झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर और आदिवासी समाज के लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण है. हटिया के निवासी और लोकसंगीत के जीवंत प्रतीक महावीर नायक को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है. यह सम्मान न केवल उनकी जीवन भर की मेहनत का फल है, बल्कि झारखंड की पारंपरिक विरासत और आदिवासी-मूलवासी समाज के लिए भी एक गर्व का क्षण है.
महावीर नायक: एक नाम, जो लोकसंगीत की आत्मा बन गया
महावीर नायक पिछले चार दशकों से झारखंड की पारंपरिक लोकसंस्कृति को संजोने, संवारने और उसे विश्वपटल पर ले जाने के कार्य में लगे रहे हैं. वे खासतौर पर नगाड़ा, मांदर, बांसुरी, और पारंपरिक लोकगीतों के माध्यम से आदिवासी संस्कृति को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं.
उनके गीतों में झारखंड की मिट्टी की महक है, और आवाज़ में उस समाज की पुकार, जिसे अक्सर अनसुना कर दिया जाता है.
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पद्मश्री सम्मान: एक कलाकार का सपना
महावीर नायक को भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान – पद्मश्री से सम्मानित किया जाना, केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं है. यह उस समृद्ध लोक परंपरा और कला को मान्यता देने जैसा है, जिसे आधुनिकता की दौड़ में अक्सर भुला दिया जाता है.
यह सम्मान झारखंड के हर उस कलाकार के लिए प्रेरणा है, जो संसाधनों की कमी के बावजूद अपनी कला को जीवित रखे हुए हैं.
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झारखंड की कला को राष्ट्रीय मंच पर पहचान
महावीर नायक के प्रयासों से झारखंड की लोक विधाएं जैसे – झूमर, डोमकच, पाइका, और सद्दानी जैसे पारंपरिक गीत-दृश्यों को राष्ट्रीय मंच मिला है. उनके नेतृत्व में स्थानीय कलाकारों को भी स्वर और मंच मिला, और आज वे कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुति दे रहे हैं.
महावीर नायक ने क्या कहा?
सम्मान मिलने के बाद महावीर नायक ने कहा कि यह पुरस्कार मेरे अकेले का नहीं, पूरे झारखंड और आदिवासी समाज का है. मैं चाहता हूँ कि हमारी लोकसंस्कृति यूँ ही जिए और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़े.












