Who is Babulal Marandi : बाबूलाल मरांडी यानि कि बीजेपी का सबसे बड़ा आदिवासी चेहरा। बाबूलाल नाम आज के समय में पहचान की मोेहताज नहीं है। यह नाम बस एक नाम नहीं बल्कि झारखंड की राजनीति का सबसे बड़ा नाम है। एक साधारण से किसान परिवार से निकलकर झारखंड के साथ-साथ देश की राजनीति में एक आदिवासी नेता का पहुंचना महज एक मुकाम नहीं बल्कि सालों की मेहनत है। आज बाबूलाल की पहचान झारखंड ही नहीं देश के सबसे बड़े आदिवासी नेता के रुप में होती है।
Who is babulal Marandi : एक शिक्षक से जननायक बनने का सफर
बाबूलाल मरांडी का जन्म गिरिडीह के कोदाईबांक गाँव में 11 जनवरी 1958 को एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। बाबूलाल के पिता का नाम छोटे लाल मराण्डी और माता का नाम मीना मुर्मू है। शुरुआत से ही उनका सफर काफी संघर्षपूर्ण रहा। काफी कठिनाइंयों से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। जिसके बाद उऩ्होंने रांची विश्वविद्यालय से भूगोल विषय में स्नातकोत्तर किया।
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कॉलेज के दिनों में ही बाबूलाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ गए थे। पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्होंने गांव में ही एक स्कूल में शिक्षक के रुप में कार्य किया। जिसके बाद 1983 में बाबूलाल दुमका जाकर सन्थाल परगना डिवीजन में काम करने लगे। इसी दौरान इनकी शादी 1989 में शान्ति देवी से हुई। इस शादी से बाबूलाल को एक बेटा भी हुआ जिसका नाम अनूप मरांडी था। हालांकि 27 अक्टूबर 2007 को गिरिडीह में ही एक नक्सली हमले में उनके बेटे की मौत हो गई।
उनकी राजनीति की नींव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और विश्व हिंदू परिषद के साथ जुड़ी। वे संघ के समर्पित प्रचारक रहे और संताल परगना क्षेत्र में उन्होंने आदिवासियों के बीच काफी समय बिताया। यहीं से उनकी सांगठनिक क्षमता और जनता से जुड़ाव की कहानी शुरू हुई।
Who is babulal Marandi : 1991 में पहली बार चुनाव में रखा कदम
90 के दशक में जब अलग झारखंड राज्य की मांग जोर पकड़ने लगे इसी दौरान मरांडी बीजेपी के एक प्रमुख आदिवासी चेहरे के रुप में उभरकर बाहर निकले। उनका शांत स्वभाव और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की काबिलियत के बदौलत ही बीजेपी नेै पहली बार 1991 में दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़े। हालांकि पहली ही चुनाव में उनको दिशोम गुरु शिबू सोरेन के हाथों हार का सामना करना पड़ा।
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हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी और लड़ते रहे। इसी का नतीजा था कि 1998 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने दिशोम गुरु शिबू सोरेन को हराकर दिल्ली पहुंचे। इसके तोहफे के रुप में उन्हें केन्द्र की वाजपेयी सरकार में केन्द्रीय मंत्री बनाए गए।
Who is babulal Marandi : झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बनने का गौरव
15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बनने के बाद बीजेपी सत्ता में आई। बीजेपी की केन्द्रीय नेतृत्व ने उस समय बाबूलाल पर भरोसा जताते हुए झारखंड का पहला मुख्यमंत्री बनाया। मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने सड़कों का जाल बिछाने और डोमिसाइल नीति (स्थानीयता) जैसे साहसिक फैसलों के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई। हालांकि, गठबंधन की राजनीति और आंतरिक कलह के कारण उन्हें 2003 में कुर्सी छोड़नी पड़ी।
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जेवीएम का गठन और फिर घर वापसी
हालांकि बीजेपी में अंतर्कलह शुरु हो गई। जिसके बाद बाबूलाल ने बीजेपी से दूरियां बना ली और फिर साल 2006 में उन्होंने झारखंड विकास मोर्चा (JVM) का गठन किया। उस वक्त बाबूलाल की जेवीएम के साथ कई बड़े नेता भी जुड़े। उस समय जेवीएम की धमक झारखंड की राजनीति में बीजेपी और जेएमएम के बाद तीसरे बड़ी पार्टी के रुप में होता था। इसी दौरान साल 2007 में उस वक्त उनके जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा जब गिरिडीह के चिलखारी में हुए एक नक्सली हमले में उनके बेटे अनूप मरांडी की मौत हो गई। हालांकि इसके बाद भी वे रुके नहीं और राजनीतिक सफर में चलते रहे।
हालांकि जेवीएम भी ज्यादा दिन नहीं चली। पार्टी में टूट और एक के बाद एक बड़े नेताओं का पार्टी छोड़कर दूसरे पार्टी में शामिल होने के बाद बाबूलाल ने 2020 में जेवीएम का विलय फिर से बीजेपी में करा दिया।
झारखंड भाजपा का सबसे बड़ा ‘आदिवासी चेहरा’
आज झारखंड की राजनीति में बाबूलाल मरांडी की भूमिका विपक्ष के नेता के साथ-साथ रणनीतिकार और अनुभवी वरिष्ठ नेता के रुप में होती है। बीजेपी में अभी भी बाबूलाल मरांडी से बड़ा कोई आदिवासी नेता नहीं है। बाबूलाल लगातार हेमंत सरकार की कार्यशौलियों पर सवाल उठाते रहे हैं।
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विपक्ष की मुखर आवाज: वे हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर सबसे आक्रामक नेता बनकर उभरे हैं।
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आदिवासी वोटों का ध्रुवीकरण: भाजपा के लिए वे सबसे बड़े ट्रम्प कार्ड हैं, जो संताल परगना और अन्य आदिवासी बेल्ट में पार्टी की पकड़ मजबूत करने का काम कर रहे हैं।
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मार्गदर्शक की भूमिका: एक पुराने योद्धा होने के नाते, वे भाजपा के युवा कार्यकर्ताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं और आगामी चुनावों में पार्टी का नेतृत्व करने वाली सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
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मरांडी का प्रभाव क्यों महत्वपूर्ण है?
बाबूलाल मरांडी की पहचान झारखंड की राजनीति में सबसे साफ सुथरी छवि वाले नेता के रुप में होती है। उनकी सादगी ऐसी है कि आज भी वे गाँव-गाँव जाकर लोगों से सीधे तौर पर जुड़ते हैं। हालांकि फिर से बीजेपी में वापसी के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के पुराने नेताओं को एक जगह पर साथ रखने और फिर बीजेपी को फिर से सत्ता दिलाने में मदद करने की होगी।












