300 साल पुरानी परंपरा, लेकिन आज भी वही श्रद्धा…
हर साल रांची की ऐतिहासिक जगन्नाथ रथ यात्रा में जब भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का भव्य रथ मंदिर परिसर से निकलता है, तो हजारों श्रद्धालु उसे खींचने के लिए उमड़ पड़ते हैं। रथ यात्रा का यह दृश्य हर किसी को आकर्षित करता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस रथ के पीछे 300 वर्षों से भी अधिक पुरानी एक अनोखी परंपरा जीवित है।
समय के साथ दुनिया बदल गई, तकनीक बदल गई, औज़ार बदल गए, लेकिन रथ बनाने की मूल परंपरा आज भी लगभग उसी रूप में निभाई जाती है।
300 वर्षों से एक ही परिवार निभा रहा है जिम्मेदारी
रांची के जगन्नाथपुर मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां भगवान जगन्नाथ के रथ का निर्माण 300 वर्षों से अधिक समय से लोहरा परिवार करता आ रहा है।
वर्तमान में महावीर लोहरा अपने पुत्रों और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। यह केवल कारीगरी नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही एक धार्मिक सेवा और सांस्कृतिक विरासत है।
हर वर्ष रथ निर्माण शुरू होने से पहले परिवार परंपरागत रीति-रिवाजों का पालन करता है और फिर निर्माण कार्य आरंभ होता है।
300 साल पहले रथ कैसे बनाया जाता था?
करीब तीन शताब्दी पहले रथ निर्माण पूरी तरह हस्तनिर्मित प्रक्रिया थी।
रथ के लिए स्थानीय स्तर पर उपयुक्त लकड़ी का चयन किया जाता था। लकड़ी को हाथ से तराशा जाता, पारंपरिक औज़ारों से उसके अलग-अलग हिस्से तैयार किए जाते और पूरी संरचना बिना आधुनिक मशीनों के बनाई जाती थी।
कारीगरों का अनुभव ही सबसे बड़ी पूंजी होता था। रथ के हर हिस्से में धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक मापदंडों का विशेष ध्यान रखा जाता था।
आज क्या बदल गया है?
आज समय के साथ काम करने के तरीके में कुछ बदलाव जरूर आए हैं।
लकड़ी की कटाई, आकार देने और फिनिशिंग के लिए बेहतर औज़ार उपलब्ध हैं। माप लेने में अधिक सटीकता आई है और निर्माण के दौरान सुरक्षा का भी पहले से अधिक ध्यान रखा जाता है।
हालांकि, आधुनिक उपकरण केवल काम को सुविधाजनक बनाते हैं।
रथ की मूल संरचना, पारंपरिक डिज़ाइन और धार्मिक नियम आज भी पहले जैसे ही बनाए रखते हैं।
क्या आज भी वही डिज़ाइन और नक्काशी बनाई जाती है?
जी हाँ।
रथ की पहचान उसकी पारंपरिक बनावट, अनुपात और धार्मिक स्वरूप से होती है।
लोहरा परिवार आज भी उसी परंपरा के अनुसार रथ तैयार करता है, जिससे उसकी ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान बरकरार रहती है। यही वजह है कि हर वर्ष निकलने वाला रथ अपने पारंपरिक स्वरूप में श्रद्धालुओं के बीच पहुंचता है।
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क्या बदला और क्या नहीं?
जो बदला
- बेहतर औज़ार
- अधिक सटीक माप
- मजबूत फिनिशिंग
- सुरक्षा पर अधिक ध्यान
जो आज भी नहीं बदला
- लोहरा परिवार की परंपरा
- रथ निर्माण की मूल विधि
- पारंपरिक डिज़ाइन
- धार्मिक मान्यताओं का पालन
- श्रद्धा और सेवा का भाव
क्यों खास है यह परंपरा?
भारत में कई स्थानों पर भगवान जगन्नाथ की रथ यात्राएं निकलती हैं, लेकिन रांची के जगन्नाथपुर मंदिर की विशेषता यह है कि यहां एक ही परिवार तीन सौ वर्षों से अधिक समय से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।
यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि झारखंड की जीवित सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है।
रांची के जगन्नाथपुर मंदिर का रथ केवल लकड़ी, पहियों और नक्काशी का ढांचा नहीं है। यह 300 वर्षों की विरासत, पीढ़ियों की कारीगरी और अटूट आस्था का प्रतीक है।
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तकनीक ने काम को आसान जरूर बनाया है, लेकिन रथ निर्माण की आत्मा आज भी वही है जो सदियों पहले थी। यही कारण है कि हर वर्ष रथ यात्रा के दौरान यह परंपरा लाखों श्रद्धालुओं को अपनी संस्कृति और इतिहास से जोड़ती है।








