रांची: झारखंड के लिए गर्व का क्षण तब सामने आया जब संत जेवियर्स कॉलेज, रांची के प्राचार्य डॉ. फादर रॉबर्ट प्रदीप कुजूर, एसजे ने यूनाइटेड किंगडम स्थित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के हैरिस मैनचेस्टर कॉलेज में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया। 20 से 22 जुलाई 2026 तक आयोजित इस वैश्विक सम्मेलन में दुनिया भर के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों ने भाग लिया।
इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय था “Shaping the Future: Innovation, Technology & Business in a Changing World”, जिसमें बदलती दुनिया में विकास, तकनीक और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई।
जादूगोड़ा और झरिया के विस्थापन का उठाया मुद्दा
डॉ. कुजूर ने अपने शोध में झारखंड के जादूगोड़ा यूरेनियम खदान और झरिया कोयला क्षेत्र में खनन गतिविधियों के कारण होने वाले विस्थापन और उसके मानवीय प्रभावों को विस्तार से प्रस्तुत किया।
शोध के अनुसार, खनन परियोजनाओं की वजह से हजारों लोगों को अपने घर, जमीन और आजीविका से दूर होना पड़ा है। इसका सीधा असर उनके रोजगार, आय, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक जीवन पर पड़ा है। अध्ययन में यह भी बताया गया कि विस्थापन केवल भौतिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को भी प्रभावित करता है।
मानवीय मूल्यों और सतत विकास पर हुई चर्चा
डॉ. कुजूर के शोध पत्र ने सम्मेलन में मौजूद अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के बीच सतत विकास, सामाजिक न्याय और कॉर्पोरेट उत्तरदायित्व जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा को जन्म दिया। प्रतिभागियों ने खनन प्रभावित समुदायों की चुनौतियों और विकास की मौजूदा नीतियों पर विचार साझा किए।
प्रतिष्ठित शिक्षाविदों की मौजूदगी में हुआ आयोजन
इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का संचालन प्रतिष्ठित शिक्षाविद ब्रायन माउंटफोर्ड (Brian Mountford) और एफ. किंग अलेक्जेंडर (F. King Alexander) ने किया। कार्यक्रम में विभिन्न देशों के शिक्षाविदों, नीति विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने भाग लेकर वैश्विक चुनौतियों और उनके समाधान पर विचार-विमर्श किया।
झारखंड के लिए गर्व की उपलब्धि
ऑक्सफोर्ड जैसे विश्वप्रसिद्ध शैक्षणिक संस्थान में झारखंड के सामाजिक मुद्दों पर शोध प्रस्तुत होना राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। डॉ. फादर रॉबर्ट प्रदीप कुजूर की यह प्रस्तुति न केवल शिक्षा और शोध के क्षेत्र में उनकी उपलब्धि है, बल्कि झारखंड के खनन प्रभावित समुदायों की आवाज को वैश्विक मंच तक पहुंचाने का भी एक महत्वपूर्ण प्रयास है।









