Suvendu Adhikari: देश में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद बंगाल ने सबको हिला कर रख दिया। किसी ने सोचा भी नहीं था कि बंगाल में भाजपा का कमल कुछ इस कदर खिलेगा। जब-जब 2026 के बंगाल विधासभा चुनाव की चर्चा होगी, तब-तब एक चेहरे का नाम सामने आएगा। जिसने कभी ममता बनर्जी के लिए जमीन तैयार की, आज वहीं चेहरा भाजपा की नई सत्ता का सबसे बड़ा आधार यानी अधिकारी बन चुका है।
जिसने नंदीग्राम आंदोलन से वामपंथ की 34 साल पुरानी सरकार की जड़े हिलाई, वहीं 15 साल बाद भाजपा की जीत का सबसे बड़ा नायक बनकर उभरा। हम बात कर रहे है शुभेंदु अधिकारी की… एक ऐसा नेता जो कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी थे। उसी ने नंदीग्राम से लेकर भवानीपुर तक बंगाल की बदलती राजनीति की पूरी पटकथा लिख डाली। आखिर कौन है शुभेंदु जो बनेंगे बंगाल का अधिकार।
Read More: Suvendu Adhikari होंगे पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री, कल सुबह 11 बजे लेंगे शपथ
संघर्ष, विरोध, सत्ता और विद्रोह की है शुभेंदु की कहानी
आपकों बता दें कि शुभेंदु अधिकारी की पूरी राजनीतिक यात्रा संघर्ष, विरोध, सत्ता और विद्रोह की कहानी है। पूर्वी मेदिनीपुर के प्रभावशाली अधिकारी परिवार में जन्में शुभेंदु का बचपन राजनीतिक माहौल से बिलकुल अलग था। बताया जाता है कि उनका झुकाव अध्यात्म की तरफ ज्यादा था, उनके इस संवभाव के चलते परिवार को यह लगने लगा था कि वे शायद संन्यास का रास्ता चुन लेंगे। लेकिन बाद में उन्होंने राजनीति को ही अपना जीवन बना लिया। उन्होंने शादी तो नहीं कि, लेकिन पूरा जिवन सार्वजनिक जीवन के लिए समर्पित कर दिया। उनकी राजनीतिक शुरुआत की बात करे तो उन्होंने राजनीतिक शुरुआत छात्र राजनीति से की। कांथी के प्रभात कुमार कॉलेज में पढ़ने वाले शुभेंदु शुरूआत में कांग्रेस की छात्र इकाई छात्र परिषद से जुड़े। उस दौर में बंगाल की घरती में वामपंथ का दबदबा था और कांग्रेस कमजोर थी।
Read More: Sudesh Mahto ने Suvendu Adhikari को दी बधाई, शपथ ग्रहण समारोह में होंगे शामिल
नगरपालिका का चुनाव लड़े और बने पार्षद
1995 में उन्होंने पहली बार कांथी नगरपालिका का चुनाव लड़ा और पार्षद बन गए। ये उनकी पहली बड़ी राजनीतिक जीत थी। शायद इस जीत के बाद किसी ने नहीं सोचा था कि पार्षद चुनाव जीतने वालाशुभेंदु एक दिन राज्य का सीएम बन जाएगा। खैर कहानी में आगे बढ़ते है। 1998 में जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस बनाई, तब ममता को शुभेंदु का साथ नहीं मिला था। लेकिन कुछ समय बाद वे टीएमसी में शामिल हो गए। हालांकि उनके पिता शिशिर अधिकारी ममता के साथ थे। लेकिन शुभेंदु अपने पिता के पहचान उजागर किए बगैर धीरे-धीरे आगे बढ़ते गए। अंत: ममता ने उन पर भरोसा जताना शुरू किया।
कई बार करना पड़ा हार का सामना
टीएमसी में शामिल होने के बाद कई बार शुभेंदु अधिकारी को हार का सामना करना पड़ा। 2001 में विधानसभा चुनाव और 2004 में लोकसभा चुनाव में उन्हें वामदल से करारी हार मिली, लेकिन इस हार के बाद भी उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी। जिसके बाद उनके राजनीतिक करियर में असल बदलाव 2007 के नंदीग्राम आंदोलन में आई। उस समय में शुभेंदु अधिकारी इस आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा बनकर सामने आए। इस आंदोलन ने पूरे बंगाल में वाम सरकार के खिलाफ माहौल तैयार किया औऱ ममता बनर्जी को नई राजनीतिक ताकत दी। यह वहीं नंदीग्राम है, जिसने 2021 के चुनाव में भाजपा का माहौल तैयार किया था।
रणनीति ने तृणमूल को दिलाई मजबूती
2008 के पंचायत चुनाव में उनकी रणनीति ने तृणमूल कांग्रेस को पूर्व मेदिनीपुर में मजबूत कर दिया। फिर 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी लक्ष्मण सेठ को हराकर तामलुक सीट जीत ली। इसके बाद अधिकारी परिवार बंगाल की राजनीति में बेहद ताकतवर माना जाने लगा। 2011 में 34 साल पुरानी वाम सरकार गिर गई और ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं। सत्ता परिवर्तन की इस कहानी में शुभेंदु अधिकारी की भूमिका बेहद अहम मानी गई। लेकिन समय के साथ पार्टी के भीतर समीकरण बदलने लगे।
आखिर शुभेंदू ने क्यों बनाई पार्टी से दूरी
2014 के बाद अभिषेक बनर्जी का कद तेजी से बढ़ा और संगठन में नई पीढ़ी को आगे लाने की रणनीति शुरू हुई। इसी दौर में शुभेंदु अधिकारी और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ने लगी। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद उनसे कई अहम जिम्मेदारियां वापस ले ली गईं। धीरे-धीरे यह साफ हो गया कि पार्टी में उनका प्रभाव कम किया जा रहा है। आखिरकार दिसंबर 2020 में शुभेंदु अधिकारी ने तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी और बीजेपी में शामिल हो गए। यह फैसला बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
जहां अधिकारी ने किया विरोध वहां की जनता ने जतया भरोसा
2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर सीधा मुकाबला ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच हुआ। पूरे देश की नजर इस सीट पर थी। बेहद करीबी मुकाबले में शुभेंदु ने ममता बनर्जी को हरा दिया। यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि बंगाल की राजनीति में भाजपा के उभार का सबसे बड़ा प्रतीक बन गई।
जीत में सबसे बड़े चेहरा बने शुभेंदु
इसके बाद शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता बने और लगातार ममता सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते रहे। अब बीजेपी की जीत के बाद वही शुभेंदु अधिकारी बंगाल की सत्ता के सबसे बड़े चेहरे के रूप में सामने आए हैं। नंदीग्राम से शुरू हुई यह राजनीतिक यात्रा अब बंगाल की सत्ता तक पहुंच चुकी है, और यही वजह है कि आज शुभेंदु अधिकारी सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि बंगाल की बदली हुई राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक माने जा रहे हैं।







