JMBL Cess को बताया अलग राजस्व व्यवस्था
दीपिका पांडेय सिंह ने स्पष्ट किया कि JMBL Cess कोई नई रॉयल्टी या खनिज उत्पादन पर लगाया गया अतिरिक्त रॉयल्टी शुल्क नहीं है। यह उस भूमि पर लगाया जाने वाला उपकर है, जिसके भीतर खनिज मौजूद हैं और जहां खनन गतिविधियां संचालित हो रही हैं। उन्होंने जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India Limited मामले में दिए फैसले का भी उल्लेख किया। मंत्री के अनुसार, इस फैसले के बाद झारखंड विधानसभा ने झारखंड मिनरल बेयरिंग लैंड सेस एक्ट, 2024 पारित किया था।खनन से प्रभावित क्षेत्रों के विकास पर जोर
मंत्री ने कहा कि झारखंड की खनिज संपदा जहां राज्य के लिए आर्थिक अवसर पैदा करती है, वहीं खनन प्रभावित इलाकों के लोगों को विस्थापन, भूमि से बेदखली, पर्यावरणीय नुकसान, जल और वायु प्रदूषण तथा वन क्षेत्रों पर बढ़ते दबाव जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने खनिज संपदा से होने वाली आय का एक हिस्सा खनन प्रभावित क्षेत्रों और जनकल्याणकारी योजनाओं पर खर्च करने का निर्णय लिया है।तीन साल में बढ़ा JMBL Cess का राजस्व
दीपिका पांडेय सिंह ने दावा किया कि JMBL Cess राज्य के लिए तेजी से महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत बनकर उभरा है। उनके अनुसार, वर्ष 2024-25 में करीब 1,379 करोड़ रुपये, वर्ष 2025-26 में 7,488 करोड़ रुपये और वर्ष 2026-27 में अनुमानित 13,215 करोड़ रुपये का राजस्व इससे मिलने का अनुमान है। उन्होंने कहा कि इस राशि का इस्तेमाल स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, ग्रामीण विकास, पेयजल एवं स्वच्छता, कृषि एवं आजीविका, आधारभूत संरचना समेत विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं में किया जा रहा है।‘झारखंड के हितों से समझौता नहीं’
मंत्री ने कहा कि JMBL Cess सिर्फ राज्य की आय का माध्यम नहीं, बल्कि खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास का महत्वपूर्ण वित्तीय आधार भी है। ऐसे में केंद्र सरकार को प्रस्तावित संशोधन विधेयक पर झारखंड के हितों को ध्यान में रखते हुए पुनर्विचार करना चाहिए। दीपिका पांडेय सिंह ने कहा, “झारखंड के साथ हो रही हकमारी पर हम चुपचाप बैठने वाले नहीं हैं। कांग्रेस और गठबंधन सरकार केंद्र सरकार के इस संशोधन विधेयक का हर स्तर पर विरोध करेगी।”
विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
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