कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सदस्य धीरज प्रसाद साहू को भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC) का नया अध्यक्ष चुना गया है। पार्टी के श्रमिक संगठन में इस बड़े बदलाव को आगामी सांगठनिक मजबूती से जोड़कर देखा जा रहा है।
धीरज साहू लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े रहे हैं और राज्यसभा सांसद के रूप में उनका कार्यकाल काफी सक्रिय रहा है। देश के सबसे बड़े मजदूर संगठनों में से एक ‘इंटक’ की कमान मिलने के बाद अब उन पर देश भर के श्रमिकों के हितों की रक्षा और संगठन के विस्तार की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
धीरज साहू के राज्यसभा चुनाव न लड़ने के फैसले के मायने
झारखंड कांग्रेस के कद्दावर नेता और तीन बार के पूर्व राज्यसभा सांसद धीरज साहू के हालिया फैसले ने राज्य की राजनीति में हलचल तेज कर दी है। धीरज साहू ने आगामी राज्यसभा चुनाव न लड़ने की घोषणा की है। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम हो गई है कि क्या उनके राजनीतिक सफर पर अब पूरी तरह ग्रहण लग चुका है?
गौरतलब है कि करीब तीन वर्ष पहले 10 जनवरी 2024 को जब उनके ठिकानों से देश की सबसे बड़ी नकद बरामदगी हुई थी, तभी यह साफ हो गया था कि धीरज साहू की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहेगी। आइए जानते हैं कि चुनावी कला में माहिर माने जाने वाले धीरज साहू को इस बार कदम पीछे क्यों खींचने पड़े।
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400 करोड़ की नकदी और ‘ग्रहण’ की भविष्यवाणी
करीब तीन साल पहले आयकर विभाग (Income Tax) ने धीरज साहू के विभिन्न ठिकानों पर छापेमारी की थी। इस दौरान करीब 400 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए थे, जो उस समय देश का सबसे बड़ा कैश रिकवरी मामला था। इस घटना ने पूरे देश का ध्यान खींचा और भाजपा ने इसे कांग्रेस के खिलाफ एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया था।
हालांकि, यह मामला मुख्य रूप से आयकर से जुड़ा था और बाद में जुर्माना व टैक्स चुकाकर इसका निपटारा कर दिया गया, लेकिन इसका राजनीतिक नुकसान धीरज साहू को लंबे समय तक झेलना पड़ा।
मल्लिकार्जुन खड़गे और हेमंत सोरेन से मिले, पर नहीं मिला ‘ग्रीन सिग्नल’
सूत्रों के मुताबिक, राज्यसभा चुनाव की घोषणा होते ही धीरज साहू एक बार फिर टिकट के लिए सक्रिय हुए थे। उन्होंने अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की। साथ ही झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित कई शीर्ष नेताओं के चक्कर काटे।
लेकिन पार्टी आलाकमान और गठबंधन के साथियों की ओर से कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला। दागी छवि और भाजपा के संभावित हमलो को देखते हुए नेतृत्व ने उन्हें ठोस आश्वासन देने से परहेज किया।
चुनाव से दूरी बनाने के 3 मुख्य कारण
धीरज साहू के चुनावी मैदान से हटने के पीछे सिर्फ टिकट न मिलना ही नहीं, बल्कि कई अंदरूनी और रणनीतिक कारण भी हैं:
परिवार और व्यापार का दबाव
साहू का परिवार अब नहीं चाहता था कि वह दोबारा चुनावी राजनीति के दलदल में उतरें। नेतृत्व से आश्वासन न मिलने के बाद पारिवारिक और व्यावसायिक कारणों के चलते उन्होंने खुद ही दूरी बनाना बेहतर समझा।
ओडिशा में भाजपा सरकार और व्यापारिक हित
साहू परिवार का मुख्य शराब कारोबार ओडिशा में फैला हुआ है। वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखें तो ओडिशा में अब भाजपा की सरकार है। ऐसे में यदि धीरज साहू चुनाव लड़ते, तो वह एक बार फिर सीधे भाजपा के निशाने पर आ जाते, जिसका सीधा असर उनके पारिवारिक बिजनेस पर पड़ सकता था।
राजनीतिक सूझबूझ और सुरक्षित एग्जिट
तीन बार राज्यसभा सांसद रह चुके धीरज साहू चुनावी रणनीति और जोड़-तोड़ के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं। उन्होंने भांप लिया था कि मौजूदा हालात उनके अनुकूल नहीं हैं। इसलिए राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए उन्होंने खुद को रेस से बाहर कर लिया।
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