Jharkhand: 4 अगस्त 2025 यह दिन झारखंड के इतिहास में हमेशा शोक के रूप में याद रखा जाएगा। झारखंड आंदोलन के प्रणेता, तीन बार के मुख्यमंत्री और आदिवासी चेतना के प्रतीक शिबू सोरेन अब हमारे बीच नहीं रहे। 81 वर्षीय ‘दिशोम गुरु’ ने दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में अंतिम सांस ली, लेकिन उनके विचार और संघर्ष की विरासत झारखंड की हर मिट्टी में गूंजती रहेगी।
‘दिशोम गुरु’ क्या है और शिबू सोरेन को यह उपाधि कैसे मिली?
‘दिशोम गुरु’ की उपाधि कोई सरकारी तमगा नहीं, बल्कि जनमानस से निकला सम्मान है। यह शब्द संथाली भाषा से आया है –
- ‘दिशोम’ का अर्थ होता है देश या समुदाय,
- ‘गुरु’ का अर्थ है मार्गदर्शक या नेता।
शिबू सोरेन को यह उपाधि इसलिए मिली क्योंकि उन्होंने न केवल आदिवासी समाज के अधिकारों की लड़ाई लड़ी, बल्कि उन्हें सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से संगठित करने में अग्रणी भूमिका निभाई।
‘धान काटो आंदोलन’ से शुरू हुआ संघर्ष
1960 और 70 के दशक में जब महाजनी प्रथा और शोषण चरम पर था, शिबू सोरेन ने ‘धान काटो आंदोलन’ शुरू किया, जिसमें महिलाएं धान काटती थीं और पुरुष तीर-धनुष से उनकी रक्षा करते थे। यह आंदोलन सिर्फ़ ज़मीन या अनाज का संघर्ष नहीं था, यह एक सामाजिक क्रांति थी।
जीवन यात्रा: खेत से संसद तक
- जन्म: 11 जनवरी 1944, नेमरा गांव (रामगढ़, झारखंड)
- ट्रैजिक मोड़: 13 वर्ष की उम्र में पिता की महाजनों द्वारा हत्या
- राजनीतिक शुरुआत: 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना
- पहला चुनाव: 1977 (पराजय)
- पहली जीत: 1980, दुमका से लोकसभा सांसद
- अलग राज्य की मांग: दशकों की मेहनत के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड बना भारत का 28वां राज्य
- मुख्यमंत्री कार्यकाल: 2005, 2008, 2009
- लोकसभा सांसद: 8 बार
- केंद्रीय मंत्री: कोयला मंत्रालय सहित कई अहम जिम्मेदारियाँ
हेमंत सोरेन की श्रद्धांजलि: “बाबा ने हमें सिर्फ रास्ता नहीं दिखाया, चलना सिखाया”
शिबू सोरेन के पुत्र और पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक भावनात्मक संदेश ट्विटर पर साझा किया:
“मैं अपने जीवन के सबसे कठिन दिनों से गुज़र रहा हूँ। मेरे सिर से सिर्फ पिता का साया नहीं गया, झारखंड की आत्मा का स्तंभ चला गया।”
हेमंत ने याद किया कि कैसे उनका बचपन गरीबी और संघर्ष में बीता, पर उनके ‘बाबा’ ने हमेशा जनता का दुःख समझा, उनका नेतृत्व किया, और सत्ता को कभी अपना लक्ष्य नहीं बनाया।
“जब मैं पूछता था – बाबा, आपको लोग दिशोम गुरु क्यों कहते हैं? तो वो कहते थे – बेटा, मैंने उनका दुख समझा और उनकी लड़ाई अपनी बना ली।”
उनके अनुसार, यह उपाधि किसी किताब में नहीं लिखी गई, न ही किसी संसद ने दी, बल्कि झारखंड की जनता के दिल से निकली थी।
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विरासत जो कभी नहीं मिटेगी
शिबू सोरेन का मानना था कि सत्ता साधन है, साध्य नहीं। उन्होंने आदिवासी समाज को सिखाया कि “अधिकार मांगने से नहीं, संघर्ष करने से मिलते हैं।”
उनके विचारों में गांव-केंद्रित अर्थव्यवस्था, सामूहिक खेती, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की झलक थी।
अंतिम संदेश
हेमंत सोरेन ने कहा:
“आपने अपना धर्म निभा दिया बाबा, अब हमें चलना है – आपके नक्शे-कदम पर। झारखंड आपका कर्ज़दार रहेगा। दिशोम गुरु अमर रहें।”
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विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
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