Ranchi: राजधानी रांची में आज आदिवासी महाजुटान सभा का आयोजन किया गया। इस महाजुटान में राज्य भर से लाखों आदिवासी और कई बड़े नेता शामिल हुए। मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने सभा को संबोधित करते हुए केन्द्र सरकार पर बड़ा हमला बोला है। उन्होंने परिसीमन के मुद्दे पर केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि परिसीमन सिर्फ विधानसभा और लोकसभा की सीटों का मामला नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि आने वाले समय में आदिवासी समाज की आवाज कितनी मजबूत होगी।
आदिवासी समाज अपने प्रतिनिधित्व का फैसला खुद करेगा
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपने प्रतिनिधित्व का फैसला खुद करेगा। उन्होंने दावा किया कि 2007 में आदिवासी सीटों में कमी की आशंका के बीच कांग्रेस ने दिल्ली में परिसीमन रोकने का काम किया था और इसे 2026 तक टाल दिया गया था। उन्होंने कहा कि अब एक बार फिर आदिवासी समाज के सामने यह चुनौती खड़ी है।
अपने संबोधन में तिर्की ने आदिवासी जमीन, पलायन और घटती आबादी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने सीएनटी, एसपीटी, पेसा और पांचवीं अनुसूची जैसे प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कानूनों के बावजूद यदि आदिवासियों की जमीन गई, परिवारों को पलायन करना पड़ा और आबादी में कमी आई, तो इसके लिए आदिवासी समाज को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
समाज को इतिहास में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला
उन्होंने संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस समाज को इतिहास में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला, उसकी मौजूदा संख्या के आधार पर उसके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को तय करना उचित नहीं होगा।
तिर्की ने झारखंड में दूसरे राज्यों से आए लोगों के बसने और जमीन लेने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि रोजगार के लिए आने का सिलसिला परिवार और जमीन तक पहुंचा है। इसी संदर्भ में उन्होंने शहरों और गांवों में ठेला, खोमचा और सब्जी कारोबार करने वालों का उदाहरण देते हुए जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर आदिवासी प्रतिनिधित्व घटाने पर सवाल उठाया।
विरोध को गांव से लेकर सड़क, सदन और दिल्ली तक ले जाया जाएगा
उन्होंने कहा कि इस विरोध को गांव-घर से लेकर सड़क, सदन और दिल्ली तक ले जाया जाएगा। उन्होंने इसे केवल आदिवासी समाज की नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी-मूलवासी समाज की लड़ाई बताया।
सभा में उन्होंने खाट-खलिहान अधिनियम में संशोधन का भी मुद्दा उठाया और दावा किया कि इससे झारखंड को 22 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि खनन कंपनियों से मिलने वाले राजस्व का इस्तेमाल राज्य सरकार मंईयां सम्मान योजना, सड़क, अबुआ आवास, पेंशन और अस्पताल जैसी योजनाओं में करती है।
उन्होंने केंद्र सरकार पर खनन कंपनियों के हित में काम करने का आरोप लगाते हुए कहा कि झारखंड के अधिकारों और यहां के लोगों के हितों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

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