Dr. Ramdayal Munda Jayanti 2026: 23 अगस्त को झारखंड के महान शिक्षाविद, संस्कृतिकर्मी, लेखक, विचारक और झारखंड आंदोलन को बौद्धिक दिशा देने वाले पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा की जयंती मनाई जाती है। उनका जीवन केवल आदिवासी समाज और संस्कृति के संरक्षण तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक एकता, पर्यावरण संरक्षण, अनुशासन और सकारात्मक सोच का भी उदाहरण रहा।
झारखंड की संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने में डॉ. रामदयाल मुंडा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने आदिवासी जीवन-दर्शन को दुनिया के सामने रखने के साथ-साथ समाज को साथ लेकर चलने की बात हमेशा कही। उनके जीवन को करीब से जानने वाले लोगों के संस्मरणों में उनके व्यक्तित्व के ऐसे कई पहलू सामने आते हैं, जो आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं।
अमेरिका की अकादमिक दुनिया छोड़कर झारखंड लौटे
डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्माता मेघनाथ के अनुसार, डॉ. रामदयाल मुंडा ने 1970 के दशक में अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल की और वहां अध्यापन भी किया। लेकिन विदेश में बेहतर अकादमिक अवसर होने के बावजूद उन्होंने झारखंड लौटकर यहां के समाज और संस्कृति के लिए काम करने का रास्ता चुना।
उनकी पहचान आदिवासी जीवन-दर्शन के प्रबल समर्थक के रूप में थी, लेकिन उनकी स्वीकार्यता केवल आदिवासी समाज तक सीमित नहीं रही। झारखंड के अलावा पूर्वोत्तर भारत, मध्य भारत और देश के कई हिस्सों में भी उन्हें सम्मान और लोकप्रियता मिली।
मेघनाथ के मुताबिक, बीमारी से पहले दिल्ली में हुए एक कार्यक्रम में डॉ. मुंडा ने उन गैर-आदिवासी लोगों को भी सम्मानित किया था, जो आदिवासी विचारधारा और समाज से जुड़े मुद्दों के लिए काम कर रहे थे। इनमें रमणिका गुप्ता, अर्थशास्त्री डॉ. रमेश शरण और डॉ. बीडी शर्मा जैसे नाम शामिल थे।
जर्मनी की एक छोटी घटना ने दिया बड़ा पर्यावरण संदेश
प्रो. संजय बसु मलिक ने डॉ. रामदयाल मुंडा के साथ झारखंड आंदोलन के दौर में काम किया था। वर्ष 1994 में उन्हें उनके साथ जर्मनी और यूरोप के कई देशों की यात्रा करने का अवसर भी मिला। इसी यात्रा की एक घटना डॉ. मुंडा की पर्यावरण को लेकर सोच को बेहद सरल तरीके से समझाती है।
जर्मनी में जिस घर में वे ठहरे थे, वहां रात में भोजन के बाद सोने से पहले डॉ. मुंडा ने घर की सभी लाइटें बंद कर दीं। सुबह गृहस्वामी ने उनसे कहा कि इस छोटी-सी आदत से उन्हें एक बड़ी सीख मिली है और अब वे भी सोने से पहले अनावश्यक लाइटें बंद करेंगे। डॉ. मुंडा ने समझाया था कि बिजली उत्पादन के लिए संसाधनों का इस्तेमाल होता है, कोयला जलता है, जंगल प्रभावित होते हैं और नदियों पर भी इसका असर पड़ता है। इसलिए जब किसी चीज की जरूरत न हो, तो उसे बंद कर देना चाहिए।
यह घटना बताती है कि उनके लिए पर्यावरण संरक्षण केवल भाषण का विषय नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था।
अमेरिका ने निखारी उनकी बौद्धिक क्षमता
डॉ. रामदयाल मुंडा के बेटे गुंजल इकिर मुंडा बताते हैं कि पिता की जीवनी पर आधारित डॉक्यूमेंटरी के सिलसिले में उन्हें अमेरिका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी और उन स्थानों को देखने का अवसर मिला, जहां डॉ. मुंडा ने शिक्षा और शोध से जुड़ा काम किया था। उन्होंने वहां डॉ. मुंडा के गुरु डॉ. नॉर्मन जाइड और उनके साथ काम करने वाले कई लोगों से मुलाकात की। उनके मुताबिक, अमेरिका का शैक्षणिक वातावरण डॉ. मुंडा की बौद्धिक क्षमता को विकसित करने में बेहद महत्वपूर्ण रहा।
पिता का प्रभाव उनके अपने जीवन पर भी गहरा रहा। लेकिन डॉ. मुंडा ने कभी अपने बच्चों पर अपनी इच्छाएं नहीं थोपीं। इसके बजाय उन्होंने उन्हें खुद अपने जीवन की दिशा तय करने की स्वतंत्रता दी।
डॉ. रामदयाल मुंडा(Dr. Ramdayal Munda) से सीखें जीवन के 5 बड़े मंत्र
डॉ. मुंडा के व्यक्तित्व को करीब से देखने वालों के अनुसार, उनके जीवन में कुछ ऐसे सिद्धांत थे, जिन्हें आज भी अपनाया जा सकता है।
1. परनिंदा से हमेशा दूर रहें
डॉ. रामदयाल मुंडा किसी की निंदा करने से बचते थे। यदि कोई उनके सामने किसी दूसरे व्यक्ति की बुराई शुरू करता, तो वे बिना विवाद किए बातचीत का विषय बदल देते थे। उनका यह व्यवहार सिखाता है कि किसी की आलोचना सुनने या आगे बढ़ाने के बजाय सकारात्मक बातचीत को प्राथमिकता देना बेहतर है।
2. समय और अनुशासन को दें प्राथमिकता
समय की पाबंदी उनके व्यक्तित्व की खास पहचान थी। बताया जाता है कि एक बार एक पत्रकार उनसे मिलने में केवल छह मिनट देर से पहुंचे। डॉ. मुंडा ने उस दिन मुलाकात नहीं की और उन्हें अगले दिन आने के लिए कहा। उनके लिए समय की पाबंदी केवल दूसरों से अपेक्षा नहीं थी। वे अपने निजी जीवन में भी अनुशासन का पालन करते थे।
3. समाज को बांटने के बजाय जोड़ें
डॉ. मुंडा की सोच समावेशी थी। उनका मानना था कि समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब लोग एक-दूसरे को साथ लेकर आगे बढ़ें। उनके गीतों और विचारों में आदिवासी, मूलवासी और सदान समुदायों के प्रति समान सम्मान और अपनापन दिखाई देता था। यही व्यापक दृष्टिकोण उन्हें एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करता है, जो सामाजिक एकता को महत्व देता था।
4. पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बनें
बिजली बचाने की जर्मनी वाली घटना उनके पर्यावरणीय दृष्टिकोण का एक सरल उदाहरण है। उनका संदेश स्पष्ट था-प्रकृति के संसाधनों का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार होना चाहिए। आज जब पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की चर्चा तेज है, डॉ. मुंडा की यह सीख और भी प्रासंगिक नजर आती है।
5. नकारात्मकता पर ऊर्जा बर्बाद न करें
अपने अंतिम दिनों में डॉ. मुंडा ने एक महत्वपूर्ण जीवन संदेश दिया था। उनका मानना था कि व्यक्ति को उन समस्याओं पर अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए, जिन्हें वह वास्तव में बदल सकता है। जो परिस्थितियां हमारे नियंत्रण से बाहर हैं, उन्हें लेकर लगातार चिंता करने के बजाय अपने प्रयास उन चीजों पर केंद्रित करने चाहिए, जिनमें सुधार संभव है।
झारखंड के लिए डॉ. रामदयाल मुंडा की विरासत
डॉ. रामदयाल मुंडा का योगदान केवल झारखंड आंदोलन तक सीमित नहीं था। उन्होंने शिक्षा, आदिवासी दर्शन, संस्कृति, भाषा, सामाजिक एकता और पर्यावरण जैसे विषयों को व्यापक विमर्श का हिस्सा बनाया।
उन्होंने झारखंड की पहचान को स्थानीय सीमाओं से बाहर ले जाकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उनका जीवन यह संदेश देता है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए भी दुनिया के सामने अपनी संस्कृति और विचारों को प्रभावी ढंग से रखा जा सकता है।
डॉ. रामदयाल मुंडा जयंती पर उन्हें याद करना केवल एक महान व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उनके विचारों-अनुशासन, समावेशिता, पर्यावरण संरक्षण और सकारात्मक सोच-को अपने जीवन में उतारने का अवसर भी है।
ये भी पढ़ें: आखिर क्यों ‘Quit India Movement’ बना आजादी की लड़ाई का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट?
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।









