31 अक्टूबर 2026 | राष्ट्रीय एकता दिवस विशेष
आज भारत सरदार वल्लभभाई पटेल की 151वीं जयंती मना रहा है। उन्हें भारत का लौह पुरुष (Iron Man of India) कहा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी के समय भारत का राजनीतिक नक्शा आज जैसा नहीं था? देश में सैकड़ों रियासतें थीं, जिनके सामने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने अथवा अलग रहने जैसे विकल्पों का सवाल था।
ऐसे मुश्किल दौर में सरदार पटेल ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ, कूटनीति और दृढ़ फैसलों के जरिए रियासतों के एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वजह है कि उन्हें आधुनिक भारत के एकीकरण का प्रमुख शिल्पकार माना जाता है।
सरदार पटेल की जयंती पर आइए जानते हैं आजादी के बाद भारत के एकीकरण की वह ऐतिहासिक कहानी, जिसने देश के वर्तमान राजनीतिक स्वरूप को आकार देने में अहम योगदान दिया।
आजादी के समय भारत का नक्शा आज जैसा नहीं था
15 अगस्त 1947 को भारत आजाद तो हो गया, लेकिन देश के सामने एक बड़ी चुनौती थी। उस समय भारत में दो तरह के क्षेत्र थे। पहला, ब्रिटिश शासन के सीधे नियंत्रण वाले प्रांत और दूसरा, वे रियासतें जिन पर स्थानीय राजाओं, नवाबों और महाराजाओं का शासन था।
ब्रिटिश शासन के समाप्त होने के साथ इन रियासतों के भविष्य का सवाल भी खड़ा हो गया। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के बाद रियासतों के शासकों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने अथवा स्वतंत्र रहने का विकल्प मिला था।
सरकार के ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, उस समय लगभग 565 रियासतों के एकीकरण की चुनौती थी। ये रियासतें भारत के कुल क्षेत्रफल के लगभग दो-पांचवें हिस्से में फैली हुई थीं।
अगर इन रियासतों का सही तरीके से एकीकरण नहीं होता, तो देश के सामने राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियां और बढ़ सकती थीं। इसी मुश्किल जिम्मेदारी को संभालने के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कैसे शुरू हुआ 565 रियासतों को भारत में मिलाने का अभियान?
भारत की आजादी से पहले ही सरदार पटेल ने रियासतों के एकीकरण की दिशा में काम शुरू कर दिया था। 5 जुलाई 1947 को States Department यानी रियासत विभाग बनाया गया। सरदार पटेल को इसका जिम्मा सौंपा गया और वी.पी. मेनन ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण प्रशासनिक भूमिका निभाई।
पटेल ने रियासतों के शासकों से बातचीत की और उन्हें समझाया कि अलग-अलग रहने के बजाय एक मजबूत भारतीय संघ का हिस्सा बनना देश और उनकी जनता के हित में होगा।
इस प्रक्रिया में Instrument of Accession यानी विलय पत्र महत्वपूर्ण माध्यम बना। इसके तहत रियासतों ने शुरुआत में रक्षा, विदेश मामले और संचार जैसे प्रमुख विषयों पर भारतीय संघ का अधिकार स्वीकार किया।
पटेल की रणनीति में बातचीत, समझौते, राजनीतिक विश्वास और जरूरत पड़ने पर दृढ़ प्रशासनिक फैसले शामिल थे। इसी प्रयास के कारण अधिकांश रियासतें भारत में शामिल होने के लिए तैयार हो गईं।
हैदराबाद: वह रियासत जिसका भारत में विलय आसान नहीं था
हैदराबाद उस समय भारत की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण रियासतों में से एक था। यहां निजाम मीर उस्मान अली खान का शासन था। निजाम हैदराबाद को स्वतंत्र रखना चाहते थे और भारत में शामिल होने को लेकर सहमत नहीं थे।
29 नवंबर 1947 को भारत और हैदराबाद के बीच एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट हुआ, लेकिन दोनों पक्षों के बीच विवाद समाप्त नहीं हुआ। हैदराबाद में रजाकार संगठन की गतिविधियों और बिगड़ती कानून-व्यवस्था ने स्थिति को और गंभीर बना दिया।
आखिरकार 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने Operation Polo शुरू किया। यह सैन्य अभियान लगभग पांच दिनों तक चला और 17 सितंबर 1948 को हैदराबाद की सेनाओं ने आत्मसमर्पण कर दिया।
इसके बाद हैदराबाद का भारत में एकीकरण हुआ। यह घटना भारतीय इतिहास में रियासतों के एकीकरण का एक महत्वपूर्ण अध्याय मानी जाती है।
जूनागढ़ की कहानी: जब जनमत से तय हुआ भारत में विलय
जूनागढ़ गुजरात क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण रियासत थी। यहां के नवाब महाबत खान ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया, जबकि जूनागढ़ की भौगोलिक स्थिति भारत से जुड़ी हुई थी और वहां की आबादी का बड़ा हिस्सा हिंदू था।
इस फैसले से विवाद पैदा हो गया। भारत सरकार ने इस निर्णय पर आपत्ति जताई और जूनागढ़ के भविष्य को लेकर राजनीतिक संकट गहरा गया।
आखिरकार नवाब जूनागढ़ छोड़कर पाकिस्तान चले गए। इसके बाद फरवरी 1948 में जनमत संग्रह कराया गया। इस जनमत संग्रह में भारी बहुमत ने भारत में शामिल होने का समर्थन किया।
इस तरह जूनागढ़ का भारत में विलय हुआ। यह घटना दिखाती है कि आजादी के बाद भारत के सामने रियासतों के एकीकरण की चुनौतियां कितनी अलग-अलग थीं।
सरदार पटेल को क्यों कहा जाता है भारत का लौह पुरुष?
सरदार वल्लभभाई पटेल को उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, प्रशासनिक क्षमता और नेतृत्व के कारण लौह पुरुष कहा जाता है। लेकिन रियासतों का एकीकरण ही उनकी एकमात्र उपलब्धि नहीं थी।
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खेड़ा सत्याग्रह (1918): किसानों के अधिकारों के लिए महात्मा गांधी के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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बारडोली सत्याग्रह (1928): किसानों के आंदोलन का नेतृत्व किया। इसी आंदोलन के बाद उन्हें सरदार की उपाधि मिली।
खबर मन्त्र एक्सक्लूसिव पड़ताल एवं विश्लेषणExclusive -
भारत छोड़ो आंदोलन (1942): स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री: आजादी के बाद भारत के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने।
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अखिल भारतीय सेवाएं: मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था और अखिल भारतीय सेवाओं को स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सरदार पटेल का निधन 15 दिसंबर 1950 को हुआ। वर्ष 1991 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
राष्ट्रीय एकता दिवस क्यों मनाया जाता है?
हर साल 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय एकता दिवस यानी Rashtriya Ekta Diwas मनाया जाता है।
भारत सरकार ने वर्ष 2014 में उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया था। इसका उद्देश्य देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करना है।
इस अवसर पर देशभर में रन फॉर यूनिटी, राष्ट्रीय एकता की शपथ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और अन्य आयोजन किए जाते हैं।
गुजरात के केवड़िया स्थित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी भी सरदार पटेल को समर्पित है। इसका उद्घाटन 31 अक्टूबर 2018 को किया गया था। इसकी ऊंचाई 182 मीटर है और यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है।
अगर सरदार पटेल नहीं होते तो कैसा होता भारत?
यह इतिहास का एक महत्वपूर्ण काल्पनिक सवाल है। अगर आजादी के बाद रियासतों का एकीकरण समय पर और प्रभावी ढंग से नहीं हुआ होता, तो भारत को अलग-अलग राजनीतिक इकाइयों, प्रशासनिक सीमाओं, सुरक्षा और संचार व्यवस्था से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता था।
हालांकि यह कहना संभव नहीं है कि भारत निश्चित रूप से कई देशों में बंट जाता, लेकिन इतना स्पष्ट है कि रियासतों के एकीकरण ने आधुनिक भारत की राजनीतिक और भौगोलिक एकता की नींव मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।
सरदार पटेल का योगदान सिर्फ रियासतों को मिलाने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने आजाद भारत की प्रशासनिक और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज राष्ट्रीय एकता दिवस पर उन्हें याद करना सिर्फ एक महान नेता को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि भारत की एकता, विविधता और साझा पहचान के इतिहास को समझना भी है।

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