हाइलाइट्स:
- एनआईए कोर्ट ने सभी आरोपियों को यूएपीए और आर्म्स एक्ट समेत सभी धाराओं से बरी किया
- अदालत ने कहा, धमाका हुआ था लेकिन बम का मोटरसाइकिल से जुड़ाव साबित नहीं हुआ
- जांच में गंभीर खामियां, पंचनामा में स्केच नहीं, सबूत दूषित, फिंगरप्रिंट और डेटा नदारद
- साध्वी प्रज्ञा बोलीं: भगवा को बदनाम करने की साजिश थी, आज सत्य की जीत हुई
Malegaon Blast Case: मालेगांव बम धमाका मामले (Malegaon Blast Case 2008) में एनआईए (NIA) कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि न तो विस्फोटकों को जोड़ने का कोई पुख्ता सबूत मिला, न ही धमाके से संबंधित मोटरसाइकिल और आरोपियों के बीच कोई सीधा संबंध सिद्ध किया जा सका।
अदालत ने साफ किया कि यूएपीए (UAPA) के तहत कार्रवाई की अनुमति नियमों के अनुसार नहीं ली गई थी, जिसके चलते यह कानून लागू नहीं हो सकता। साथ ही कोर्ट ने यह भी बताया कि मामले में एटीएस (ATS) द्वारा की गई जांच में कई खामियां थीं, जैसे कि घटनास्थल का स्केच न बनाना, सबूतों का दूषित होना, और मोबाइल फोन को बिना कानूनी अनुमति टैप किया जाना।
जांच में गंभीर लापरवाही के आरोप
कोर्ट के अनुसार, विस्फोट की जिम्मेदार बताई गई मोटरसाइकिल के चेसिस नंबर स्पष्ट नहीं थे, और न ही यह साबित हो पाया कि धमाके के समय वह साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के पास थी।
इसके अतिरिक्त, अदालत ने यह भी पाया कि विस्फोट स्थल पर मिले मोबाइल और वाहनों का आरोपियों से कोई स्पष्ट संबंध नहीं था।
वकीलों और आरोपियों की प्रतिक्रियाएं
आरोपी सुधाकर चतुर्वेदी के वकील एडवोकेट रंजीत नायर ने कहा –
“कोर्ट ने माना कि इस केस की नींव ही कमजोर थी। गवाह नहीं थे, सबूत नहीं थे, और जांच पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण थी।”
वहीं, आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने भावुक प्रतिक्रिया में कहा –
“मेरी जिंदगी को तबाह कर दिया गया। मुझे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। यह भगवा और हिंदुत्व को बदनाम करने की साजिश थी। आज न्याय मिला है और सच्चाई की जीत हुई है।”
राजनीतिक माहौल और कोर्ट की टिप्पणी
एनआईए कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि उस समय की सरकार (एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन) ने राजनीतिक लाभ के उद्देश्य से फोन टैपिंग करवाई थी, और इसका कोई वैध आधार नहीं था।
2008 मालेगांव विस्फोट केस, जो कि वर्षों तक सुर्खियों में रहा और जिसमें कई प्रमुख नामों को आरोपी बनाया गया, आखिरकार सबूतों के अभाव और जांच में खामियों के कारण न्यायिक निष्कर्ष तक पहुंचा। अदालत का यह फैसला सिर्फ आरोपियों के लिए राहत नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा करता है।













