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Home झारखंड

सीयूजे में बिरसा मुंडा के 150 वीं जयंती पर दो दिवसीय स्वाभिमानी बिरसा कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन; पूरे दिन चले कई कार्यक्रम

Neeraj Toppo by Neeraj Toppo
November 14, 2025
in झारखंड, रांची
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Ranchi : सीयूजे के मनातू कैंपस में बिरसा मुंडा के 150 वीं जयंती पर दो दिवसीय स्वाभिमानी बिरसा कार्यक्रम का आज औपचारिक उद्घाटन हुआ। कार्यक्रम की शुरुवात कुलसचिव, के कोसला राव एवं प्रो. के बी पंडा, नैक अध्यक्ष, सीयूजे ने किया। के कोसल राव ने भगवान बिरसा मुंडा को श्रद्धांजलि देते हुए सभी से आह्वाहन किया कि सभी मिलकर झारखंड राज्य को आगे बढ़ाएं जिसकी मिट्टी में बिरसा मुंडा जैसे महान विभूतियों ने अपना समर्पण और जीवन बलिदान किया है। प्रो के बी पंडा ने भी बिरसा मुंडा जी को झारखंड के महान पुत्र बताया और सभी को उनके जीवन से प्रेरणा लेकर युवाओं को देश और अपनी धरती के लिए अपना महान संकल्प के साथ काम करना चाहिए।

प्रथम दिवस के कार्यक्रम में सबसे पहले बिरसा मुंडा जी की मूर्ति को स्कूल स्टाइल बिल्डिंग में माल्यार्पण और श्रद्धांजलि अर्पित करके कार्यक्रम की शुरुवात की। इस अवसर पर कुलसचिव के कोसल राव ने प्रभात फेरी की अगुवाई की। उनके साथ प्रो. के बी पंडा, वित्त अधिकारी पी के पंडा, नोडल ऑफिसर, डॉ अनुराग लिंडा एवं संयोजक डॉ हृषिकेश महतो ने सभी प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों की अगुवाई की।

अकादमिक मीट में डॉ. रागिनी कुमारी ने आदिवासी विमर्श पर अपनी बात रखी

भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड, रांची द्वारा 14-15 नवम्बर 2025 को “स्वाभिमानी बिरसा–2025” शीर्षक से कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर के पहले दिन की गतिविधियों के अंतर्गत डॉ. रजनिकांत पांडेय, डॉ. भास्कर सिंह, डॉ. सचिन कुमार और डॉ. एम. रामकृष्णा की शैक्षणिक समिति द्वारा विश्वविद्यालय सभागार में प्रातः 10:00 बजे से 11:00 बजे तक एक आमंत्रित व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम का मुख्य विषय “भगवान बिरसा मुंडा के जीवन और विरासत को स्मरण करना” था, जिसके अंतर्गत दो विशिष्ट वक्ताओं — डॉ. रागिनी कुमारी (क्षेत्रीय सहायक निदेशक, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, रांची) और प्रो. सुचेता सेन चौधरी (मानवशास्त्र एवं जनजातीय अध्ययन विभाग, संस्कृति अध्ययन विद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड) — ने अपने प्रेरक और विचारोत्तेजक व्याख्यान प्रस्तुत किए।

डॉ. रागिनी कुमारी ने “दूरदर्शी धरती आवा बिरसा मुंडा और स्थिरता” विषय पर अपना सुव्यवस्थित व्याख्यान प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने झारखंड के गौरवशाली अतीत को पुनः प्राप्त करने की आवश्यकता और उसकी अपनी टिकाऊ जीवन-रणनीतियों तथा व्यवस्थाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बिरसा मुंडा की दृष्टि के अनुरूप जल संरक्षण पर विशेष बल देने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया। प्रो. सुचेता सेन चौधरी ने अपनी प्रस्तुति को इसी क्रम में तैयार करते हुए स्थानीय खाद्य प्रणालियों के मूल्य और महत्व पर जोर दिया।

कार्यक्रम के सह-अध्यक्ष एवं संयोजक डॉ. भास्कर सिंह ने स्वागत भाषण देते हुए कार्यक्रम की विषय-वस्तु, उसकी समसामयिक प्रासंगिकता तथा विश्वविद्यालय द्वारा इस समारोह के आयोजन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। मानवशास्त्र एवं जनजातीय अध्ययन विभाग के अध्यक्ष तथा संस्कृति अध्ययन विद्यालय के अधिष्ठाता प्रो. रवीन्द्रनाथ सरमा ने अध्यक्षीय उद्बोधन में दोनों वक्ताओं के विचारों का सार प्रस्तुत किया और युवाओं की उस जिम्मेदारी का उल्लेख किया, जो भगवान बिरसा मुंडा के स्वप्न को साकार करने की दिशा में आवश्यक है। अंत में, डॉ. रजनिकांत पांडेय ने औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

लिटरेरी मीट एवं बिरसाइत आध्यात्मिक सत्र का भी आयोजन हुआ

लिटरेरी मीट कार्यक्रम में पद्मश्री चामी मुर्मू, वंदना टेटे, सुषमा असुर, डॉ दमयंती सिंकू, प्रो.बी पी सिंहा, दुलारी सुमन (बिरसायत) ने भी अपनी बात रखी।

सभी विशेषज्ञों ने बिरसा मुंडा की विरासत और झारखंड में साहित्यिक चेतना के विकास पर केंद्रित अपनी बातें रखीं. वंदना टेटे ने कहा कि आदिवासी साहित्य के पुरातन अस्तित्व पर अपनी विचार रखे और बताया ki करीब 1840 से लिखित साहित्य चलता रहा है। आदिवासियत को समझने के लिए आदिवासी साहित्य से जुड़ना होगा।

सुषमा असुर ने आदिवासियत सिखाते हुए सभी को साथ में ले कर चलते हुए गाना भी गाया और  सभी को गवाया भी। उन्होंने जोहार जोहार, आम के डोबो डोबो जोहार गीत से सभी का मन मोह लिया है।
चामी मुर्मू ने कहा कि धरती आबा सिर्फ इतिहास नहीं, आदिवासी अस्मिता का प्रतीक हैं। मैं किसान की बेटी हूँ, ज्यादा नहीं पढ़ी। पिताजी के मृत्यु के बाद पढ़ाई छूट गई, मां के साथ मजदूरी की। नर्सरी से जा कर प्रशिक्षण लिया और एक लाख पौधे तैयार किए। तीन वर्षों के कठिन परिश्रम से हमने उस जमीन को हरा भरा कर दिया। इसके बाद लोगों ने हम पर विश्वास किया। पेड़ हमारे जीवन का सार है हम उसी पेड़ के साथ रहते हैं, उसके फल खाते हैं, उसके गिरे पत्तों से खाना बनाते हैं। प्रो. रत्नेश विश्वकसेन, विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की. धन्यवाद ज्ञापन डॉ रवि रंजन ने किया, डॉ जगदीश कुमार ने कार्यक्रम का संचालन किया. कार्यक्रम की संयोजक डॉ कैल्सेंग वांग्मो ने बताया कि बिरसायत पर भी कार्यक्रम होने की जानकारी दी जिसमें दुलारी सुमन ने सभी को बिरसायत के बारे में जानकारी दी और आध्यात्मिक सत्र लिया।

स्वाभिमानी बिरसा ट्राइबल फ़िल्म फेस्टिवल में मेघनाथ, निरंजन कुजूर, सरल मुर्मू, स्नेह मुंडारी, अंकुश कसेरा, मानसिंह बास्के और संजय टुडू की फिल्म दिखाई गई। ट्राइबल आइडेंटी टू सिनेमा: ट्रांसफॉर्मिंग स्टोरीज इंटू डिस्कर्स पर परिचर्चा भी हुई।

झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय में ‘स्वभिमानी बिरसा जनजातीय फिल्म महोत्सव’ का भव्य आयोजन हुआ। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में मनाए जा रहे ‘जनजातीय गौरव वर्ष’ के अंतर्गत एक दिवसीय ‘स्वाभिमानी बिरसा जनजातीय फिल्म महोत्सव और फोटोग्राफी प्रदर्शनी – 2025 (SBTFF&PE-2025)’ का सफल आयोजन किया। इस महोत्सव का मुख्य उद्देश्य जनजातीय पहचान, इतिहास और संस्कृति से जुड़ी कहानियों को सिनेमा के माध्यम से राष्ट्रीय मंच पर लाना था।
कार्यक्रम की शुरुआत औपचारिक उद्घाटन कुलसचिव के कोसल राव और वित्त अधिकारी, श्री पी के पंडा ने अतिथियों के स्वागत के साथ किया। जिसके तुरंत बाद फिल्मों की विशेष स्क्रीनिंग चली। इस दौरान ‘मुंडारी सृष्टिकथा ‘, ‘सेलिब्रेटिंग 25th ईयर ऑफ झारखंड: संस्कृति, प्रकृति और विरासत के माध्यम से एक यात्रा’, ‘आईएससीओ: प्रागैतिहासिक काल की एक झलक’, सारी सरजोम’और व्हेयर डज द ट्रिस गो, मैंन, मिलोडी एंड डॉल एवं खूंटी जैसी महत्वपूर्ण फिल्में प्रदर्शित की गईं। इन फिल्मों के माध्यम से जनजातीय समुदायों के जीवन के विभिन्न पहलुओं, संघर्षों और सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाया गया। सभी फिल्म निर्देशकों उनकी रचनात्मकता और कलात्मक योगदान के लिए कुलसचिव के द्वारा सम्मानित किया गया, जिन्होंने छात्रों और दर्शकों के साथ अपनी फिल्मों पर चर्चा भी की।

महोत्सव का केंद्रीय आकर्षण “जनजातीय पहचान से सिनेमा तक: कहानियों को विमर्श में बदलना” विषय पर आधारित एक गहन पैनल चर्चा रही। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार मेघनाथ, प्रसिद्ध फिल्मकार निरंजन कुजूर, फिल्म शिक्षाविद, शोधकर्ता और फिल्म निर्माता स्नेहा मुंडारी, और फिल्म शिक्षाविद और फिल्म निर्माता सेरल मुर्मू सहित एवम मॉडरेटर डॉ नील कुसुम कुल्लू ने किया। सभी ने इस बात पर जोर दिया कि फिल्में किस प्रकार जनजातीय समुदायों के वास्तविक आख्यानों को सामने लाने और उनके गौरवशाली इतिहास को संरक्षित करने का एक शक्तिशाली माध्यम बन सकती हैं। उन्होंने फिल्मकारों को प्रोत्साहित किया कि वे अपनी कहानियों के माध्यम से जनजातीय विमर्श को मुख्यधारा में स्थान दिलाएं।

कार्यक्रम का समापन भगवान बिरसा मुंडा की जन्मभूमि पर आधारित वृत्तचित्र ‘खुंटी – बर्थ प्लेस ऑफ धरती आबा बिरसा मुंडा’ के प्रदर्शन और सह-संयोजक डॉ. अमृत कुमार द्वारा आभार व्यक्त करने के साथ हुआ। यह महोत्सव जनजातीय कला और शिक्षा के समागम का एक सफल उदाहरण रहा जिसका संयोजन डॉ सुदर्शन यादव ने किया।

देर शाम सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां

इस अवसर पूरे भारत से आए हुए कई सांस्कृतिक ग्रुप ने अपनी प्रस्तुति दी। इनमें प्रमुख थे आंध्र प्रदेश के कोया कुम्मू डांस ग्रुप ने बफैलो डांस से सभी का मन मोह लिया. संकल्प परफॉर्मेंस- राकेश नायक, डोमकच नृत्य- सोनाली ग्रुप, एवं सीयूजे के परफॉर्मिंग आर्ट्स विभाग ने भी अपनी प्रस्तुति दी।

आर्ट क्राफ्ट, फूड, बुक स्टाल भी लगाए गए

इसके अलावा आर्ट और क्रॉफ्ट स्टाल, फूड स्टाल,बुक स्टाल भी लगाए गए हैं। बुक एग्जिबिशन में यह आयोजन भारत की जनजातीय धरोहर के सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पक्षों को उजागर करेगा, विशेष रूप से झारखंड की सजीव जनजातीय परंपराओं पर प्रकाश डालेगा—जो भगवान बिरसा मुंडा की कर्मभूमि रही है। आगंतुकों को झारखंड की प्रमुख जनजातियों—कुरुख, मुंडारी, हो, संथाली और खड़िया—से संबंधित विविध प्रकाशनों का अवलोकन करने का अवसर मिलेगा। झारखंड झरोखा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तकों को, जिनमें नगपुरी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में रचनाएँ तथा झारखंड के इतिहास, भूगोल और संस्कृति से संबंधित पुस्तकें शामिल हैं, विशेष रूप से प्रदर्शित किया जाएगा।
इसके अतिरिक्त, साई पब्लिकेशन द्वारा विभिन्न विषयों पर समृद्ध पुस्तक-संग्रह प्रदर्शित किया जाएगा, जिनमें जनजातीय अध्ययन, जनजातीय भाषाएँ, स्वतंत्रता सेनानी, पर्यावरण, आपदा प्रबंधन, भूगोल, झारखंड का इतिहास, स्वास्थ्य एवं योग, महिला अधिकार, अनुसंधान पद्धति, पुरातत्व और धर्म आदि विषय शामिल हैं।

कार्यक्रम के दूसरे दिन कई संस्कृति प्रस्तुति एवं झारखंड कई विशिष्ट व्यक्तित्वों को विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. क्षिति भूषण दास की उपस्थिति में सम्मानित करेगा।

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