Kachan Devi Tradition: छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा मनाने का तरीका देश के दूसरे हिस्सों से काफी अलग है। यहां उत्सव की शुरुआत से पहले काछन देवी से अनुमति लेने की अनूठी परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान पनका समुदाय की एक कुंवारी कन्या को कांटेदार बेलों से बने विशेष झूले पर लिटाया जाता है। मान्यता है कि इस रस्म के जरिए काछन देवी की स्वीकृति प्राप्त की जाती है। आखिर क्या है काछन गादी की परंपरा और क्यों इसे बस्तर दशहरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है? आइए जानते हैं।
क्या है काछन देवी की परंपरा?
छत्तीसगढ़ के बस्तर का दशहरा अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं और जनजातीय परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां दशहरा केवल रावण दहन या भगवान राम की विजय का पर्व नहीं, बल्कि स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का उत्सव भी है।
इसी परंपरा से जुड़ी है काछन देवी की पूजा, जिसे बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्मों में गिना जाता है। जगदलपुर स्थित काछनगुड़ी में आयोजित होने वाली इस रस्म में स्थानीय समुदाय की अहम भूमिका होती है।
कांटों के झूले पर क्यों लिटाई जाती है कुंवारी कन्या?
काछन देवी से जुड़ी रस्म को काछन गादी के नाम से जाना जाता है। इस अनुष्ठान में पनका समुदाय की एक कुंवारी कन्या को देवी का प्रतीक माना जाता है। स्थानीय धार्मिक विश्वास के अनुसार, अनुष्ठान के दौरान कन्या पर काछन देवी का प्रभाव या सवारी आती है। इसके बाद कांटेदार बेलों से तैयार विशेष झूले पर कन्या को लिटाकर पारंपरिक धार्मिक रस्म पूरी की जाती है। यह दृश्य बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को सामने लाता है।
स्थानीय लोगों की आस्था है कि इस अनुष्ठान के माध्यम से देवी की उपस्थिति और उनकी स्वीकृति का प्रतीकात्मक अनुभव किया जाता है। हालांकि, इस परंपरा से जुड़ी मान्यताएं धार्मिक विश्वास का हिस्सा हैं, जिन्हें उसी सांस्कृतिक संदर्भ में समझना जरूरी है।
काछन देवी की अनुमति के बाद आगे बढ़ता है दशहरा उत्सव
बस्तर दशहरा में काछन गादी का महत्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है। इस रस्म के पूरा होने के बाद बस्तर राजपरिवार के सदस्य काछन देवी से दशहरा उत्सव आगे बढ़ाने की अनुमति मांगते हैं। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, देवी की स्वीकृति मिलने के बाद ही उत्सव की अगली रस्में शुरू करने की परंपरा निभाई जाती है। इससे बस्तर की धार्मिक व्यवस्था में स्थानीय देवी-देवताओं और पारंपरिक मान्यताओं की अहमियत का पता चलता है।
यह अनुष्ठान राजपरिवार, स्थानीय समुदाय और जनजातीय संस्कृति के बीच ऐतिहासिक संबंधों को भी दर्शाता है।
करीब 600 साल पुराना है बस्तर दशहरा
बस्तर दशहरा को देश के विशिष्ट और लंबे समय तक चलने वाले पर्वों में गिना जाता है। इसकी परंपरा करीब 600 साल पुरानी मानी जाती है। इस उत्सव की पहचान इसकी अलग-अलग रस्मों, स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा और सामुदायिक भागीदारी से बनती है। देश के कई हिस्सों में दशहरा भगवान राम की रावण पर विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, लेकिन बस्तर में इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान अलग है। यहां स्थानीय देवी मां दंतेश्वरी की आराधना सहित अनेक पारंपरिक अनुष्ठानों को विशेष महत्व दिया जाता है।
काछन देवी की रस्म इसी विशिष्ट परंपरा का हिस्सा है, जो बस्तर दशहरा को अन्य क्षेत्रों के दशहरा उत्सवों से अलग पहचान देती है।
बस्तर की संस्कृति और आस्था का प्रतीक है काछन गादी
काछन गादी की परंपरा बस्तर की सांस्कृतिक विविधता, सामुदायिक विश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक विरासत को दर्शाती है। कांटों के झूले पर कुंवारी कन्या को लिटाने की रस्म भले ही पहली नजर में लोगों को हैरान करे, लेकिन स्थानीय समाज के लिए इसका गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।
यही वजह है कि बस्तर दशहरा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान और परंपराओं को जीवित रखने वाला आयोजन भी माना जाता है। काछन देवी से अनुमति लेने की यह अनूठी रस्म हर साल इस विरासत की विशिष्टता को सामने लाती है।
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।









