Pitru Paksha: पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण के साथ जीव-जंतुओं को भोजन कराने की भी परंपरा है। श्राद्ध का भोजन तैयार होने के बाद कई घरों में सबसे पहले उसका कुछ हिस्सा गाय, कौए, कुत्ते और चींटियों के लिए निकाला जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इन जीवों को पितरों, देवताओं और यमराज से जुड़े प्रतीकों के तौर पर देखा जाता है। आइए जानते हैं इस परंपरा के पीछे क्या मान्यता है।
Pitru Paksha में कौए को भोजन क्यों खिलाते हैं?
श्राद्ध कर्म में कौए को भोजन कराने की परंपरा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कौए का संबंध पितरों और यमराज से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि श्राद्ध का भोजन कौए के लिए अलग से निकाला जाता है।
मान्यता है कि यदि कौआ श्राद्ध का भोजन ग्रहण कर ले, तो इसे पितरों की तृप्ति का संकेत माना जाता है। इसी विश्वास के चलते कई परिवार श्राद्ध के दिन घर की छत, आंगन या किसी खुले स्थान पर कौए के लिए भोजन रखते हैं।
गाय को भोजन कराने की क्या है मान्यता?
हिंदू धर्म में गाय को पूजनीय माना गया है। पितृ पक्ष के दौरान गाय को भोजन कराने की भी परंपरा है, जिसे कई जगह गौ ग्रास कहा जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, गाय को भोजन कराना पुण्यकारी माना जाता है और इसे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने से भी जोड़ा जाता है। श्राद्ध के भोजन में से रोटी, चारा या गाय के लिए उपयुक्त खाद्य सामग्री अलग निकालकर खिलाई जाती है।
कुत्ते को भोजन कराने का महत्व
पितृ पक्ष में कुत्ते को भोजन कराने की परंपरा भी कई परिवारों में देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यताओं में कुत्ते का संबंध यमराज से बताया गया है। इसे यमराज के द्वारपालों से भी जोड़ा जाता है।
मान्यता के अनुसार, श्राद्ध के दौरान कुत्ते को भोजन कराना पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक है। इसके साथ ही इसे जीवों के प्रति दया, सेवा और करुणा की भावना से भी जोड़ा जाता है।
देवताओं को भी अर्पित किया जाता है भोजन
श्राद्ध कर्म में केवल जीव-जंतुओं को ही भोजन कराने की परंपरा नहीं है, बल्कि देवताओं को भी भोजन का अंश अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध में अग्नि देव, विश्वेदेव और अर्यमा का आह्वान किया जाता है।
कुछ परंपराओं में उपले या कंडे की धूनी पर घी, गुड़ और भोजन की थोड़ी मात्रा अर्पित करने की मान्यता है। माना जाता है कि देवताओं को अर्पित किया गया भोजन सूक्ष्म रूप से पितरों तक पहुंचता है। इसे श्राद्ध कर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
चींटियों को भोजन कराने के पीछे क्या मान्यता है?
पितृ पक्ष की पंचबलि परंपरा में पिपीलिकादि बलि का भी उल्लेख मिलता है। इसके तहत चींटियों और छोटे जीवों के लिए भोजन का कुछ हिस्सा अलग रखने की परंपरा है।
कई घरों में चींटियों के लिए आटा, चीनी या भोजन के छोटे कण जमीन पर रखे जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, छोटे जीवों को भोजन कराने से पुण्य मिलता है और यह सभी प्राणियों के प्रति दया और सह-अस्तित्व की भावना का प्रतीक माना जाता है।
पितृ पक्ष में पंचबलि की परंपरा का महत्व
कुल मिलाकर, पितृ पक्ष में गाय, कौआ, कुत्ता, चींटियों और अन्य जीवों को भोजन कराने की परंपरा को पंचबलि से जोड़कर देखा जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसकी विधि और मान्यताओं में अंतर हो सकता है।
धार्मिक दृष्टि से इस परंपरा का मूल भाव पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के साथ-साथ जीव-जंतुओं के प्रति करुणा और सेवा की भावना को बढ़ावा देना है।
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।









