साल 2025: इतिहास जब इस वर्ष को याद करेगा, तो शायद इसे उन वर्षों में शामिल करेगा जिन्हें इंसानियत ने आँसुओं से सींचा है। हादसों की जो लहर इस साल शुरू हुई है, वह थमने का नाम नहीं ले रही. ऐसा लग रहा है मानो हर कोना, हर रास्ता और हर मंज़िल के पीछे मौत घात लगाए बैठी है.
अहमदाबाद का हादसा- जहां चीखों से पूरा आस्मां गूंज उठा
गुजरात के अहमदाबाद शहर में 4 जून 2025 को हुआ भयावह हादसा आज भी लोगों के दिलों में एक दर्दनाक याद बनकर दर्ज है. शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक केमिकल फैक्ट्री में रात करीब 2 बजे हुए विस्फोट ने पूरे इलाके को थर्रा दिया. चंद सेकंड में फैक्ट्री जलकर राख हो गई और साथ ही 29 लोगों की ज़िंदगी भी.
अहमदाबाद का 12 जून विमान हादसा जिसमे 275 लोगों की जान चली गई, एक ऐसी दर्द की लहर उठी जो शब्दों में बयान करना मुश्किल हो गया. आसपास के घरों की खिड़कियां टूट गईं, लोग नींद से चीखते हुए उठे, और घायल मजदूरों की सिसकियां रात के सन्नाटे में गूंजती रहीं. अस्पतालों में भीड़ और शोक में डूबे परिजन—इस हादसे ने केवल जानें नहीं लीं, बल्कि पूरे समुदाय को मानसिक रूप से झकझोर कर रख दिया.
उत्तराखंड में भी हेलीकाप्टर क्रैश ने ली लोगों की जान
9 जून को उत्तराखंड के केदारनाथ मार्ग पर श्रद्धालुओं को ले जा रहा एक हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया. यह हेलिकॉप्टर यात्रा पर निकले सात यात्रियों को ले जा रहा था, जिनमें एक पायलट भी शामिल था. खराब मौसम और तकनीकी खराबी को इसका संभावित कारण माना जा रहा है. हेलिकॉप्टर घाटी में गिरने के बाद पूरी तरह से जलकर खाक हो गया। 15 जून को एक और हेलिकॉप्टर हादसा जिसने 7 लोगों की जान ले ली.
सभी यात्रियों की मौके पर ही मौत हो गई. यह हादसा न केवल एक तकनीकी चूक की ओर इशारा करता है, बल्कि एक बार फिर यह सवाल उठाता है कि क्या तीर्थयात्रियों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रबंध किए जा रहे हैं?
पिता के साथ बेटे का भी सफ़र ख़तम
12 जून की सुबह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से एक ऐसी खबर आई, जिसने पूरे देश को भीतर तक हिला दिया. एक युवक अपने पिता के पार्थिव शरीर को एंबुलेंस में अंतिम संस्कार के लिए ले जा रहा था. लेकिन रास्ते में एक ट्रक से हुई भीषण टक्कर ने बेटे की भी जान ले ली. इस हृदयविदारक हादसे में कुल छह लोगों की जान चली गई—पिता, बेटा और चार अन्य.
यह घटना उस पीड़ा को उजागर करती है, जिसमें न केवल अपनों को खोना शामिल है, बल्कि खोए हुए व्यक्ति के साथ खुद का जीवन भी खत्म हो जाना.
इन हादसों के बाद एक प्रश्न बार-बार हमारे सामने आ खड़ा होता है: क्या आज का आम नागरिक वाकई कहीं सुरक्षित है?
- कारखाने जल रहे हैं
- हेलिकॉप्टर गिर रहे हैं
- एंबुलेंस तक भी सड़क पर महफूज़ नहीं
आम आदमी जो महज एक छोटी यात्रा, एक पूजा, या एक अंतिम संस्कार के लिए निकला था—क्या उसे भी हर मोड़ पर अपनी ज़िंदगी को दांव पर लगाना होगा?
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में सड़क सुरक्षा और औद्योगिक सुरक्षा के नियम तो हैं, लेकिन उनका पालन या तो ढीला है या पूरी तरह से नदारद. हेलिकॉप्टर दुर्घटनाएं, जो अब तक दुर्लभ मानी जाती थीं, अब लगभग हर साल सुनाई देने लगी हैं.
पीड़ित परिवारों को मुआवजे से ज़्यादा ज़रूरत है — सुरक्षा की गारंटी की.
सरकारें, एजेंसियां, और समाज — सभी को अब यह सोचना होगा कि अगर हम एक सभ्य समाज हैं, तो ऐसी त्रासदियों को महज “दुर्घटनाएं” कहकर आगे नहीं बढ़ सकते.
हर हादसे के बाद कुछ पल का शोक, कुछ प्रेस कॉन्फ्रेंस, और फिर सब कुछ सामान्य –इस चक्र को टूटना होगा .
वरना साल 2025 सिर्फ आँकड़ों का नहीं, बेगुनाह मौतों का इतिहास बन जाएगा.












