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झारखंड में क्यों मनाया जाता है सोहराय? जानिए पशुधन पूजा से लेकर प्रसिद्ध चित्रकला तक की कहानी

झारखंड का पारंपरिक फसल उत्सव सोहराय पशुधन के प्रति सम्मान, प्रकृति से जुड़ाव और हजारीबाग की प्रसिद्ध सोहराय-खोवर चित्रकला के लिए जाना जाता है।

नवम्बर 5, 2026
in झारखंड Jharkhand News, खबर हटके
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Why is Sohrai celebrated in Jharkhand? Discover the story behind it—from the worship of livestock to its renowned traditional art.

Why is Sohrai celebrated in Jharkhand? Discover the story behind it—from the worship of livestock to its renowned traditional art.

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समय: ~11 मिनट•हिंदी बुलेटिन

रांची: झारखंड की पहचान सिर्फ यहां के जंगलों, पहाड़ों और खनिज संपदा तक सीमित नहीं है। यहां की जनजातीय संस्कृति और पारंपरिक त्योहार भी राज्य की अलग पहचान बनाते हैं। ऐसा ही एक प्रमुख पर्व है सोहराय, जिसे फसल उत्सव और पशुधन के त्योहार के रूप में जाना जाता है। इस पर्व में इंसान और प्रकृति के बीच गहरे रिश्ते की झलक देखने को मिलती है। खास बात यह है कि इस दौरान गाय, बैल और अन्य पालतू पशुओं की पूजा की जाती है, जबकि घरों की मिट्टी से बनी दीवारों पर महिलाएं पारंपरिक चित्रकारी कर अपनी कला और संस्कृति को जीवंत करती हैं।

Table of Contents

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  • क्या है सोहराय पर्व और क्यों मनाया जाता है?
  • दिवाली के आसपास मनाया जाता है यह पर्व
  • गाय-बैलों की पूजा और सजावट है खास परंपरा
  • सोहराय चित्रकला: दीवारों पर जीवंत होती है प्रकृति
  • सोहराय और खोवर चित्रकला में क्या है अंतर?
  • महिलाओं की भूमिका से जीवित है यह परंपरा
  • सोहराय पर्व क्यों है झारखंड की खास पहचान?

क्या है सोहराय पर्व और क्यों मनाया जाता है?

सोहराय झारखंड का प्रमुख पारंपरिक फसल उत्सव है। इसे मुख्य रूप से धान की फसल की कटाई और कृषि चक्र से जोड़कर देखा जाता है। खेती-किसानी पर निर्भर रहने वाले ग्रामीण और जनजातीय समाज में पशुधन का विशेष महत्व रहा है। गाय, बैल और भैंस जैसे पशु खेती, परिवहन और ग्रामीण आजीविका का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं।

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इसी महत्व को स्वीकार करते हुए सोहराय पर्व के दौरान पशुओं के प्रति सम्मान और आभार प्रकट किया जाता है। यह त्योहार केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि जीवन, प्रकृति और सामुदायिक एकजुटता का भी प्रतीक है।

झारखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में संथाल, मुंडा, उरांव और सदान सहित कई समुदाय इस पर्व को अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार मनाते हैं। इसकी तिथि और आयोजन की अवधि भी क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

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दिवाली के आसपास मनाया जाता है यह पर्व

सोहराय पर्व सामान्यतः कार्तिक महीने में दिवाली के आसपास या फसल कटाई के बाद मनाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसकी शुरुआत की तारीख गांव के मांझी, पारंपरिक अगुआ और बुजुर्ग मिलकर तय करते हैं।

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कई जगहों पर यह उत्सव तीन दिनों तक चलता है, जबकि कुछ समुदायों और क्षेत्रों में इसकी अवधि पांच दिनों तक भी होती है। इस दौरान पूजा-पाठ, पारंपरिक गीत-संगीत, नृत्य और सामूहिक भोज का आयोजन होता है।

गाय-बैलों की पूजा और सजावट है खास परंपरा

सोहराय पर्व की सबसे खास पहचान पशुधन की पूजा है। इस अवसर पर ग्रामीण अपने मवेशियों को नहलाते हैं और उन्हें सजाते हैं। उनके सींगों पर तेल और सिंदूर लगाया जाता है। कई जगहों पर पशुओं के माथे और शरीर को पारंपरिक तरीके से सजाया जाता है।

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इसके बाद पशुओं की पूजा कर उनके अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है। कुछ स्थानों पर पशुओं को विशेष भोजन भी दिया जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, पशुधन परिवार की खुशहाली और कृषि समृद्धि का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सोहराय के दौरान पशुओं के रहने वाले स्थान यानी गोहाल की भी सफाई और पूजा की जाती है। कई गांवों में ढोल-नगाड़ों की आवाज के बीच पशुओं को खुले मैदान में ले जाया जाता है। वहां पारंपरिक उत्सव और सामुदायिक गतिविधियां होती हैं।

सोहराय चित्रकला: दीवारों पर जीवंत होती है प्रकृति

सोहराय पर्व की एक और खास पहचान यहां की पारंपरिक दीवार चित्रकला है। खासकर हजारीबाग जिले में सोहराय चित्रकला की समृद्ध परंपरा देखने को मिलती है।

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इस कला में महिलाएं घरों की मिट्टी से बनी दीवारों को साफ कर उन पर प्राकृतिक रंगों से चित्र बनाती हैं। इन चित्रों में गाय, बैल, हिरण, हाथी, पक्षी, पेड़-पौधे, फूल और प्रकृति से जुड़े कई प्रतीक दिखाई देते हैं।

इस चित्रकला की खासियत यह है कि इसमें पारंपरिक रूप से स्थानीय मिट्टी और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। लाल, सफेद, काले और पीले रंगों से दीवारों पर आकर्षक आकृतियां बनाई जाती हैं। कई कलाकार उंगलियों, लकड़ी की टहनियों और पारंपरिक उपकरणों की मदद से चित्र तैयार करती हैं।

यह कला केवल घर की सजावट का माध्यम नहीं है, बल्कि इसके जरिए ग्रामीण जीवन, कृषि, पशुधन और प्रकृति के साथ समुदाय के रिश्ते को भी अभिव्यक्त किया जाता है।

सोहराय और खोवर चित्रकला में क्या है अंतर?

अक्सर सोहराय और खोवर चित्रकला को एक साथ लिया जाता है, लेकिन दोनों की अपनी अलग पहचान है।

सोहराय चित्रकला मुख्य रूप से फसल उत्सव और कृषि जीवन से जुड़ी है। इसमें पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों और प्रकृति के चित्र प्रमुखता से बनाए जाते हैं।

वहीं खोवर चित्रकला का संबंध विवाह की परंपराओं से है। इसे पारंपरिक रूप से विवाह के अवसर पर घरों की दीवारों पर बनाया जाता है। इसमें वैवाहिक जीवन, उर्वरता और शुभता से जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल होता है।

दोनों कलाओं में झारखंड की महिलाओं की रचनात्मकता और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत दिखाई देती है।

महिलाओं की भूमिका से जीवित है यह परंपरा

सोहराय पर्व और इससे जुड़ी चित्रकला में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। घरों की सफाई, पारंपरिक चित्रकारी, गीत-संगीत और कई धार्मिक रस्मों में महिलाएं सक्रिय रूप से हिस्सा लेती हैं।

इस कला का ज्ञान अक्सर परिवार की बुजुर्ग महिलाओं से नई पीढ़ी तक पहुंचता है। यही वजह है कि सोहराय चित्रकला केवल एक कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संरक्षित होती आ रही सांस्कृतिक विरासत भी है।

आज इस कला को स्थानीय गांवों से बाहर भी पहचान मिल रही है। सार्वजनिक भवनों, रेलवे स्टेशनों और अन्य स्थानों पर भी सोहराय-खोवर चित्रकला देखने को मिल रही है।

सोहराय पर्व क्यों है झारखंड की खास पहचान?

आज के दौर में जब आधुनिक जीवनशैली के कारण कई पारंपरिक रीति-रिवाज पीछे छूट रहे हैं, तब सोहराय पर्व प्रकृति और पशुधन के प्रति सम्मान का संदेश देता है।

यह पर्व याद दिलाता है कि ग्रामीण जीवन में खेती, पशुधन और प्रकृति एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। साथ ही यह सामुदायिक एकता, पारिवारिक संबंधों और पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने का अवसर भी प्रदान करता है।

यही वजह है कि सोहराय सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक पहचान और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीने की परंपरा का प्रतीक है।

 

खबर मन्त्र एक्सक्लूसिव पड़ताल एवं विश्लेषण
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विशेष संवाददाता | Khabar Mantra

विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।

5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।

वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।

Expertise: Journalism • Digital Media • Ground Reporting • Content & Social Media • Video Production • News Analysis

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