Chhath Puja 2026: छठ पूजा में एक ऐसी परंपरा है, जो इसे दूसरे त्योहारों से अलग बनाती है। आमतौर पर लोग उगते हुए सूर्य को जल चढ़ाकर उनकी पूजा करते हैं, लेकिन छठ महापर्व में पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके अगले दिन सुबह उगते सूर्य की पूजा के साथ व्रत का समापन होता है। आखिर छठ पूजा में पहले अस्त होते सूर्य की आराधना क्यों की जाती है? इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है और उषा-प्रत्यूषा का सूर्य देव से क्या संबंध है? आइए जानते हैं इस अनोखी परंपरा का महत्व।
छठ पूजा में पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की क्या है परंपरा?
छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला लोक आस्था का महापर्व है। इसके तीसरे दिन यानी कार्तिक शुक्ल षष्ठी को व्रती नदी, तालाब या अन्य जलाशयों के किनारे पहुंचकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस अनुष्ठान को संध्या अर्घ्य कहा जाता है।
इसके बाद अगले दिन सुबह सूर्योदय से पहले व्रती घाट पर पहुंचते हैं और उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। इसे उषा अर्घ्य कहा जाता है। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है। छठ पूजा की यही विशेषता इसे अन्य सूर्य उपासना से अलग बनाती है। इसमें अस्त होते और उगते, दोनों सूर्य की आराधना की जाती है।
उषा और प्रत्यूषा से जुड़ी है धार्मिक मान्यता
छठ पूजा में सूर्य देव के साथ उनकी शक्तियों की भी आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उषा को सुबह की पहली किरण और प्रत्यूषा को शाम की अंतिम किरण से जोड़कर देखा जाता है।
मान्यता है कि संध्या अर्घ्य के समय व्रती प्रत्यूषा और सुबह उषा को नमन करते हैं। इस तरह छठ पूजा में सूर्य की दोनों अवस्थाओं और उनसे जुड़ी शक्तियों की उपासना की जाती है। यही वजह है कि छठ में केवल उगते सूर्य की ही नहीं, बल्कि डूबते सूर्य की भी समान श्रद्धा से पूजा होती है।
डूबते सूर्य को अर्घ्य देना सिखाता है जीवन का बड़ा संदेश
छठ पूजा में डूबते सूर्य की पूजा को एक गहरे सामाजिक और भावनात्मक संदेश से भी जोड़कर देखा जाता है। कहते हैं कि उगते सूर्य को तो हर कोई प्रणाम करता है, लेकिन छठ की परंपरा हमें अस्त होते सूर्य का भी सम्मान करना सिखाती है।
इसे जीवन के हर पड़ाव को स्वीकार करने, मेहनत के बाद मिले परिणाम के लिए आभार जताने और हर परिस्थिति में सम्मान बनाए रखने का प्रतीक माना जाता है। यानी छठ पूजा का संदेश है कि सम्मान और कृतज्ञता केवल सफलता के समय ही नहीं, बल्कि जीवन के हर चरण में होनी चाहिए।
छठ पूजा में शाम को पहले और सुबह को बाद में क्यों देते हैं अर्घ्य?
छठ पूजा में दोनों अर्घ्य का अपना अलग धार्मिक महत्व है।
- संध्या अर्घ्य: तीसरे दिन सूर्यास्त के समय डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसे प्रत्यूषा की आराधना से भी जोड़ा जाता है।
- उषा अर्घ्य: चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसे उषा की आराधना और नई ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, दोनों अर्घ्य मिलकर सूर्य देव की संपूर्ण आराधना को दर्शाते हैं। एक तरफ दिन के समापन के समय आभार व्यक्त किया जाता है, तो दूसरी तरफ नए सवेरे का स्वागत किया जाता है।
महाभारत के कर्ण से भी जुड़ी है सूर्य उपासना की मान्यता
छठ पूजा को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें महाभारत के कर्ण की कहानी भी काफी लोकप्रिय है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, कर्ण सूर्य देव के पुत्र थे और नियमित रूप से उनकी उपासना करते थे। कहा जाता है कि वह प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य देते और जरूरतमंदों को दान करते थे।
इसी वजह से कई लोककथाओं में कर्ण की सूर्य उपासना को छठ पर्व से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, इसे छठ पूजा की ऐतिहासिक शुरुआत का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देने का क्या है महत्व?
छठ पूजा की एक खास पहचान यह है कि व्रती नदी, तालाब या अन्य जलाशयों में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। इस दौरान बांस के सूप और दउरा में ठेकुआ, नारियल, गन्ना, मौसमी फल और अन्य पूजा सामग्री रखी जाती है। व्रती पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ सूर्य देव और छठी मैया की पूजा करते हैं। इस परंपरा को प्रकृति के प्रति सम्मान और सूर्य तथा जल के जीवनदायी महत्व को स्वीकार करने के रूप में भी देखा जाता है।
छठ पूजा में डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के पीछे क्या है वैज्ञानिक कारण?
छठ पूजा को प्रकृति से जुड़ा पर्व माना जाता है। सूर्य की रोशनी और ऊर्जा पृथ्वी पर जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसी वजह से भारतीय परंपरा में सूर्य की उपासना का विशेष स्थान रहा है।
हालांकि, छठ में पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के पीछे कोई एक प्रमाणित वैज्ञानिक कारण स्थापित नहीं है। इसे मुख्य रूप से धार्मिक आस्था, लोकपरंपरा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता से जोड़कर समझना चाहिए।
छठ पूजा का सबसे बड़ा संदेश क्या है?
छठ पूजा हमें प्रकृति के प्रति सम्मान, अनुशासन, संयम और कृतज्ञता का संदेश देती है। इस पर्व में डूबते और उगते दोनों सूर्य को अर्घ्य देना जीवन के हर चरण का सम्मान करने की सीख देता है।
यही वजह है कि बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में छठ महापर्व का विशेष महत्व है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु परिवार के साथ घाटों पर पहुंचकर सूर्य देव और छठी मैया की आराधना करते हैं।
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।









