रांची में बच्चों की सुरक्षा, न्याय और पुनर्वास सुनिश्चित करने वाली बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee-CWC) पिछले लगभग दो वर्षों से अधूरी व्यवस्था के सहारे संचालित हो रही है। पांच सदस्यीय इस अर्ध-न्यायिक संस्था में अध्यक्ष सहित सभी नियमित पद खाली हैं। फिलहाल लोहरदगा जिले की अध्यक्ष और एक सदस्य को अतिरिक्त प्रभार देकर समिति का संचालन कराया जा रहा है। वे सप्ताह में केवल दो दिन रांची में बैठकर मामलों की सुनवाई कर पाते हैं, जबकि बाकी दिनों में समिति का नियमित कामकाज प्रभावित रहता है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन बच्चों के अधिकारों की रक्षा और उनके भविष्य को सुरक्षित करने की जिम्मेदारी सीडब्ल्यूसी पर है, उन्हें समय पर न्याय और संरक्षण कौन दिलाएगा?
रांची ही नहीं, आसपास के जिलों में भी अधूरी है व्यवस्था
सीडब्ल्यूसी की यह समस्या केवल रांची तक सीमित नहीं है। खूंटी, रामगढ़ और हजारीबाग जैसे पड़ोसी जिलों में भी समितियां पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर रही हैं। रामगढ़ की एक सदस्य को अतिरिक्त प्रभार देकर रांची में भी जिम्मेदारी सौंपी गई है। सीमित संसाधनों और अतिरिक्त जिम्मेदारियों के कारण मामलों के निष्पादन में लगातार देरी हो रही है।
इसका असर उन बच्चों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है, जो न्याय और संरक्षण की उम्मीद लेकर समिति के पास पहुंचते हैं। कई बार सुनवाई नहीं होने के कारण उन्हें निराश होकर लौटना पड़ता है।
किन मामलों की सुनवाई करती है CWC?
बाल कल्याण समिति उन बच्चों से जुड़े मामलों की सुनवाई करती है, जो किसी न किसी रूप में संकट का सामना कर रहे होते हैं। इनमें शामिल हैं—
- पॉक्सो (POCSO) से जुड़े मामले
- मानव तस्करी के शिकार बच्चे
- बाल श्रम के मामले
- मारपीट और शोषण
- गुमशुदा एवं परित्यक्त बच्चे
- चोरी या अन्य अपराधों से प्रभावित बच्चे
- छात्रवृत्ति एवं पुनर्वास योजनाओं से जुड़े प्रकरण
समिति की नियमित बैठक नहीं होने से इन मामलों का समय पर निस्तारण नहीं हो पा रहा है, जिससे कई बच्चों को न्याय और आवश्यक संरक्षण मिलने में देरी हो रही है।
रेस्क्यू अभियान भी हो रहे प्रभावित
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि सीडब्ल्यूसी में लंबे समय से रिक्त पद होने का असर बच्चों के रेस्क्यू ऑपरेशन पर भी दिखाई दे रहा है। पिछले दो वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए, जहां समय पर समिति का हस्तक्षेप नहीं हो सका। इसका सीधा नुकसान उन बच्चों को उठाना पड़ा, जिन्हें तत्काल कानूनी सहायता, संरक्षण और पुनर्वास की जरूरत थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि किशोर न्याय अधिनियम की भावना को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए प्रत्येक जिले में सीडब्ल्यूसी का पूर्ण गठन जरूरी है। अध्यक्ष और सभी सदस्यों की शीघ्र नियुक्ति के बिना बच्चों के अधिकारों की समुचित सुरक्षा संभव नहीं है।
क्या है बाल कल्याण समिति (CWC)?
बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee) किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत गठित एक अर्ध-न्यायिक संस्था है, जिसे दीवानी अदालत के समान अधिकार प्राप्त हैं।
कानून के अनुसार प्रत्येक जिले में एक अध्यक्ष और चार सदस्यों वाली समिति का गठन अनिवार्य है, जिसमें कम से कम एक महिला सदस्य होना आवश्यक है।
यह समिति अनाथ, परित्यक्त, लापता, बाल श्रम, मानव तस्करी, बाल विवाह, शोषण और अन्य संकटग्रस्त बच्चों के संरक्षण, पुनर्वास, परिवार से पुनर्मिलन, फोस्टर केयर और गोद लेने जैसे मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय लेती है।
नियमों के अनुसार किसी भी रेस्क्यू किए गए संकटग्रस्त बच्चे को 24 घंटे के भीतर बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य है। ऐसे में समिति का नियमित और पूर्ण रूप से कार्यरत होना बच्चों के हितों की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है.

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
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