Dhanteras 2026: क्या आपने कभी सोचा है कि धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा क्यों की जाती है और आखिर उनके हाथों में अमृत से भरा कलश कहां से आया? इसके पीछे छिपी है समुद्र मंथन की एक ऐसी पौराणिक कथा, जिसमें अमृत पाने के लिए देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष हुआ था। मान्यता के अनुसार, इसी समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद का देवता माना जाता है, लेकिन उनकी उत्पत्ति की कहानी में एक ऐसा मोड़ भी आता है, जब अमृत कलश को लेकर असुरों ने उसे छीन लिया। तो आइए जानते हैं, समुद्र मंथन की इस रहस्यमयी कथा और धनतेरस से जुड़े उस धार्मिक महत्व के बारे में, जिसे जानना हर किसी के लिए दिलचस्प है।
समुद्र मंथन की कथा में क्या हुआ था?
हिंदू पुराणों के अनुसार, देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन किया था। इस कथा में मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किए जाने का वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु ने कूर्म यानी कछुए का रूप धारण कर मंदराचल पर्वत को आधार दिया था।
समुद्र मंथन से कई दिव्य वस्तुओं और देवशक्तियों के प्रकट होने की कथा प्रचलित है। इनमें माता लक्ष्मी, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा और भगवान धन्वंतरि जैसे नाम शामिल हैं। हालांकि, अलग-अलग पुराणों में इन घटनाओं के क्रम और विवरण में अंतर मिलता है।श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध के आठवें अध्याय में भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने का वर्णन किया गया है। कथा के अनुसार, वे अमृत से भरा कलश लेकर सामने आए थे।
अमृत कलश लेकर प्रकट हुए भगवान धन्वंतरि
धार्मिक मान्यताओं में भगवान धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अंशावतार और आयुर्वेद का दिव्य ज्ञाता माना जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध के आठवें अध्याय के श्लोक 31 से 35 में उनके प्रकट होने और अमृत कलश से जुड़ा प्रसंग मिलता है।
इस वर्णन में भगवान धन्वंतरि के हाथ में अमृत से भरा पात्र होने की बात कही गई है। इसी कारण उन्हें अमृत और आरोग्य से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में विशेष स्थान प्राप्त है। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह धार्मिक ग्रंथों में वर्णित पौराणिक कथा है। इसे आधुनिक इतिहास की तरह प्रमाणित घटना के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
अमृत कलश देखकर असुरों ने क्या किया?
समुद्र मंथन की कथा का एक दिलचस्प हिस्सा अमृत कलश को लेकर देवताओं और असुरों के बीच हुआ संघर्ष है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, जब असुरों ने भगवान धन्वंतरि को अमृत कलश के साथ देखा, तो उन्होंने उसे अपने अधिकार में लेने के लिए कलश छीन लिया। इससे देवता चिंतित हो गए और उन्होंने भगवान विष्णु की शरण ली।
इसके बाद भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। कथा में बताया गया है कि मोहिनी ने असुरों को मोहित करके अमृत के वितरण का कार्य अपने हाथ में लिया। इस तरह अमृत देवताओं तक पहुंचाने की कथा आगे बढ़ती है। यही प्रसंग समुद्र मंथन की कथा को और रोचक बनाता है। हालांकि, अलग-अलग पुराणों और धार्मिक परंपराओं में इस कथा के कुछ विवरण भिन्न हो सकते हैं।
भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का देवता क्यों माना जाता है?
भगवान धन्वंतरि का संबंध केवल अमृत कलश से नहीं, बल्कि आयुर्वेद की पारंपरिक मान्यता से भी है। आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा परंपरा की एक प्राचीन पद्धति है, जिसमें आहार, जीवनशैली, स्वास्थ्य और रोगों की देखभाल पर जोर दिया जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध के आठवें अध्याय के श्लोक 34 में भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का ज्ञाता बताया गया है। इसी धार्मिक संबंध के कारण धनतेरस पर उनकी पूजा कर अच्छे स्वास्थ्य और आरोग्य की कामना की जाती है।
धन्वंतरि की परंपरा का उल्लेख केवल एक ग्रंथ तक सीमित नहीं है। उनके समुद्र मंथन से प्रकट होने की कथा भागवत पुराण के साथ-साथ वाल्मीकि रामायण और महाभारत की परंपराओं में भी मिलती है।
क्या भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने का दिन ही धनतेरस है?
धनतेरस को धन्वंतरि जयंती या धन्वंतरि त्रयोदशी के रूप में मनाने की परंपरा प्रचलित है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से जुड़ा है। इसी दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है।लेकिन श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने की कथा तो मिलती है, उनके प्रकट होने की कोई आधुनिक कैलेंडर तारीख स्पष्ट रूप से नहीं दी गई है। इसलिए धनतेरस की तिथि को सीधे किसी ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना की तारीख बताना सही नहीं होगा।
धार्मिक परंपरा में धनतेरस और भगवान धन्वंतरि के संबंध को स्वीकार किया जाता है, जबकि ग्रंथों में वर्णित कथा और पर्व की तिथि के बीच अंतर समझना भी जरूरी है।
धनतेरस पर सोना-चांदी खरीदने की परंपरा का क्या संबंध है?
आज धनतेरस के दिन सोना, चांदी, सिक्के और बर्तन खरीदना बेहद लोकप्रिय है। कई परिवार इस दिन नई वस्तु घर लाना शुभ मानते हैं। बाजारों में आभूषणों के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य घरेलू सामान की खरीदारी भी होती है। हालांकि, समुद्र मंथन की कथा में भगवान धन्वंतरि के हाथ में अमृत कलश होने का वर्णन मिलता है, सोना-चांदी खरीदने की आधुनिक परंपरा का स्पष्ट निर्देश नहीं। दोनों को सीधे एक ही घटना का परिणाम बताने के लिए पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
इसलिए धनतेरस पर खरीदारी को धार्मिक आस्था, शुभ शुरुआत और समय के साथ विकसित हुई सांस्कृतिक परंपरा के रूप में समझना अधिक उचित है।
धनतेरस से जुड़ी इस कथा का क्या है संदेश?
धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा स्वास्थ्य और आरोग्य की कामना से जुड़ी है। मां लक्ष्मी की पूजा समृद्धि की कामना का प्रतीक है। इस तरह यह पर्व धन के साथ स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली को भी महत्व देता है।
समुद्र मंथन की कथा में अमृत कलश, देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष तथा भगवान विष्णु के मोहिनी रूप का प्रसंग इस पर्व की धार्मिक पृष्ठभूमि को रोचक बनाता है। लेकिन इन कथाओं को धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के संदर्भ में ही समझना चाहिए। धनतेरस का व्यापक संदेश यही है कि जीवन में धन के साथ स्वास्थ्य, संतुलन और खुशहाली का भी महत्व है।
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।









