Shibu Soren Death: झारखंड की राजनीति के शिल्पकार को अश्रुपूरण विदाई
झारखंड की आत्मा कहे जाने वाले दिशोम गुरु शिबू सोरेन अब हमारे बीच नहीं रहे। दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में इलाजरत 81 वर्षीय पूर्व मुख्यमंत्री और आदिवासी नेता का निधन झारखंड ही नहीं, पूरे देश के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने जिस आंदोलन से राजनीति की शुरुआत की, वही आंदोलन आगे चलकर झारखंड राज्य के निर्माण का आधार बना।
आंदोलन से सत्ता तक का सफर
शिबू सोरेन ने सत्ता की राजनीति से नहीं, संघर्ष और जनचेतना से अपनी यात्रा शुरू की। अपने पिता को जमींदारों के शोषण का शिकार होते देख उन्होंने आदिवासी अधिकारों की लड़ाई छेड़ी। 1972 में ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ (JMM) की स्थापना उनके जीवन की सबसे क्रांतिकारी पहल थी।
उनके नेतृत्व में चले आंदोलनों—रेल रोको, भूख हड़ताल, जनसभा—ने झारखंड की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया।
लोकसभा से मुख्यमंत्री पद तक
शिबू सोरेन न सिर्फ झारखंड बल्कि भारतीय संसद में आदिवासी आवाज के प्रमुख चेहरा बने। वे तीन बार केंद्र में मंत्री रहे और दो बार झारखंड के मुख्यमंत्री भी बने। हालांकि उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल राजनीतिक अस्थिरता से जूझता रहा।
विवादों से भी जुड़ा रहा जीवन
उनका जीवन संघर्षों और उपलब्धियों के बीच संतुलन बनाता रहा।
- 1993 के JMM रिश्वत कांड
- कोयला मंत्री रहते हुए हुए विवाद
- हत्या मामले में गिरफ्तारी
इन सबने उनकी छवि पर असर डाला, लेकिन झारखंड की जनता के दिल में उनकी जगह कभी कम नहीं हुई।
राजनीतिक विरासत और अगली पीढ़ी
राजनीति से धीरे-धीरे हटने के बाद उन्होंने JMM की कमान बेटे हेमंत सोरेन को सौंपी। आज हेमंत झारखंड के मुख्यमंत्री हैं, और उनके नेतृत्व को गुरुजी की विरासत का विस्तार माना जाता है।
गुरुजी की राजनीति: प्रेरणा भी, चेतावनी भी
झारखंड आज भी खनिज संपदा की लूट, बेरोजगारी और आदिवासी विस्थापन जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में शिबू सोरेन की संघर्षशील राजनीति केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शन है।
अंतिम श्रद्धांजलि
शिबू सोरेन का जाना केवल एक व्यक्ति का निधन नहीं, एक राजनीतिक अध्याय का अंत है। उनका जीवन इस बात की मिसाल है कि संकल्प, संघर्ष और जनसमर्थन से कोई भी व्यवस्था बदली जा सकती है।












