देवघर: महाशिवरात्रि से ठीक पहले झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में एक ऐसी परंपरा निभाई गई, जिसे देखने के लिए हजारों श्रद्धालु उमड़ पड़े। शुक्रवार को वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के बीच बाबा बैद्यनाथ मंदिर और मां पार्वती मंदिर के शिखर से पंचशूल उतारे गए।
भंडारी परिवार की अगुवाई में इस धार्मिक अनुष्ठान को पूरा किया गया। पंचशूलों को नीचे लाकर पारंपरिक ‘मिलन’ कराया गया, जिसे शिव-पार्वती के पवित्र दांपत्य का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालुओं ने पंचशूल का दर्शन कर मस्तक से स्पर्श किया और बाबा बैद्यनाथ व मां पार्वती से आशीर्वाद लिया।
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पहले जानिए, क्या हुआ शुक्रवार को?
- दोपहर 2 बजे के बाद पंचशूल उतारने की प्रक्रिया शुरू हुई।
- सबसे पहले बाबा और मां पार्वती मंदिर के बीच बंधे पवित्र गठबंधन को खोला गया।
- चिंतामणि भंडारी और राजू भंडारी की टीम ने परंपरागत रीति से यह कार्य संपन्न कराया।
- पंचशूलों को उतारकर भीतरखंड स्थित सरदार पंडा आवास ले जाया गया।
- सरदार पंडा गुलाब नंद ओझा को पंचशूल स्पर्श कराने के बाद विधिवत सफाई की गई।
- बाबा मंदिर के सवा मन सोने के कलश और मां पार्वती मंदिर के चांदी के कलश की भी विशेष सफाई की गई।
शनिवार को राधाकृष्ण मंदिर के बरामदे में तांत्रिक विधि से विशेष पूजा-अर्चना और आरती के बाद पंचशूलों को पुनः शिखर पर स्थापित किया जाएगा।
महाशिवरात्रि से पहले पंचशूल क्यों उतारा जाता है?
देवघर के बाबा बैद्यनाथ मंदिर में पंचशूल उतारने की परंपरा सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक अर्थों से जुड़ी है।
1 शुद्धिकरण और नवऊर्जा का प्रतीक
माना जाता है कि महाशिवरात्रि भगवान शिव का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। इस अवसर से पहले मंदिर के शिखर पर स्थापित पंचशूल को उतारकर उसकी विधिवत सफाई और विशेष पूजा की जाती है, ताकि वह पुनः पवित्र और ऊर्जावान रूप में स्थापित हो सके।
2 शिव-पार्वती मिलन का प्रतीकात्मक अनुष्ठान
बाबा और मां पार्वती मंदिर के पंचशूल का ‘मिलन’ कराया जाता है। यह शिव और शक्ति के दिव्य एकत्व का प्रतीक है। गठबंधन खोलने और पुनः चढ़ाने की प्रक्रिया वैवाहिक बंधन की पवित्रता को दर्शाती है।
3 तांत्रिक परंपरा से जुड़ा महत्व
देवघर को तांत्रिक साधना की भूमि भी माना जाता है। महाशिवरात्रि से पहले पंचशूलों की तांत्रिक विधि से पूजा कर उन्हें पुनः स्थापित किया जाता है। मान्यता है कि इससे पूरे धाम की आध्यात्मिक शक्ति जागृत होती है।
गठबंधन परंपरा क्यों होती है बंद?
जैसे ही पंचशूल उतारने से पहले गठबंधन खोला जाता है, उसी समय से नया गठबंधन चढ़ाने की परंपरा अस्थायी रूप से रोक दी जाती है।
शनिवार को विशेष पूजा के बाद जब पंचशूल दोबारा शिखर पर स्थापित होंगे, तब सरदार पंडा पहला गठबंधन चढ़ाएंगे। इसके बाद आम श्रद्धालुओं के लिए यह परंपरा फिर से शुरू होगी।
गठबंधन को ‘अखंड सुहाग’ का प्रतीक माना जाता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसे चढ़ाकर पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए क्यों खास है यह अवसर?
- पंचशूल के दर्शन को अत्यंत शुभ माना जाता है।
- मस्तक से स्पर्श करने पर विशेष आशीर्वाद मिलने की मान्यता है।
- महाशिवरात्रि से पहले यह अनुष्ठान पूरे धाम को आध्यात्मिक रूप से तैयार करता है।
महाशिवरात्रि के मद्देनज़र देवघर में सुरक्षा और प्रशासनिक इंतज़ाम भी सख्त किए गए हैं। हजारों श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए मंदिर परिसर में विशेष व्यवस्था की गई है।
महाशिवरात्रि से पहले पंचशूल उतारने की यह परंपरा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के मिलन, शुद्धिकरण और नवऊर्जा के संचार का प्रतीक है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जा रही है, जो देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम की आध्यात्मिक पहचान को और मजबूत करती है।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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