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Jharkhand Naxal surrender: लाल आतंक से ‘व्हाइट कॉरिडोर’ तक, आखिर कैसे कमजोर हुआ नक्सलियों का गढ़?

Jharkhand Naxal surrender: झारखंड का सारंडा अब लाल आतंक से मुक्त होकर 'व्हाइट कॉरिडोर' में बदल रहा है। जानें वो 5 मुख्य कारण, जिनकी बदौलत सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के इस अभेद्य किले को ध्वस्त कर बड़ी सफलता हासिल की है।

May 20, 2026
in झारखंड
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Jharkhand Naxal Surrender: From 'Red Terror' to the 'White Corridor'—How, exactly, was the Naxalite stronghold weakened?

Jharkhand Naxal Surrender: From 'Red Terror' to the 'White Corridor'—How, exactly, was the Naxalite stronghold weakened?

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Jharkhand: झारखंड का सारंडा जो कभी लाल आतंक के गिरफ्त में था आज के समय में व्हाइट कॉरिडोर में बदल रहा है इसी बीच जवानों को एक बड़ी सफलता कल मिलने वाली है। जहाँ पच्चीस नामी नक्सली आत्मसमर्पण कर मुख्यधार में वापस आने जा रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच हम बात करेंगे उन मुख्य वजह की जिसके कारण आज सारंडा धीरे-धीरे सुरक्षा बलों के लिए सेफ और नक्सलियों के ताबूत का अंतिम किला बन चुका है।

आपको बता दें कि गृह मंत्री अमित शाह ने जब 31 मार्च 2026 का डेडलाइन तय किया था तब अधिकतर लोग इसे मज़ाक समझते थे लेकिन यह हकीकत बनता दिख रहा है। इसका जीता-जागता उदाहरण कल पेश हो जाएगा।

Jharkhand Naxal surrender: ऐसे में जानते हैं वो पाँच वजह जिसके कारण जवानों को सारंडा में सफलता मिल रही है:

1. कैंप का विस्तार:

इस खबर में सबसे महत्वपूर्ण अंश सुरक्षा बलों का सारंडा में विस्तार करना यानि नक्सलियों के ठिकाने में कैंप लगाना वर्तमान समय में यहाँ साठ से अधिक कैंप जवानों के द्वारा लगाया गया है। जिसका नतीजा यह हुआ है कि नक्सलियों तक जरूरत के सामान सही जानकारी नहीं मिल पाती है इसके अलावा जंगल में सर्च अभियान के दौरान जवान आसानी से एक कैंप से दूसरे कैंप तक जरूरत के सामान पहुंचा पाते हैं। साथ ही रात की सन्नाटे मिल पाती है।

2. विकास कार्य:

यह बताया जाता है कि जहाँ-जहाँ सरकारी योजनाओं का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच पाता है, वहाँ नक्सली ग्रामीणों को भ्रमित कर संगठन से जोड़ते हैं, लेकिन जिस प्रकार सारंडा तक विकास की योजनाएं पहुंच रही है, सड़क, बिजली, पानी इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाएं। इस से ग्रामीण सरकार से जुड़ रहे हैं और नक्सलियों से उनकी दूरी बढ़ती जा रही है, जिसका परिणाम यह हो रहा है कि नक्सलियों तक ग्रामीणों का सहयोग नहीं मिल पा रहा है।

3. नेटवर्क का टूटना:

अगर साल 2014 से 2026 के बीच की बात की जाए तो शुरुआत में सुरक्षा बलों को यहाँ काफी मुश्किलें होती थी अधिकतर ग्रामीण नक्सलियों के साथ मिलकर रहते थे। जिसके समय के साथ जब नेटवर्क की जानकारी जवानों को मिली तो जवानों ने कड़ाई से नेटवर्क को तोड़ा जिससे नक्सलवादियों को भारी नुकसान हुआ।

4. शीर्ष नेतृत्व का सफाया:

अगर देखा जाए तो अब तक जितनी भी जानकारी दी गई वो बिल्कुल एक चैन की तरह काम करती गई। शुरुआत के समय में जवानों ने पहले कैम्प का विस्तार किया जिससे नक्सली एक सीमित क्षेत्र पर सीमटते चले गए। उसके बाद विकास कार्य को सारंडा में बढ़ावा दिया गया जिससे स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार से जोड़ा जाने लगा। उसके बाद नक्सलियों के नेटवर्क पर प्रहार किए जाने लगा ताकि नक्सलियों तक जवानों के मूवमेंट की जानकारी न मिल सके उसके बाद नक्सलियों के उन्हीं नेटवर्क का सहारा लेते हुए उन्हें आत्मसमर्पण करने की जानकारी और फायदे दिए गए। साथ ही उन्हें यह भरोसा दिया गया कि अगर वो आत्मसमर्पण करते हैं तो उन्हें और उनके परिवारवालों को सरकारी सुविधा दी जाएगी और अंत में उसी नेटवर्क का फायदा उठाते हुए उनके कई ठिकानों पर कार्रवाई की गई जिसमें कई नक्सलियों को मार गिराया गया।

5. आत्मसमर्पण:  

देखा जाए तो सरेंडर यानी आत्मसमर्पण इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण अंग है क्योंकि कई इंटरव्यू में नक्सलियों को यह भी नहीं पता होता है कि उन्होंने हथियार क्यों उठाया उन्हें यह कह तो दिया जाता है कि जल, जंगल, जमीन बचाना है तो हथियार उठाना होगा कई युवा हथियार उठा भी लेते हैं लेकिन असल में वो जल, जंगल, जमीन की रक्षा नहीं कर पाते हैं या फिर जिस जंगल या क्षेत्र में नक्सली रहते हैं वहाँ के कारोबारियों से वे लोग वसूलने का काम करते हैं और पैसे आगे अपने शीर्ष नेता तक पहुँचाते हैं। इन पैसों को कई रियल इस्टेट और कितने जगह इन्वेस्ट किया जाता है और बदले में उन्हें सरकार की गोलियों का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही उनके कमजोर होने की जानकारियाँ उन्हें दी जाती हैं और इससे पहले भी जानकारियाँ दी गई हैं। इन तमाम कारणों से नक्सली कमजोर होकर मुख्य धारा में आते जा रहे हैं, जिसका नतीजा यह हुआ कि नक्सली संगठन कमजोर होता जा रहा है।

अब चूंकि सारंडा में नक्सलियों का सफाया लगभग हो चुका है, बचे हुए बीस नक्सलियों को जल्द ही मार गिराने की योजना तैयार की जा रही है, तो ऐसे में झारखंड का एक मात्र सारंडा कब तक वाइट कॉरिडोर में तब्दील होता है, यह देखने वाली बात होगी।

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