Ranchi: राजधानी रांची में आयोजित आदिवासी महाजुटान सभा में आदिवासी नेत्री ज्योत्सना केरकेट्टा ने प्रस्तावित परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया तो झारखंड में आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर होगा। उन्होंने दावा किया कि इसका असर आने वाले समय में राज्य के राजनीतिक नेतृत्व पर भी पड़ेगा।
केंद्र की नीतियों का फायदा बड़े उद्योगपतियों को मिल रहा
उन्होंने झारखंड की खनिज संपदा का मुद्दा उठाते हुए कहा कि राज्य देश को बड़ी मात्रा में खनिज उपलब्ध कराता है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र की नीतियों का फायदा बड़े उद्योगपतियों को मिल रहा है। उन्होंने सरकार की नीतियों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर भी निशाना साधा तथा अडानी-अंबानी का नाम लेकर राजनीतिक आरोप लगाए।
अपने संबोधन में उन्होंने महाजुटान में जुटी भीड़ को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर भी प्रतिक्रिया दी। केरकेट्टा ने चर्च से फंडिंग के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि सभा में आदिवासी समाज के लोग खुद पहुंचे हैं। उन्होंने जांच एजेंसियों के माध्यम से फंडिंग की जांच कराने की चुनौती भी दी।
सरना और ईसाई आदिवासी समाज को धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश
आदिवासी समाज के भीतर धार्मिक विभाजन को लेकर भी उन्होंने भाजपा और आरएसएस से जुड़े लोगों पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि सरना और ईसाई आदिवासी समाज को धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक परिसीमन की लड़ाई धार्मिक नहीं, बल्कि आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व बचाने की लड़ाई है।
केरकेट्टा ने कहा कि अनुसूचित जनजाति को आरक्षण धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर मिला है। उन्होंने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि यदि पार्टी आदिवासी सीटों के संरक्षण का समर्थन नहीं करती है तो भविष्य में किसी सामान्य सीट से आदिवासी उम्मीदवार को टिकट देने पर भी सवाल उठेंगे।
झारखंड के अन्य जिलों तक ले जाया जाएगा विरोध
उन्होंने कहा कि रांची से शुरू हुआ विरोध अब झारखंड के अन्य जिलों तक ले जाया जाएगा। उन्होंने आदिवासी समाज से परिसीमन की प्रक्रिया के खिलाफ एकजुट होकर आंदोलन करने का आह्वान किया।
सभा में उन्होंने झारखंड की जमीन और खनिज संसाधनों के मुद्दे को भी आदिवासी अधिकारों से जोड़ा और कहा कि संसाधनों के बावजूद राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम होना आदिवासी समाज के हित में नहीं है। भाषण के अंत में उन्होंने ‘जय झारखंड’ और ‘जय आदिवासी’ के नारे के साथ अपना संबोधन समाप्त किया।

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