Indian Express ने भी इस परंपरा को ‘Chokkhu Daan’ यानी आंखें अर्पित करने की रस्म के रूप में समझाया है। (स्रोत: Indian Express)

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क्या है चक्षुदान? नाम में ही छिपा है अर्थ

‘चक्षुदान’ दो शब्दों से मिलकर बना है—‘चक्षु’, यानी आंख, और ‘दान’, यानी अर्पित करना या देना। बंगाली परंपरा में इसे ‘चोख्खु दान’ या ‘चोक्खु दान’ भी कहा जाता है।

इस प्रक्रिया में मूर्तिकार देवी की आंखों को बेहद सावधानी से आकार और रंग देता है। आंखों की रेखाएं, पुतलियों का आकार, भौंहों का भाव और चेहरे के साथ उनका संतुलन—हर छोटी बात पर ध्यान देना पड़ता है।

जरा सोचिए, मिट्टी से बनी एक प्रतिमा का चेहरा आंखों के बनने से पहले और बाद में कितना अलग दिखाई दे सकता है। आंखों में हल्का-सा बदलाव भी चेहरे के भाव को बदल देता है। वही प्रतिमा कहीं करुणामयी दिखती है, कहीं तेजस्वी और कहीं ऐसा लगता है मानो मां अपने भक्तों को देख रही हों।

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यही वजह है कि कई मूर्तिकार आंखों को प्रतिमा के सबसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण हिस्सों में से एक मानते हैं।

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आंखें आखिर में ही क्यों बनाई जाती हैं?

इसके पीछे दो अहम पहलू हैं—धार्मिक मान्यता और मूर्तिकला की बारीकी।

1. धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रतिमा को पूर्णता देने का क्षण

चक्षुदान की परंपरा में आंखें बनाने को देवी के स्वरूप को पूर्णता देने वाला विशेष कार्य माना जाता है। श्रद्धालुओं की आस्था में मां दुर्गा की आंखें केवल चेहरे का हिस्सा नहीं हैं; वे देवी की शक्ति, करुणा और भक्तों पर उनकी दृष्टि का प्रतीक भी हैं।

जब मूर्तिकार आंखों को अंतिम रूप देता है, तो भक्तों के लिए वह क्षण प्रतिमा के सजीव और प्रभावशाली स्वरूप से जुड़ जाता है। यह धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ है—इसे इस तरह नहीं समझना चाहिए कि आंखें बनाते ही हर परंपरा में प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा पूरी हो जाती है।

2. कला के लिहाज से आंखों में जरा-सी गलती भी पड़ सकती है भारी

मां दुर्गा की प्रतिमा में चेहरे का भाव बेहद महत्वपूर्ण होता है। आंखों का आकार, दोनों आंखों के बीच की दूरी, उनकी दिशा और माथे पर बनी तीसरी आंख—ये सभी चेहरे की अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं।

इसलिए आंखें बनाने के लिए स्थिर हाथ, धैर्य, अभ्यास और बारीक नजर की जरूरत होती है। कई परंपराओं में यह काम अनुभवी मूर्तिकार या परिवार के वरिष्ठ कलाकार करते हैं। आंखों को अंत में बनाने से कलाकार प्रतिमा के पूरे चेहरे और रंग-सज्जा को देखकर अंतिम रेखाएं तय कर सकता है।

यानी यह परंपरा श्रद्धा से जुड़ी है, तो इसके पीछे वर्षों के अभ्यास से निखरी कला भी है।

महालया से क्या है मां दुर्गा की आंखें बनाने का संबंध?

बंगाल में चक्षुदान का संबंध महालया से खास तौर पर जोड़ा जाता है। महालया को पितृपक्ष के समापन और देवी पक्ष के आरंभ से जोड़कर देखा जाता है। बंगाली सांस्कृतिक परंपरा में यह मां दुर्गा के आगमन की प्रतीक्षा का महत्वपूर्ण अवसर है।

इसी अवसर पर कई जगह मूर्तिकार देवी की आंखों को अंतिम रूप देते हैं। इस रस्म को लेकर श्रद्धालुओं के बीच यह भाव प्रचलित है कि मां अब अपने भक्तों को देखने के लिए तैयार हैं और दुर्गा पूजा का उत्सव करीब आ गया है।

हालांकि, एक जरूरी बात समझना भी जरूरी है: हर जगह आंखें महालया के दिन ही बनाई जाएं, ऐसा सार्वभौमिक नियम नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों, पूजा समितियों और मूर्तिकार परिवारों की परंपराओं में अंतर हो सकता है। आज काम की समय-सीमा और प्रतिमाओं की संख्या के कारण कुछ कलाकार आंखें पहले भी बना देते हैं। (संदर्भ: India Today)

क्या आंखें बनते ही मां दुर्गा की प्रतिमा में प्राण आ जाते हैं?

यह सवाल अक्सर लोगों के मन में उठता है। चक्षुदान और प्राण-प्रतिष्ठा को एक ही प्रक्रिया मान लेना ठीक नहीं होगा।

चक्षुदान प्रतिमा की आंखें बनाने से जुड़ी कलात्मक और धार्मिक परंपरा है। वहीं, प्राण-प्रतिष्ठा पूजा-विधान का अलग हिस्सा है, जिसमें निर्धारित मंत्रों और धार्मिक प्रक्रियाओं के माध्यम से प्रतिमा में देवता की उपस्थिति का आह्वान किया जाता है। इसका स्वरूप संबंधित परंपरा और पूजा-विधान के अनुसार अलग हो सकता है।

इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि चक्षुदान प्रतिमा को धार्मिक और कलात्मक पूर्णता देने वाली एक महत्वपूर्ण रस्म है, जबकि प्राण-प्रतिष्ठा अलग धार्मिक प्रक्रिया है।

मां दुर्गा की आंखों में आखिर इतना खास क्या होता है?

मां दुर्गा की प्रतिमा में आंखें केवल सुंदरता बढ़ाने के लिए नहीं बनाई जातीं। उनके चेहरे की अभिव्यक्ति के माध्यम से कलाकार देवी के अलग-अलग भाव उभारता है-शक्ति, साहस, करुणा और बुराई के विरुद्ध खड़े होने का संकल्प।

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दुर्गा पूजा में महिषासुर पर विजय की कथा भी इसी शक्ति और धर्म की रक्षा के भाव से जुड़ी है। ऐसे में देवी की आंखें उनके तेजस्वी स्वरूप का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती हैं।

भक्त जब प्रतिमा के सामने हाथ जोड़ते हैं, तो वे सिर्फ मिट्टी, रंग और आभूषणों से बनी आकृति नहीं देखते। वे उसमें अपनी आस्था, उम्मीद और मां के प्रति अपनापन महसूस करते हैं। चक्षुदान की परंपरा इसी भावनात्मक जुड़ाव को और गहरा करती है।

झारखंड में भी इस परंपरा को करीब से समझने का मौका

झारखंड में दुर्गा पूजा रांची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो और कई अन्य शहरों में बड़े उत्साह से मनाई जाती है। पंडालों की सजावट और प्रतिमाओं के अलग-अलग स्वरूप के बीच स्थानीय मूर्तिकारों की मेहनत भी इस उत्सव का अहम हिस्सा है।

इस विषय को झारखंड के पाठकों से जोड़ने का सबसे अच्छा तरीका है कि स्थानीय प्रतिमा-निर्माताओं से पूछा जाए—वे आंखें किस चरण में बनाते हैं, यह काम कौन करता है, क्या उनके परिवार में कोई विशेष परंपरा चली आ रही है और क्या वे इसे चक्षुदान कहते हैं?

यहां एक बात का ध्यान रखना जरूरी है: बंगाल में प्रचलित किसी रस्म को बिना स्थानीय पुष्टि के झारखंड के हर पंडाल या मूर्तिकार की परंपरा नहीं बताया जा सकता। स्थानीय कलाकारों के अनुभव इस कहानी को और विश्वसनीय तथा दिलचस्प बना सकते हैं।

एक छोटी-सी रेखा, लेकिन उसके पीछे वर्षों की साधना

मां दुर्गा की प्रतिमा की आंखें आखिर में बनाने की परंपरा हमें एक बात याद दिलाती है-कला में कुछ छोटे दिखने वाले काम ही पूरी रचना का भाव बदल देते हैं।

मूर्तिकार के लिए यह हाथ की सफाई और वर्षों के अभ्यास की परीक्षा है। श्रद्धालु के लिए यह मां के स्वरूप को पूर्ण होते देखने का भावुक क्षण है। और परंपरा के लिए यह पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और शिल्प-कौशल का संगम है।

अगली बार जब आप दुर्गा पूजा के पंडाल में मां दुर्गा के दर्शन करें, तो उनकी आंखों को कुछ पल ध्यान से देखिएगा। उन रेखाओं में कलाकार की मेहनत भी दिखाई देगी और भक्तों की श्रद्धा भी।

यही है चक्षुदान की खासियत—आंखें बनाने का काम भले ही प्रतिमा का आखिरी चरण हो, लेकिन मां के दर्शन का अनुभव कई भक्तों के लिए वहीं से और गहरा हो जाता है।

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