रांची। झारखंड को देश के सबसे खनिज-संपन्न राज्यों में गिना जाता है। कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, तांबा, यूरेनियम और कई दूसरे खनिज राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभाते हैं। लेकिन खनिज संपदा से होने वाली कमाई और खनन प्रभावित इलाकों के विकास के बीच का अंतर लंबे समय से सवाल खड़े करता रहा है।
अब यही सवाल एक नए कानूनी और संवैधानिक विवाद से जुड़ गया है।
Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Act, 2026 (MMDR) संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुका है और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बन चुका है। इस कानून में केंद्र सरकार को खनिज-युक्त भूमि के नियमन के संबंध में अतिरिक्त अधिकार देने और राज्यों द्वारा खनिज अधिकारों तथा खनिज-युक्त भूमि पर लगाए जाने वाले कुछ कर, उपकर या अन्य लेवी पर केंद्रीय शर्तें लागू करने का प्रावधान किया गया है।
यहीं से झारखंड समेत खनिज संपन्न राज्यों की चिंता शुरू होती है।
आखिर विवाद है किस बात पर?
साधारण भाषा में समझें तो विवाद सिर्फ खनन या रॉयल्टी का नहीं है। असली सवाल यह है कि खनिज वाली जमीन पर टैक्स लगाने का अधिकार किसके पास होगा और उस अधिकार की सीमा कौन तय करेगा?
केंद्र सरकार का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कर और लेवी से खनन कंपनियों की लागत बढ़ती है, निवेश प्रभावित होता है और खनिज क्षेत्र में अनिश्चितता पैदा होती है। सरकार का कहना है कि एक अधिक समान और अनुमानित व्यवस्था से निवेश को बढ़ावा मिलेगा तथा देश में महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और उत्पादन तेज हो सकेगा। वहीं, राज्यों की चिंता यह है कि खनिज-युक्त भूमि और उस पर कर लगाने की उनकी संवैधानिक शक्तियों को सीमित करने से राज्यों के राजस्व और संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है।
2024 के सुप्रीम कोर्ट फैसले ने बदली थी तस्वीर
इस विवाद की जड़ 25 जुलाई 2024 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले तक जाती है।
Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India Limited मामले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बहुमत से स्पष्ट किया था कि रॉयल्टी को टैक्स नहीं माना जा सकता और राज्यों के पास खनिज अधिकारों पर कर लगाने की संवैधानिक शक्ति है। फैसले में संविधान की Seventh Schedule की Entry 49 और Entry 50 से जुड़े अधिकारों की भी व्याख्या की गई।
PRS के विश्लेषण के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि संसद की खनिज विकास संबंधी शक्ति के तहत Entry 50 के अंतर्गत खनिज अधिकारों पर राज्य के कराधान को सीमित किया जा सकता है, लेकिन भूमि पर कर लगाने की Entry 49 वाली राज्य की शक्ति अलग संवैधानिक आधार पर है।
यही अंतर 2026 के नए कानून को लेकर संवैधानिक बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
MMDR Amendment Act 2026 में क्या बदला?
नए कानून का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खनिज-युक्त भूमि के नियमन से जुड़ा है।
PRS के अनुसार, संशोधन के बाद केंद्र सरकार को खनिज-युक्त भूमि के नियमन पर नियंत्रण का अधिकार देने का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही राज्य सरकारों द्वारा खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर लगाए जाने वाले टैक्स, सेस या अन्य लेवी को केंद्रीय सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों या प्रतिबंधों के अधीन किया गया है।
इसका मतलब यह नहीं है कि राज्य की जमीन केंद्र की जमीन हो गई। बल्कि विवाद मुख्य रूप से नियमन और कराधिकार की सीमा को लेकर है।
यही वजह है कि इस कानून पर राजनीतिक के साथ-साथ संवैधानिक बहस भी तेज हुई है।
केंद्र सरकार का पक्ष क्या है?
केंद्रीय खान मंत्रालय के अनुसार, संशोधन का उद्देश्य खनन क्षेत्र में स्थिरता, निश्चितता और पूर्वानुमेयता लाना है।
सरकार का कहना है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग टैक्स, सेस और लेवी से खनन परियोजनाओं की लागत बढ़ती है। कई बार खनन शुरू होने के बाद नई लेवी लगाए जाने से निवेश का जोखिम बढ़ता है।
केंद्र के मुताबिक, नई व्यवस्था से निवेश का माहौल बेहतर होगा और देश को महत्वपूर्ण तथा रणनीतिक खनिजों की जरूरत पूरी करने में मदद मिलेगी।
सरकार ने यह भी कहा है कि संशोधन राज्यों से जमीन या खनिजों पर उनके अधिकार नहीं छीनता और खनन से जुड़े कुल कर एवं वैधानिक भुगतान का बड़ा हिस्सा आगे भी राज्यों को मिलता रहेगा।
झारखंड क्यों चिंतित है?
झारखंड की अर्थव्यवस्था में खनन की भूमिका बहुत बड़ी है। राज्य के कई जिलों में कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, तांबा और अन्य खनिजों का खनन होता है।
लेकिन खनन का दूसरा चेहरा भी है।
खनन क्षेत्रों में जमीन धंसने, प्रदूषण, विस्थापन, पानी की समस्या, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा रोजगार से जुड़े सवाल लंबे समय से उठते रहे हैं।
यही कारण है कि झारखंड सरकार के लिए खनिज से मिलने वाला राजस्व सिर्फ सरकारी खाते का आंकड़ा नहीं है। सरकार का तर्क है कि खनन से जुड़े राजस्व का इस्तेमाल राज्य के विकास और खनन प्रभावित क्षेत्रों की जरूरतों को पूरा करने में किया जाता है।
₹22,000 करोड़ का आंकड़ा क्यों चर्चा में है?
झारखंड सरकार की ओर से सामने रखे गए आंकड़ों में 2024-25 से 2026-27 के बीच करीब ₹22,082 करोड़ के संभावित राजस्व का उल्लेख किया गया है।
यह आंकड़ा राज्य सरकार द्वारा खनिज-युक्त भूमि पर कर/सेस से जुड़े राजस्व के संदर्भ में उठाया गया है। इसे सीधे-सीधे “रॉयल्टी” या DMF की रकम समझना सही नहीं होगा।
यही अंतर इस पूरे विवाद को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
रॉयल्टी, DMF और mineral-bearing land tax तीन अलग-अलग वित्तीय व्यवस्थाएं हैं।
इसलिए ₹22,082 करोड़ को “झारखंड की कुल खनन आय” बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
DMF क्या है और इसका इससे क्या संबंध है?
खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए District Mineral Foundation यानी DMF की व्यवस्था की गई है।
DMF का उद्देश्य खनन से प्रभावित लोगों और क्षेत्रों के हित में विकास कार्यों को वित्तीय सहायता देना है।
स्कूल, स्वास्थ्य, पेयजल, आजीविका, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कामों में DMF की भूमिका महत्वपूर्ण है।
लेकिन यहां एक जरूरी तथ्य समझना होगा:
MMDR Amendment Act में राज्यों की DMF व्यवस्था को सीधे खत्म करने का प्रावधान बताना सही नहीं होगा।
इसलिए यह कहना कि “नया कानून आते ही DMF का पैसा बंद हो जाएगा” फिलहाल एक स्थापित तथ्य नहीं है।
झारखंड के खनिज क्षेत्र की तस्वीर
झारखंड का खनिज भूगोल काफी विविध है।
पश्चिमी सिंहभूम: लौह अयस्क का बड़ा केंद्र
पश्चिमी सिंहभूम में लौह अयस्क के बड़े भंडार और महत्वपूर्ण खनन क्षेत्र हैं। नोआमुंडी, किरीबुरू और मेघाहातुबुरू जैसे क्षेत्र देश के लौह-अयस्क उद्योग के लिए महत्वपूर्ण हैं।
यह क्षेत्र झारखंड के औद्योगिक इतिहास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
पूर्वी सिंहभूम: तांबा और यूरेनियम
पूर्वी सिंहभूम का जादूगोड़ा क्षेत्र यूरेनियम खनन के लिए जाना जाता है। इसके अलावा घाटशिला क्षेत्र में तांबे से जुड़ी खनन गतिविधियों का भी लंबा इतिहास रहा है।
धनबाद: कोयले का बड़ा इलाका
धनबाद और खासकर झरिया कोलफील्ड झारखंड की खनिज अर्थव्यवस्था का सबसे चर्चित चेहरा है।
झरिया का कोकिंग कोल भारत के इस्पात उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन यही इलाका भूमिगत आग, जमीन धंसने, विस्थापन और पर्यावरणीय समस्याओं के कारण भी लंबे समय से चर्चा में रहा है।
बोकारो और रामगढ़
बोकारो और रामगढ़ में भी कोयला खनन की महत्वपूर्ण गतिविधियां हैं। बोकारो का इस्पात उद्योग और आसपास का खनन क्षेत्र एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
लोहरदगा और आसपास: बॉक्साइट
लोहरदगा क्षेत्र बॉक्साइट के लिए जाना जाता है। बॉक्साइट एल्युमिनियम उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है।
कोडरमा: अभ्रक की पहचान
कोडरमा और आसपास का क्षेत्र लंबे समय तक अभ्रक यानी Mica के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध रहा है।
इस तरह झारखंड की खनिज अर्थव्यवस्था सिर्फ कोयले तक सीमित नहीं है।
क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद बदल सकती है?
यही इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील संवैधानिक प्रश्न है।
केंद्र सरकार का कहना है कि संसद को खनिज विकास और नियमन से जुड़े कानून बनाने का अधिकार है। नए कानून का उद्देश्य कर व्यवस्था में एकरूपता और स्थिरता लाना है।
दूसरी ओर, संवैधानिक विशेषज्ञों की बहस का केंद्र यह है कि क्या संसद Entry 54 के तहत कानून बनाकर राज्यों की Entry 49 के तहत भूमि पर कर लगाने की शक्ति को सीमित कर सकती है?
PRS ने भी इस मुद्दे को बिल के प्रमुख विचारणीय प्रश्नों में शामिल किया है। उसके अनुसार, संसद की mineral development संबंधी शक्ति और राज्यों की land taxation power के बीच संवैधानिक सीमा महत्वपूर्ण सवाल बनती है।
इसलिए यह मामला आगे न्यायिक समीक्षा तक पहुंचता है या नहीं, यह आने वाले समय में महत्वपूर्ण रहेगा।
MMDR Act में और क्या बदलाव हुए?
नए संशोधन का दायरा सिर्फ टैक्स विवाद तक सीमित नहीं है।
इसमें मौजूदा खनन पट्टों में अतिरिक्त खनिजों को शामिल करने की व्यवस्था को आसान बनाने, महत्वपूर्ण एवं रणनीतिक खनिजों की खोज को बढ़ावा देने और captive mines से खनिजों की बिक्री से जुड़े प्रावधानों में बदलाव जैसे कदम भी शामिल हैं।
केंद्र का मानना है कि इससे भारत में खनिज खोज और उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
खनन कंपनियों के लिए क्या बदलेगा?
उद्योग के नजरिए से देखें तो सबसे बड़ा फायदा policy certainty का हो सकता है।
यदि अलग-अलग राज्यों में खनिजों पर अलग-अलग प्रकार की अप्रत्याशित लेवी कम होती है, तो कंपनियों के लिए परियोजना की लागत और भविष्य के निवेश का अनुमान लगाना आसान हो सकता है।
लेकिन दूसरी तरफ, राज्य सरकारें इसे अपने राजस्व और संवैधानिक अधिकारों के दृष्टिकोण से देख रही हैं।
यानी एक ही कानून को केंद्र, राज्य और उद्योग—तीन अलग-अलग नजरियों से देख रहे हैं।
असली सवाल खनन प्रभावित गांवों का है
राजनीतिक और संवैधानिक बहस अपनी जगह है। लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उन लोगों का है जो खदानों के सबसे करीब रहते हैं।
जिस क्षेत्र से करोड़ों-करोड़ रुपये का खनिज निकलता है, वहां अगर स्कूल की इमारत जर्जर है, अस्पताल में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं, पेयजल की समस्या है या सड़क खराब है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि खनिज संपदा का लाभ स्थानीय लोगों तक कितना पहुंचा?
यही वह सवाल है जिसे DMF और खनन से जुड़े अन्य विकास कार्यक्रमों के जरिए हल करने की कोशिश की जाती रही है।
लेकिन केवल राजस्व की मात्रा पर्याप्त नहीं है। महत्वपूर्ण यह भी है कि पैसा कहां, कैसे और कितनी पारदर्शिता के साथ खर्च हो रहा है।
अब आगे क्या?
MMDR Amendment Bill 2026 अब सिर्फ संसद की बहस का विषय नहीं रहा। संसद के दोनों सदनों से पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन चुका है।
अब असली सवाल इसके कार्यान्वयन, नियमों और राज्यों के अधिकारों की व्यावहारिक सीमा को लेकर है।
यदि राज्य सरकारें मानती हैं कि कानून उनकी संवैधानिक शक्तियों को प्रभावित करता है, तो न्यायिक चुनौती का रास्ता भी खुला है।
खनिज की लड़ाई से बड़ा है अधिकार का सवाल
झारखंड की पहचान उसके जंगल, जमीन और खनिजों से बनी है। लेकिन खनिज संपदा तभी विकास का आधार बन सकती है, जब उसका लाभ खनन प्रभावित लोगों तक भी पहुंचे।
MMDR Amendment Act 2026 ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि भारत के संघीय ढांचे में केंद्र और राज्यों के अधिकारों की सीमा कहां तय होती है।
केंद्र इसे खनन क्षेत्र में स्थिरता, निवेश और महत्वपूर्ण खनिजों की आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बता रहा है।
वहीं झारखंड जैसे खनिज संपन्न राज्य इसे अपने वित्तीय और संवैधानिक अधिकारों के नजरिए से देख रहे हैं।
आखिरकार सवाल सिर्फ ₹22 हजार करोड़ का नहीं है।
सवाल यह है कि जिस जमीन से देश की अर्थव्यवस्था के लिए खनिज निकलते हैं, उस जमीन पर रहने वाले लोगों के विकास का फैसला किसके हाथ में होगा?
और उससे भी बड़ा सवाल—
क्या खनिज संपदा का वास्तविक लाभ उन गांवों तक पहुंच पाएगा, जहां से देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था के लिए कच्चा माल निकलता है?
यही MMDR Amendment Act 2026 की सबसे बड़ी बहस है—और झारखंड इस बहस के केंद्र में है।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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