Ranchi: झारखंड में बच्चों का घर से बाहर निकलना अब सामान्य बात नहीं रह गई है। स्कूल जाने या खेलने निकले बच्चों के सुरक्षित लौटने को लेकर माता-पिता के मन में एक अनकहा डर बैठता जा रहा है। शाम ढलते ही कई घरों में मां दरवाज़े पर खड़ी होकर हर आहट को सुनती है, यह सोचते हुए कि कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया। बीते कुछ वर्षों में राज्य के अलग-अलग इलाकों से बच्चों के लापता होने की घटनाएं इस चिंता को और गहरा करती हैं।
धुर्वा से लापता अंश-अंशिका: एक केस जिसने पूरे राज्य को चौंकाया
राजधानी रांची के धुर्वा थाना क्षेत्र से चार वर्षीय अंश कुमार और उसकी बहन अंशिका कुमारी के अचानक लापता होने की घटना ने पूरे झारखंड का ध्यान अपनी ओर खींचा। यह मामला सिर्फ एक परिवार की चिंता नहीं रहा, बल्कि इसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर मौजूदा व्यवस्था कितनी सतर्क है। राहत की बात यह रही कि रांची पुलिस ने दोनों मासूमों को सुरक्षित बरामद कर लिया और इसी दौरान एक संगठित बच्चा चोरी गिरोह का भी खुलासा हुआ।
आंकड़े जो बेचैन करते हैं: हर साल सैकड़ों बच्चे गायब
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि झारखंड में बच्चों के लापता होने की समस्या लंबे समय से मौजूद है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और राज्य सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014 से 2018 के बीच राज्य में 4,546 बच्चे लापता हुए, जिनमें से बड़ी संख्या आज भी अपने घर नहीं लौट पाई है। वहीं 2015 से 2025 के बीच 4,000 से अधिक बच्चों के गायब होने की जानकारी सामने आई है। ये आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह समस्या किसी एक जिले या एक साल तक सीमित नहीं है।
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गुलगुलिया गैंग का खुलासा: भरोसे की आड़ में बच्चों का जाल
अंश और अंशिका की बरामदगी के दौरान रांची पुलिस ने जिस गुलगुलिया गैंग का पर्दाफाश किया, उसने बच्चा चोरी के तरीके को उजागर कर दिया। पुलिस जांच में सामने आया कि यह गिरोह कई वर्षों से सक्रिय था और सामाजिक भरोसे का फायदा उठाकर बच्चों को अपने साथ ले जाता था। महिलाओं की भूमिका इस गिरोह में अहम थी, जिससे आम लोगों को शक नहीं होता था। बच्चों को भीड़भाड़ वाले इलाकों से बहलाकर ले जाया जाता और फिर उन्हें दूसरे जिलों या राज्यों में पहुंचा दिया जाता था।
क्यों निशाने पर रहते हैं गरीब और असुरक्षित परिवारों के बच्चे
जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह उन इलाकों को प्राथमिकता देता था, जहां आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा ज्यादा थी। झुग्गी-बस्तियों, आदिवासी गांवों और मजदूर परिवारों के बच्चे इनके लिए आसान शिकार बनते थे। कामकाज में व्यस्त माता-पिता और बच्चों की सीमित निगरानी इस खतरे को और बढ़ा देती थी। इसी वजह से कई मामलों में बच्चों के लापता होने का पता देर से चलता है।
पुलिस की सक्रियता से मिली राहत, कई मामलों में सफलता
हाल के मामलों में पुलिस की भूमिका पूरी तरह निष्क्रिय नहीं रही है। धुर्वा केस में त्वरित कार्रवाई के अलावा 61 दिनों से लापता 12 वर्षीय कन्हैया कुमार को कोडरमा से सकुशल बरामद किया जाना पुलिस की लगातार कोशिशों का नतीजा माना जा रहा है। इन मामलों में विशेष जांच टीम (SIT) और विभिन्न जिलों की पुलिस के बीच समन्वय ने अहम भूमिका निभाई।
बरामद बच्चों के लिए आगे की प्रक्रिया और चुनौती
फिलहाल बरामद किए गए बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर रखा गया है। उनके असली परिजनों की पहचान के लिए पुलिस, CID, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और केंद्र सरकार की वात्सल्य वेबसाइट की मदद ली जा रही है। जरूरत पड़ने पर डीएनए जांच की प्रक्रिया भी अपनाई जाएगी, ताकि बच्चों को सही परिवार तक पहुंचाया जा सके।
आगे की राह: चिंता के साथ उम्मीद भी
बच्चों के लापता होने की घटनाएं भले ही चिंता बढ़ाती हों, लेकिन हालिया मामलों में पुलिस की सक्रियता यह संकेत भी देती है कि सही दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इसी तरह निगरानी और समन्वय को और मजबूत किया जाए, तो इस समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।
आज भले ही कुछ बच्चे सुरक्षित लौट आए हों, लेकिन राज्य में अब भी कई परिवार अपने बच्चों की राह देख रहे हैं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या आने वाले समय में झारखंड बच्चों के लिए और ज्यादा सुरक्षित बन पाएगा?

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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