Brijesh Ganjhu Encounter: झारखंड के प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TPC) के कमांडर ब्रजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह भोक्ता की रविवार सुबह वाराणसी में UP ATS के साथ हुई मुठभेड़ में मौत हो गई। पुलिस के अनुसार, रामनगर थाना क्षेत्र में कार्रवाई के दौरान ब्रजेश को गोली लगी। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
ब्रजेश झारखंड पुलिस तथा राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की मोस्ट वांटेड सूची में यह नाम शामिल था। उसके खिलाफ झारखंड के कई जिलों के अलग-अलग थानों में हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, रंगदारी, लेवी वसूली, आगजनी, हथियार रखने और प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन से जुड़े होने समेत 44 से अधिक मामले दर्ज थे।
Brijesh Ganjhu Encounter: भूमिगत होकर संगठन का नेटवर्क चला रहा था
बताया गया कि ब्रजेश गंझू हाल के वर्षों में पूरी तरह भूमिगत होकर संगठन का नेटवर्क चला रहा था। झारखंड पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां लंबे समय से उसकी तलाश कर रही थीं। इसी बीच यूपी एटीएस को उसकी मौजूदगी को लेकर एक सटीक गुप्त सूचना मिली। सूचना के आधार पर वाराणसी के रामनगर थाना क्षेत्र में घेराबंदी की गई। इसी दौरान एटीएस और ब्रजेश गंझू के बीच मुठभेड़ हुई, जिसमें वह मारा गया। मुठभेड़ के बाद मौके से हथियार बरामद किया जा चुका है।
ब्रजेश गंझू पर 30 लाख रुपये का इनाम घोषित था
ब्रजेश गंझू पर झारखंड पुलिस और एनआईए ने कुल 30 लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा था। झारखंड पुलिस की ओर से उस पर 25 लाख, जबकि एनआईए की ओर से 5 लाख रुपये का इनाम था। लंबे समय से फरार रहने के कारण सुरक्षा एजेंसियों के लिए उसकी गिरफ्तारी बड़ी चुनौती बनी हुई थी। हालांकि आज उसे ढेर कर दिया गया है।
ब्रजेश गंझू का नाम झारखंड के चतरा, लातेहार, पलामू और रांची के खलारी समेत कई इलाकों में टीपीसी के प्रभाव से जुड़ा रहा है। उसके नेतृत्व में संगठन ने इन क्षेत्रों में लेवी वसूली और उग्रवादी गतिविधियों का नेटवर्क खड़ा किया था। जांच एजेंसियों के मुताबिक, संगठन के लिए लेवी वसूली का पैसा उग्रवादी गतिविधियों में इस्तेमाल किया करता था।
ब्रजेश के खिलाफ कार्रवाई पर अधिकारी का तबादला
ब्रजेश गंझू के प्रभाव का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वह करीब एक दशक से अधिक समय पहले झारखंड पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की कोशिश की थी। उस समय अधिकारी का तबादला कर दिया गया था। संबंधित अधिकारी ने बाद में दावा किया था कि ब्रजेश गंझू के खिलाफ कार्रवाई करने की वजह से उनका तबादला किया गया है।
हालांकि, उस समय हुए तबादले की आधिकारिक वजह कुछ और भी हो सकती है। इसलिए इस दावे को उसी अधिकारी के बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए। यह घटना अब काफी पुरानी है, लेकिन इससे में ब्रजेश गंझू के प्रभाव और उसके खिलाफ कार्रवाई को लेकर बनी परिस्थितियों का अंदाजा लगाया जाता रहा है।
Brijesh Ganjhu Encounter: लेवी वसूली और टेरर फंडिंग में शामिल होने का आरोप
बता दें कि ब्रजेश गंझू का नाम चतरा के मगध और आम्रपाली कोयला परियोजनाओं से जुड़ी कथित लेवी वसूली और टेरर फंडिंग के मामले में भी सामने आया था। इस मामले की जांच एनआईए कर रही है। इस मामले में चार प्रमुख आरोपियों के नाम सामने आए थे। इनमें मुकेश गंझू पहले सरेंडर कर चुका है, भीखन गंझू को पुलिस ने गिरफ्तार किया, आक्रमण गंझू भी पुलिस की गिरफ्त में आया, जबकि ब्रजेश गंझू लंबे समय से फरार था। लेकिन आज उसे ढेर कर दिया गया है।
ब्रजेश गंझू के खिलाफ दर्ज मामलों का रिकॉर्ड काफी लंबा है। रिकॉर्ड के मुताबिक साल 1996 से लेकर 2025 तक के मामले सामने आए हैं। यानी करीब तीन दशक तक उसका नाम अलग-अलग आपराधिक और उग्रवादी गतिविधियों से जुड़ा रहा।
लावालौंग पंचायत से मुखिया रह चुका है ब्रजेश गंझू
बताते चलें कि ब्रजेश गंझू चतरा के लावालौंग थाना क्षेत्र के लुटू सोहावन गांव का रहने वाला था। 2010 में वह लावालौंग पंचायत से निर्विरोध मुखिया भी चुना गया था। हालांकि इसके बाद वह झारखंड के कोयलांचल और जंगलों में सक्रिय एक कुख्यात उग्रवादी संगठन तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी (टीएसपीसी) का सुप्रीमो बन गया।
मिली जानकारी के मुताबिक ब्रजेश पहले भाकपा माओवादी से जुड़ा था, लेकिन बाद में वर्चस्व और मतभेदों के चलते वर्ष 2004-05 के आसपास उसने अलग संगठन खड़ा किया। यही संगठन आगे चलकर टीएसपीसी के रूप में उभरकर सामने आया और झारखंड में आतंक का पर्याय बना। टीएसपीसी का प्रभाव मुख्य रुप से झारखंड के चतरा, पलामू, लातेहार, हजारीबाग, रामगढ़ और आसपास के इलाकों में था।
आंकड़ों के मुताबिक ब्रजेश पर बीड़ी पत्ता कारोबार से जुड़े ठेकेदारों से लेकर कोयला परियोजनाओं की आउटसोर्सिंग कंपनियों, ट्रांसपोर्टरों और कारोबारियों से लेवी वसूली का नेटवर्क खड़ा करने का आरोप लगा है।
पुलिस और सुरक्षा बलों पर हमला करने का आरोप
ब्रजेश गंझू के खिलाफ दर्ज गंभीर मामलों में लावालौंग इलाके में पुलिस गश्ती दल पर हमले करने का मामला है. इस हमले में पुलिस के दो जवानों की हत्या किए जाने का उल्लेख रिकॉर्ड में मिलता है। टीपीसी से जुड़े कई मामलों में पुलिस और सुरक्षा बलों पर हमला करने के अलावा ग्रामीणों और संगठन के विरोधी गुटों को निशाना बनाने के आरोप भी सामने आए। इन घटनाओं के कारण ब्रजेश गंझू सुरक्षा एजेंसियों के लिए लंबे समय तक बड़ी चुनौती बना रहा। इसके अलावा ठेकेदार की हत्या से लेकर ग्रामीणों पर हमले तक के आरोप उस पर है।
करीब तीन दशक पुराना है आपराधिक रिकॉर्ड
ब्रजेश गंझू का अंत एक ऐसे उग्रवादी अध्याय के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका रिकॉर्ड करीब तीन दशक पुराना रहा है। वर्ष 1996 से शुरू होकर 2025 तक उसके खिलाफ दर्ज मामलों में हत्या, हिंसा, लेवी वसूली, हथियार और उग्रवादी गतिविधियों के आरोप जुड़े रहे। अब वाराणसी में हुई मुठभेड़ के बाद उसकी कहानी का यह अध्याय तो खत्म हो गया है, लेकिन जांच एजेंसियों के सामने उसके पुराने नेटवर्क, आर्थिक स्रोतों और संपर्कों की पूरी कड़ी को सामने लाने की चुनौती बनी हुई है।

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