KhabarMantra: झारखंड की राजनीति में महापुरुष भाषणों में सुनाई देते हैं, चौक चौराहों पर मूर्ति के रूप में दिखाई देते हैं और दलों के दफ्तरों में दीवारों से लटकी तस्वीरों में दिखाई देते हैं..! बिरसा मुंडा, सिदो कान्हु, चांद भैरव, फूलो झानो की मूर्तियां, राजनेताओं के लिए माल्यार्पण करने की जगह हैं और फोटो खिंचवाने का सिम्बोल..! संस्कार से न तो नेताओं का सरोकार है और न ही राजनीतिक दलों का..! जन्म जयंती और पुण्यतिथि पर इनकी याद नेता करते हैं, उनके बताए मार्ग पर चलने की सौगंध लेते हैं, मीडिया में सुर्खियां बटोरते हैं और अपने वोट बैंक को मजबूत करने के मिशन में लगे रहते हैं..!
इन दिनों वीर बुधु भगत ब्रांडिंग के नए अवतार में दिखाई दे रहे हैं! सरकार ने बुधु भगत का पेटेंट करवा लिया है और भाजपा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे महापुरुष की ISO ब्रांडिंग रद्द कर दी गई है..! सरकार ने क्षेत्रीय महापुरुषों की ब्रांडिंग की सौगंध ले रखी है, क्योंकि उसे पता है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर भाजपा का एकाधिकार है..! और श्यामा प्रसाद जी को कांग्रेस, जेएमएम कभी पसंद नहीं आएगी..! कुल मिलाकर हर दल ने netflix प्रोफाइल की तरह नेताओं की प्रोफाइल बना रखी है और महापुरुषों के कद के हिसाब से उन्हें वोट बैंक के खांचों में फिट किया जाता है..! इसमें दुरूह सवाल यह भी है कि व्याख्यान, आख्यान, व्यक्ति की अभिव्यक्ति में, लेखों में, आलेखों में, योजनाओं में, परियोजनाओं में, संस्थानों में सब जगह महापुरुष बैठें हैं और जिन्होंने इन्हें बैठाया है, उन्हें उम्मीद है कि एक दिन उनकी भी मूर्ति चौक पर संस्थान में स्थापित होगी और पीढ़ियां उनके विचारों को आत्मसात करेंगी..!
भाजपा और जेएमएम के बीच महापुरुषों के पेटेंट को लेकर फैला रायता राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय राजनीति का हिस्सा बन गया है! उत्तर प्रदेश में मायावती ने अपनी मूर्तियां खड़ी कर दीं और अजर अमर होने की भ्रांति पाल बैठीं, शिबू सोरेन के नाम पर मयूराक्षी नदी पर बने पुल का नामकरण कर दिया गया है, वहीं राज्य के मुखिया अपने दादा दादी के नाम पर सोना सोबरन धोती साड़ी योजना चला रहे हैं! दुर्गा सोरेन चौक भी है..! बिरसा मुंडा के नाम पर रोड, हवाई अड्डे, स्टेडियम सहित कर संस्थान भी हैं..! लेकिन यह झारखंड में शायद पहला मौका है जब किसी महापुरुष के नाम पर खोली गई यूनिवर्सिटी का नाम वीर बुधु भगत किया गया है..! सरकार के इस प्रयास में राजनीति की बू आती है, यह भी साफ है! भाजपा ने इस मामले में हमला बोला तो जेएमएम की प्रतिक्रिया आई। उसने भाजपा पर क्षेत्रीय महापुरुषों और आदिवासी नायकों को लेकर ओछी राजनीति करने का आरोप लगाया! तो क्या मान लिया जाए कि ओछी राजनीति सिर्फ भाजपा कर रही है? सोना सोबरन के योगदान की चर्चा भी होनी चाहिए! और जेएमएम को बताना चाहिए कि उनका झारखंड आंदोलन या अंग्रेजों के खिलाफ आजादी के आंदोलन में क्या योगदान था? इसका जवाब शायद उसके पास न हो..!
खैर, ब्रांडिंग का दौर है, महापुरुष हमारी संस्कृति के ब्रांड एम्बेसडर हैं जिन्होंने गांव से ग्लोबल तक हमारी संस्कृति को पहचान दी है..! खानदान की ब्रांडिंग राजनीतिक मंच पर किसी भी दल के खास नेता को शोभा नहीं देती है! वीर बुधु भगत का कद बेशक झारखंड के लिहाज से बड़ा हो लेकिन डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक विचारधारा का नाम है जिसने राष्ट्रसेवा के नए विचारों की तर्कसंगत युक्ति दी है, जो राष्ट्रव्यापी है। बहरहाल, सारे महापुरुष, मसीहा, विचारक हमारे सर माथे हैं, लेकिन सरोकार तो हमारे हैं! महापुरुषों की समाधियां जागृत समाज का नेतृत्व नहीं करती हैं, लेकिन उनसे मार्गदर्शन जरूर लिया जा सकता है! ये और बात है कि तमाम राजनीतिक दल महापुरुषों के विचारों की भ्रांतियों में जी रहे हैं और सभी की जुबान पर उनके आदर्श हैं, लेकिन उनके संघर्ष की गाथा को कोई भी राजनीतिक दल न तो पढ़ने को तैयार है और न ही उनकी सोच को आत्मसात करने को! समाधियां में शांति की नींद सोए नायक भी अब बेचैन हो उठे हैं, और सोच रहे हैं कि कैसे उत्तराधिकारी हैं जिन्हें भावनाओं की कद्र ही नहीं..!










