Jharkhand में सरकारी विभागों और संस्थाओं में खाली पदों का मामला अब सिर्फ कर्मचारियों की कमी तक सीमित नहीं रह गया है। राज्य की कई महत्वपूर्ण संवैधानिक और वैधानिक संस्थाओं में अध्यक्ष, सदस्य और शीर्ष पदों पर नियुक्तियां लंबे समय से अटकी हुई हैं।
कहीं आयोग बिना अध्यक्ष के चल रहा है, कहीं सदस्यों की नियुक्ति नहीं हुई है और कहीं किसी महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी अतिरिक्त प्रभार से संभाली जा रही है। इसका असर उन संस्थाओं के कामकाज पर पड़ रहा है, जिनका सीधा संबंध सरकारी भर्ती, शिकायतों की सुनवाई, सूचना के अधिकार और नागरिकों के अधिकारों की निगरानी से है।
JPSC में अध्यक्ष-सदस्यों की कुर्सियां खाली, भर्ती पर असर
इस पूरी तस्वीर में सबसे अहम मामला झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC का है।
21 जुलाई 2026 को तत्कालीन अध्यक्ष एल. खियांगते के इस्तीफे के बाद आयोग की स्थिति बिगड़ी। इसके बाद आयोग के सदस्यों के इस्तीफे की जानकारी भी हाईकोर्ट के सामने आई।
10 सितंबर 2026 को झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को JPSC में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति दो महीने के भीतर करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि अध्यक्ष और सदस्यों के बिना आयोग को प्रभावी रूप से कार्यरत नहीं माना जा सकता।
इसका असर भर्ती प्रक्रियाओं पर भी दिखाई दिया। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आया कि असिस्टेंट कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट और फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर की मुख्य परीक्षा के परिणाम जारी होने के बाद आगे की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। बाद में राज्य सरकार ने इन परीक्षाओं को रद्द कर दिया और नई परीक्षा JPSC के पूरी तरह गठित होने के बाद कराने की बात कही।
JPSC की स्थिति का असर JET यानी विश्वविद्यालयों में शिक्षक नियुक्ति से जुड़ी प्रक्रिया पर भी पड़ा है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को JPSC को requisition भेजने और उसके बाद आयोग को परीक्षा से लेकर परिणाम तक की प्रक्रिया तय समय में पूरा करने का निर्देश दिया है।
यानी JPSC की खाली कुर्सी सिर्फ आयोग के प्रशासनिक कामकाज का मामला नहीं है। इसका असर सरकारी भर्तियों और नियुक्तियों की आगे की प्रक्रिया पर भी पड़ रहा है।
मानवाधिकार आयोग में 2022 से संकट
इसके बाद मामला आता है झारखंड राज्य मानवाधिकार आयोग का।
17 सितंबर 2026 को झारखंड हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आयोग 2022 से अध्यक्ष, सदस्यों और पर्याप्त स्टाफ के अभाव में प्रभावी रूप से काम नहीं कर रहा है।
कोर्ट ने राज्य सरकार को अध्यक्ष और सदस्यों की रिक्तियां तीन महीने के भीतर भरने का निर्देश दिया। आयोग को पूरी तरह functional करने के लिए भी समयसीमा तय की गई।
इस मामले में हाईकोर्ट ने आदेश के पालन की जिम्मेदारी मुख्य सचिव पर व्यक्तिगत रूप से डाली है।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मानवाधिकार आयोग आम लोगों की शिकायतों और अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली वैधानिक संस्था है। ऐसे में शीर्ष पदों का लंबे समय तक खाली रहना सीधे उसके कामकाज से जुड़ जाता है।
सूचना आयोग में आयुक्त आए, लेकिन CIC का इंतजार
Jharkhand राज्य सूचना आयोग की स्थिति थोड़ी अलग है।
यहां सूचना आयुक्तों की नियुक्ति हो चुकी है, लेकिन मुख्य सूचना आयुक्त यानी CIC की नियुक्ति का मामला लंबे समय तक लंबित रहा।
20 अगस्त 2026 के हाईकोर्ट रिकॉर्ड में भी CIC की नियुक्ति अंतिम रूप से नहीं होने की बात दर्ज है। राज्य सरकार की ओर से प्रक्रिया चलने की जानकारी दी गई थी।
इससे पहले 28 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के सामने झारखंड की स्थिति रखी गई थी। कोर्ट को बताया गया कि चार सूचना आयुक्त नियुक्त किए जा चुके हैं और CIC समेत तीन और नियुक्तियां बाकी हैं।
इसलिए सूचना आयोग को पूरी तरह खाली कहना सही नहीं होगा। यहां असली सवाल मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति का है।
महिला आयोग में छह साल से नई टीम का इंतजार
महिलाओं की शिकायतों और अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाला झारखंड राज्य महिला आयोग भी लंबे समय से नियुक्ति का इंतजार कर रहा है।
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन अध्यक्ष कल्याणी शरण और उनकी पांच सदस्यीय टीम का कार्यकाल 6 जून 2020 को समाप्त हुआ था। इसके बाद नई अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं हो सकी।
जून 2026 की रिपोर्ट में आयोग के पास 5,200 से ज्यादा मामले लंबित होने की बात सामने आई थी। रिपोर्ट के मुताबिक अध्यक्ष और सदस्यों की गैरमौजूदगी का असर शिकायतों की नियमित सुनवाई पर पड़ा।
यहां एक बात ध्यान देने वाली है। 5,200 से अधिक मामलों का आंकड़ा जून 2026 की रिपोर्ट का है। इसे सितंबर 2026 की वर्तमान लंबित मामलों की संख्या के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
फिर भी इतना साफ है कि महिला आयोग की नियुक्ति का मामला लंबे समय से लंबित है और इसका असर आयोग के नियमित कामकाज पर पड़ा है।
बाल संरक्षण से जुड़े संस्थानों में भी नियुक्तियों की जरूरत
महिला और मानवाधिकार से जुड़े आयोगों के अलावा बाल संरक्षण व्यवस्था में भी नियुक्तियां महत्वपूर्ण हैं।
Juvenile Justice Board यानी JJB और Child Welfare Committee यानी CWC बच्चों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किशोर न्याय, बाल संरक्षण, देखभाल और पुनर्वास जैसे मामलों में इन संस्थाओं की भूमिका होती है।
झारखंड के महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग की ओर से JJB और CWC में रिक्त पदों को भरने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े नोटिफिकेशन जारी किए गए हैं।
हालांकि पुराने सरकारी नोटिफिकेशन में दर्ज रिक्तियों को सितंबर 2026 की वर्तमान संख्या मानना सही नहीं होगा। इसलिए यहां मुख्य बात यह है कि बाल संरक्षण व्यवस्था के अलग-अलग स्तरों पर भी रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया की जरूरत बनी हुई है।
मामला सिर्फ आयोगों तक सीमित नहीं
अगर इन सभी मामलों को एक साथ देखा जाए तो तस्वीर यह बनती है कि झारखंड में कई ऐसी संस्थाएं हैं, जिनका काम सीधे आम लोगों, सरकारी नियुक्तियों और अधिकारों से जुड़ा है, लेकिन उनके शीर्ष पदों पर नियुक्तियां लंबे समय से लंबित रही हैं।
JPSC का असर भर्ती और चयन प्रक्रिया पर पड़ता है।
मानवाधिकार आयोग नागरिकों के अधिकारों से जुड़े मामलों को देखता है।
सूचना आयोग RTI से जुड़ी अपील और शिकायतों की वैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है।
महिला आयोग महिलाओं की शिकायतों और अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए है।
बाल संरक्षण से जुड़े JJB और CWC बच्चों के अधिकार और किशोर न्याय व्यवस्था का हिस्सा हैं।
इसलिए इन संस्थाओं में नियुक्ति का सवाल सिर्फ सरकारी फाइल आगे बढ़ने या रुकने तक सीमित नहीं है। कुर्सी खाली रहने का मतलब कई मामलों में संस्थागत कामकाज का प्रभावित होना भी है।
कई बोर्ड-निगम भी नियुक्तियों का इंतजार कर रहे
यह संकट सिर्फ संवैधानिक और वैधानिक आयोगों तक सीमित नहीं है। राज्य के कई बोर्ड और निगमों में भी अध्यक्ष, सदस्य, प्रबंधकीय या दूसरे महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों का सवाल सामने आता रहा है।
इन बोर्ड और निगमों की जिम्मेदारियां अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी हैं। ऐसे में जहां शीर्ष पद खाली रहते हैं या किसी अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार देकर काम चलाया जाता है, वहां नियमित निर्णय प्रक्रिया और नीतिगत कामकाज को लेकर सवाल उठते हैं।
हालांकि सभी बोर्ड-निगमों की स्थिति एक जैसी नहीं है। इसलिए किसी संस्था को वर्तमान में खाली बताने से पहले उसके ताजा सरकारी नियुक्ति आदेश और आधिकारिक रिकॉर्ड को देखना जरूरी है।
यानी झारखंड में तस्वीर सिर्फ “खाली कुर्सियों” की नहीं है। कई जगह सवाल यह भी है कि महत्वपूर्ण संस्थाओं को नियमित नेतृत्व कब मिलेगा और नियुक्तियों में देरी का असर कब तक जारी रहेगा।
अब निगाह इस बात पर है कि सरकार इन महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया को कितनी जल्दी पूरा करती है और लंबे समय से प्रभावित संस्थाओं को पूरी क्षमता के साथ कब तक सक्रिय किया जा पाता है।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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