Diwali 2026: दिवाली का नाम सुनते ही मन में दीयों की रोशनी, मिठाइयों की खुशबू, मां लक्ष्मी की पूजा और परिवार के साथ खुशियां मनाने की तस्वीर उभरने लगती है। आमतौर पर कहा जाता है कि दिवाली पांच दिनों का त्योहार है, जिसकी शुरुआत धनतेरस से होती है और समापन भाई दूज पर होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दिवाली हमेशा पांच दिन की ही होती है? क्या इन पांच दिनों के सभी पर्व हर साल लगातार पांच तारीखों पर पड़ते हैं? इसका जवाब थोड़ा दिलचस्प है। परंपरागत रूप से दिवाली पांच प्रमुख पर्वों का उत्सव है, लेकिन चंद्र कैलेंडर की तिथियों और अलग-अलग क्षेत्रीय परंपराओं के कारण इसका कार्यक्रम हर साल एक जैसा नहीं रहता।
क्या दिवाली हमेशा पांच दिनों तक मनाई जाती है?
दिवाली को सामान्य रूप से पांच दिनों का त्योहार माना जाता है। इन पांच दिनों में धनतेरस, नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली, मुख्य दिवाली और लक्ष्मी पूजा, गोवर्धन पूजा तथा भाई दूज शामिल हैं। हर पर्व का अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर साल ये सभी पर्व लगातार पांच कैलेंडर तारीखों पर ही पड़ेंगे। हिंदू पंचांग चंद्रमा की गति पर आधारित है और तिथियां अंग्रेजी कैलेंडर की तारीखों से पूरी तरह मेल नहीं खातीं। कभी दो प्रमुख पर्व एक ही तारीख पर पड़ सकते हैं, तो कभी तिथियों के निर्धारण के कारण उनके बीच एक दिन का अंतर आ सकता है।
दिवाली के पांच दिनों में क्या होता है?
धनतेरस: शुभ शुरुआत और समृद्धि की कामना
दिवाली उत्सव की शुरुआत आमतौर पर धनतेरस से होती है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी और कुबेर की पूजा की परंपरा है। कई परिवार सोना, चांदी, बर्तन या अन्य उपयोगी वस्तुएं खरीदना शुभ मानते हैं। धनतेरस स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और शुभ शुरुआत की कामना से जुड़ा पर्व है।
नरक चतुर्दशी: छोटी दिवाली का महत्व
नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह दिन भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर पर विजय की कथा से जुड़ा है। इस अवसर पर कई जगह सुबह स्नान, दीपदान और घरों में दीपक जलाने की परंपरा निभाई जाती है। कुछ क्षेत्रों में इसे काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है।
मुख्य दिवाली: मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा
दिवाली का सबसे प्रमुख दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा के लिए जाना जाता है। घरों और दुकानों को दीपों, रंगोली और रोशनी से सजाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। भगवान राम के वनवास से अयोध्या लौटने की कथा भी उत्तर भारत में दिवाली के उत्सव से विशेष रूप से जुड़ी है।
गोवर्धन पूजा: प्रकृति और कृतज्ञता का संदेश
दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा या अन्नकूट का पर्व मनाया जाता है। इसकी परंपरा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा करने की कथा से जुड़ी है। इस दिन कई स्थानों पर अन्नकूट का भोग लगाया जाता है और प्रकृति, अन्न तथा पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
भाई दूज: भाई-बहन के रिश्ते का पर्व
भाई दूज दिवाली उत्सव के प्रमुख पर्वों में शामिल है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के सुखी और स्वस्थ जीवन की कामना करती हैं तथा तिलक लगाती हैं। भाई-बहन के प्रेम और पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने वाला यह त्योहार कई क्षेत्रों में भैया दूज, भाऊ बीज या अन्य स्थानीय नामों से मनाया जाता है।
दिवाली 2026 में पांच दिनों का क्रम क्यों खास है?
साल 2026 में दिवाली के प्रमुख पर्व सामान्य पांच-दिवसीय क्रम की तुलना में अलग-अलग तारीखों पर दिखाई देते हैं। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार, मुख्य दिवाली 8 नवंबर 2026 को है। उपलब्ध पंचांग-आधारित कैलेंडरों में धनतेरस 6 नवंबर, गोवर्धन पूजा 10 नवंबर और भाई दूज 11 नवंबर को दर्शाए गए हैं। नरक चतुर्दशी और मुख्य दिवाली से जुड़े अनुष्ठानों का निर्धारण स्थानीय पंचांग और तिथि के नियमों के अनुसार अलग हो सकता है।
इसलिए पांच प्रमुख पर्वों का मतलब हमेशा पांच लगातार कैलेंडर तारीखें नहीं होता। चंद्र तिथि किस समय पड़ रही है, सूर्योदय या प्रदोष काल में उसका क्या स्थान है और संबंधित परंपरा किस नियम का पालन करती है-इन बातों से पर्व की तारीख तय हो सकती है। पूजा की सही तारीख और मुहूर्त के लिए अपने शहर का पंचांग देखना बेहतर है।
क्या कुछ जगह दिवाली पांच दिन से ज्यादा भी चलती है?
हां, कई क्षेत्रों में दिवाली से जुड़े उत्सव पांच प्रमुख दिनों से आगे भी फैल सकते हैं। कुछ परंपराओं में गोवत्स द्वादशी, वसु बारस, काली चौदस, बलिप्रतिपदा और गुजराती नववर्ष जैसे पर्व भी दिवाली के आसपास मनाए जाते हैं। इनके कारण स्थानीय स्तर पर उत्सव की अवधि लंबी दिखाई दे सकती है।
भारत में त्योहारों की परंपराएं एक जैसी नहीं हैं। अलग-अलग राज्यों और समुदायों में पूजा-पद्धति, धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय पंचांग के अनुसार कुछ अंतर मिलते हैं। इसलिए दिवाली को केवल पांच तारीखों तक सीमित करके देखना इसकी व्यापक सांस्कृतिक परंपरा को पूरी तरह नहीं दर्शाता।
पांच दिन परंपरा है, लेकिन तारीखें बदल सकती हैं
दिवाली को पारंपरिक रूप से पांच प्रमुख पर्वों का त्योहार कहा जाता है। लेकिन हर साल इसके सभी पर्व लगातार पांच तारीखों पर पड़ें, यह जरूरी नहीं है। चंद्र पंचांग, तिथियों के संयोग और क्षेत्रीय परंपराओं के कारण कभी उत्सव का क्रम अलग दिखाई दे सकता है और कुछ जगह इससे जुड़े पर्व अधिक दिनों तक मनाए जा सकते हैं। यही भारतीय त्योहारों की खासियत है-परंपरा का मूल भाव बना रहता है, जबकि उसके आयोजन का कैलेंडर बदल सकता है।
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।









