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झारखंड के 25 वर्ष संघर्ष से सत्ता तक, और अब स्थिरता की तलाश में एक राज्य

15 नवंबर 2000 वह दिन, जब भारत के राजनीतिक नक्शे पर एक नया राज्य दर्ज हुआ  झारखंड। बिहार के दक्षिणी हिस्से से अलग हुआ यह प्रदेश सिर्फ एक नया प्रशासनिक ढांचा नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और हक़ की लड़ाई का परिणाम था।

नवम्बर 15, 2025
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Jharkhand News: 15 नवंबर 2000 वह दिन, जब भारत के राजनीतिक नक्शे पर एक नया राज्य दर्ज हुआ  झारखंड। बिहार के दक्षिणी हिस्से से अलग हुआ यह प्रदेश सिर्फ एक नया प्रशासनिक ढांचा नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और हक़ की लड़ाई का परिणाम था। रांची, बोकारो, धनबाद और कोल्हान के जंगलों से लेकर दिल्ली की गलियों तक चली इस जंग में नारे गूंजे हमारा जंगल, हमारी ज़मीन, हमारा राज।

पच्चीस साल बाद, 2025 में जब झारखंड अपने गठन का सिल्वर जंगली वर्ष मना रहा है, तो यह सवाल फिर से उठता है। क्या वह सपना पूरा हुआ जिसके लिए यह राज्य बना था?

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बता दें कि झारखंड की मांग किसी एक दिन या एक आंदोलन का परिणाम नहीं था। इसकी जड़ें बीसवीं सदी की शुरुआत में हैं। यानी 1912 में अलग राज्य मांग की शुरूआत हुई थी, 1912 में जे. बार्थोलोमन ने क्रिश्चियन स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन बनाई, जिसने छोटानागपुर क्षेत्र में शिक्षित आदिवासियों को एकजुट किया। तीन साल बाद इसका नाम बदलकर छोटानागपुर उन्नति समाज रखा गया। यही संगठन आगे चलकर आदिवासी महासभा और फिर झारखंड पार्टी में परिवर्तित हुआ।
1938 में भारतीय हॉकी टीम के पहले कप्तान जयपाल सिंह मुंडा ने जब इस संगठन की बागडोर संभाली, तब उन्होंने पंडित नेहरू नेहरू के सामने इसकी मांग भी रखी लेकिन उसे अनदेखा कर दिया गया। इसके बावजूद भी यह मांग लगातार जारी रहा और  1972 के दशक में यह आंदोलन एक नई दिशा में बढ़ा। जब विनोद बिहारी महतो ने  झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की, और शिबू सोरेन को पार्टी का महासचिव बनाया। जिसके बाद शिबू सोरेन ने आदिवासियों और स्थानीय लोगों को एक जुट कर संगठन को मजबूत  किया। 1980 और 90 के दशक में आंदोलन तेज़ हुआ। रांची, धनबाद और बोकारो में रैलियां, बंद और धरने आम हो गए। और आखिरकार, अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने 15 नवंबर 2000 को बिरसा मुंडा की जयंती पर झारखंड को अलग राज्य बनाया। आज झारखंड भारत का 28वां राज्य है।

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जब झारखंड अलग हुआ तो एक तरफ राज्य बनने की खुशी तो थी, लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं थीं। प्रशासनिक ढांचा, राजधानी का स्वरूप, भाषा नीति, स्थानीय नीति  हर सवाल पर टकराव था।
बाबूलाल मरांडी को झारखंड का पहला मुख्यमंत्री बनाया गया। भाजपा के नेतृत्व में बनी इस सरकार से लोगों को उम्मीद थी कि अब झारखंड विकास का मॉडल बनेगा।
लेकिन जल्द ही डोमिसाइल पॉलिसी पर विवाद भड़क उठा। स्थानीय युवाओं को आरक्षण और नौकरियों में प्राथमिकता देने की मांग तेज़ हो गई। इस विवाद ने मरांडी सरकार को कमजोर कर दिया। 2003 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया और अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने।
2005 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने कांग्रेस और राजद के साथ मिलकर सरकार बनाई, लेकिन गवर्नर ने पहले शिबू सोरेन को सरकार बनाने का न्योता दिया। उनकी सरकार बहुमत साबित नहीं कर पाई और कुछ ही दिनों में गिर गई। इसके बाद अर्जुन मुंडा दोबारा सत्ता में आए। 2006 में जब मधु कोड़ा, एक निर्दलीय विधायक, मुख्यमंत्री बने, तो देश की राजनीति में यह एक मिसाल थी। हालांकि उनकी सरकार पर लगे भ्रष्टाचार और खनन घोटाले के आरोपों ने झारखंड की छवि को धूमिल किया। देखा जाए तो झारखंड की राजनीति शुरू से ही अस्थिरता से घिरी रही है। 25 सालों में अब तक 14 मुख्यमंत्री बन चुके हैं

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2008 में फिर से शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने, लेकिन तमाड़ विधानसभा सीट से चुनाव हारने के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। जिसके बाद  2009 से 2013 तक मुख्यमंत्री पद की बागडोर शिबू सोरेन, अर्जुन मुंडा और हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकार चली लेकिन गठबंधन खींचतान में उलझी रही। 2014 में हुए चुनाव झारखंड की राजनीति के लिए निर्णायक साबित हुए। भाजपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत पाया और रघुबर दास राज्य के पहले गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बने।
रघुबर सरकार ने औद्योगिक निवेश और सड़क निर्माण को प्राथमिकता दी। लेकिन स्थानीय नीति, भूमि अधिग्रहण और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर असंतोष गहराता गया। जिसके बाद 2019 में जनता ने भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया। झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राजद के महागठबंधन ने बहुमत हासिल किया और हेमंत सोरेन दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन 31 जनवरी 2024 में राज्य की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल में फंस गई।
ईडी ने जमीन घोटाले के मामले में हेमंत सोरेन को गिरफ्तार किया। अचानक मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली हो गई। इस संकट के बीच चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया गया। वे संगठन के पुराने नेता थे और इस कठिन समय में पार्टी को संभालने की जिम्मेदारी दी गई। इसी बीच जुलाई 2024 में हेमंत सोरेन जमानत पर रिहा हुए और चंपई सोरेन ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। हेमंत ने तीसरी बार शपथ ली, लेकिन कुछ ही हफ्तों में चंपई ने भाजपा का दामन थाम लिया, इसी बीच 2024 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर झारखंड में इंडिया गठबंधन की जीत हुई और हेमंत सोरेन ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वर्तमान में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकार चल रही है।

देखा जाए तो झारखंड को भारत का मिनरल हब कहा जाता है। देश के कुल कोयला भंडार का 27 प्रतिशत, लौह अयस्क का 22 प्रतिशत, बॉक्साइट का 11 प्रतिशत और यूरेनियम का 100 प्रतिशत से अधिक हिस्सा यहीं है।
फिर भी यह राज्य गरीबी और पलायन की मार झेल रहा है। ग्रामीण इलाकों में आज भी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं कमजोर हैं। रांची, धनबाद, जमशेदपुर जैसे शहरों में उद्योगों का जाल तो है, लेकिन आदिवासी इलाकों में विकास की रफ्तार धीमी है। 2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड की 26 प्रतिशत आबादी शहरी और 74 प्रतिशत ग्रामीण है। राज्य का औसत साक्षरता दर 67 प्रतिशत है, जबकि महिला साक्षरता दर केवल 56 प्रतिशत के आसपास है। हर साल हजारों युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और पुणे की ओर पलायन करते हैं। राज्य की खनिज संपदा के बावजूद औद्योगिक लाभ स्थानीय जनता तक नहीं पहुंच पा रहे।

खबर मन्त्र एक्सक्लूसिव पड़ताल एवं विश्लेषण
Exclusive

2025 में जब झारखंड अपने 25 साल पूरे कर रहा है, तो राज्य के सामने दो बड़ी चुनौतियाँ हैं । पहला पलायन और दूसरा स्वास्थ्य। राज्य की सत्ता का केंद्र अभी भी खनिज और ज़मीन के इर्द-गिर्द घूमता है। आदिवासी और गैर-आदिवासी राजनीति के बीच संतुलन बनाए रखना हर सरकार के लिए चुनौती रहा है। हेमंत सोरेन सरकार अब स्थिरता से सरकार चला रहे है।

खबर मन्त्र विशेष वीडियो रिपोर्ट
Exclusive Report

लेकिन देखा जाए तो अलग राज्य की मांग से लेकर अब तक का सफर संघर्ष, अस्थिरता और पुनर्निर्माण की कहानी कह रहा है।

Ayushika Verma
Ayushika Verma

संवाददाता, खबर मन्त्र। रांची और आसपास के ग्रामीण अंचलों की नागरिक समस्याएं, मौसम, सड़क हादसे और स्थानीय हलचल की ग्राउंड रिपोर्टिंग।

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