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CUJ के आईसीएसएसआर-प्रायोजित सीबीपी के छठे दिन मिश्रित-विधि शोध पर गहन विमर्श

December 6, 2025
in रांची
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CUJ के आईसीएसएसआर-प्रायोजित सीबीपी के छठे दिन मिश्रित-विधि शोध पर गहन विमर्श
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Ranchi : भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) द्वारा प्रायोजित तथा झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय (CUJ) के शिक्षा विभाग एवं अर्थशास्त्र एवं विकास अध्ययन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो-सप्ताहिक क्षमता निर्माण कार्यक्रम (CBP) के छठे दिन की शुरुआत एक आध्यात्मिक प्रेरणा और बौद्धिक उत्थान से परिपूर्ण “त्वमेव माता च पिता त्वमेव” के शांतिपूर्ण उच्चारण से हुआ। तत्पश्चात, पाठ्यक्रम निदेशक प्रो. तपन कुमार बसंतिया एवं डॉ संहिता सुचरिता ने दिन के विषय विशेषज्ञों का हार्दिक स्वागत एवं सम्मान करते हुए सत्रों की औपचारिक शुरुआत की।

दिन के शैक्षणिक सत्रों का एक प्रमुख एवं महत्वपूर्ण भाग इग्नू (IGNOU), नई दिल्ली के शिक्षा संकाय के प्रो. अरविंद कुमार झा द्वारा संचालित किया गया। उन्होंने मिश्रित-विधि दृष्टिकोण, गुणात्मक शोध परंपराओं तथा विविध शोध अवसरों एवं फेलोशिपों के संदर्भ में विचारोत्तेजक सत्र प्रस्तुत किए, जिनमें प्रतिभागियों को सक्रिय रूप से सम्मिलित किया गया। इसके उपरांत, प्रो. झा ने मिश्रित-विधि (Mixed-Method) शोध की दार्शनिक नींवों का सूक्ष्म और विशद विश्लेषण प्रस्तुत किया।

सत्र का आरंभ उन्होंने प्रतिभागियों से एक मूलभूत प्रश्न पर चिंतन करने का आग्रह करते हुए किया- “क्या शोध एक अन्वेषण मात्र है?” तत्पश्चात स्पष्ट किया गया कि शोध एक व्यवस्थित एवं संगठित प्रक्रिया है, जिसमें सूचनाओं का संग्रहण, व्यवस्थित वर्गीकरण तथा तर्कपूर्ण विश्लेषण शामिल होता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से विश्वसनीय व्याख्याएँ विकसित की जाती हैं, जो अंततः ज्ञान के स्वरूप में परिणत होती हैं। उन्होंने प्रतिभागियों से निवेदन किया कि वे शोध को मात्र यांत्रिक प्रक्रिया के रूप में न अपनाएँ, अपितु इसके निर्माण एवं प्रक्रिया में निहित मूलभूत तत्वों- जैसे जिज्ञासा, स्पष्टता, व्यवस्थितता और चिंतनशील तर्क- को समग्र रूप से समझें। शोध पद्धतियों की व्याख्या करते हुए उन्होंने आगमनात्मक (Inductive) तथा निगमनात्मक (Deductive) तर्क के संबंध में प्रचलित एक भ्रांति का निराकरण किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये दोनों विधियाँ परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि “एक ही सिक्के के दो पहलू” हैं- जहाँ निगमन आगमन के बिना अधूरा है, वहीं आगमन भी निगमन के बिना पूर्ण नहीं होता।

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“मानव मस्तिष्क के न्यूरॉन भले ही 99.99% समान हों, पर प्रत्येक व्यक्ति की समझ, सीखने की प्रक्रिया और अर्थ-निर्माण बिल्कुल भिन्न होता है—हर इंसान अपनी विशिष्ट कहानी स्वयं रचता है।” — प्रो. अरविंद कुमार झा

ये दोनों तर्क प्रक्रियाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं—एक-दूसरे को मजबूती देती हैं और परस्पर सहयोग से निरंतर विकसित होती रहती हैं। मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के संदर्भ में समानता स्थापित करते हुए, प्रो. झा ने पियाजे एवं वायगोत्स्की के विचारों का उल्लेख किया और विशद रूप से समझाया कि व्यक्ति किस प्रकार परस्पर क्रिया, चिंतन तथा संज्ञानात्मक विकास की प्रक्रियाओं के माध्यम से अर्थ का निर्माण करता है। उन्होंने उल्लेख किया, “मानव मस्तिष्क के न्यूरॉन भले ही 99.99% समान हों, पर प्रत्येक व्यक्ति की समझ, सीखने की प्रक्रिया और अर्थ-निर्माण बिल्कुल भिन्न होता है—हर इंसान अपनी विशिष्ट कहानी स्वयं रचता है।” प्रतीकात्मक अन्तःक्रिया (Symbolic Interactionism) पर चर्चा करते हुए प्रो. झा ने ऐसे प्रेरक प्रश्न उठाए, जिन्होंने प्रतिभागियों को सामान्यतः स्वीकार की जाने वाली सामाजिक धारणाओं पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया—जैसे, “क्या माँ बच्चे को जन्म देती है, या बच्चा माँ की पहचान को जन्म देता है?”—जिससे स्पष्ट हुआ कि सामाजिक भूमिकाएँ और पहचानें परस्पर अन्तःक्रिया के माध्यम से निर्मित होती हैं। समापन सत्र में प्रो. झा द्वारा “देश और विदेश में उपलब्ध शोध छात्रवृत्तियों एवं सहायता के अवसर” विषय पर एक संवादात्मक चर्चा किया। इस सत्र में प्रतिभागियों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध विभिन्न प्रकार की वित्तपोषण योजनाओं, डॉक्टोरल एवं पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप, ट्रैवल ग्रांट, प्रारंभिक-करियर शोध पुरस्कार तथा शैक्षणिक विनिमय (Academic Exchange) के अवसरों के विषय में सूचित किया गया।

रांची विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. बिनोद नारायण ने भी “शोध में पुस्तकालय और ई-पुस्तकालय का उपयोग” विषय पर अपने विचार रखे। डॉ. नारायण ने शोध को सुदृढ़ एवं गंभीर समग्रता प्रदान करने में पुस्तकालयों की महत्तवपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रतिभागियों को अवगत कराया कि किस प्रकार प्रभावी तरीके से शैक्षणिक स्रोत्रों तक पहुंच सुनिश्चित की जाए, डिजिटल डेटाबेस का समुचित उपयोग किया जाए, ई-लाइब्रेरी में संबंधित सामग्री की खोज की जाए एवं साहित्य को व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप में संरक्षित किया जाए। साथ ही, विभिन्न संस्थागत रिपॉज़िटरी, अनुक्रमण सेवाओं (इंडेक्सिंग सेवाओं) तथा ऑनलाइन पोर्टलों का प्रदर्शन कर, प्रतिभागियों को विश्वसनीय एवं उच्च गुणवत्ता वाली शोध सामग्री तक दक्षतापूर्वक पहुँचने की रणनीतियों का प्रस्तुतीकरण किया गया। छठे दिन के सत्रों में प्रतिभागियों की उत्साहपूर्ण एवं सक्रिय भागीदारी रही।

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