रांची में रहने वाले कई बुजुर्ग आज भी 6 अगस्त 1990 की उस सुबह को नहीं भूले हैं।
सुबह जैसे ही लोगों को खबर मिली कि नीलांचल पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर का पिछला हिस्सा ढह गया है, पूरे शहर में चिंता की लहर दौड़ गई।
जिस मंदिर में हर साल हजारों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने आते थे…
जिस मंदिर की रथ यात्रा रांची की पहचान मानी जाती थी…
उसी मंदिर को अचानक इस हालत में देखकर लोगों को यकीन ही नहीं हुआ।
लेकिन यह कहानी सिर्फ एक मंदिर के गिरने की नहीं है।
यह कहानी है रांची की आस्था, विरासत और उस जज्बे की, जिसने टूटी हुई दीवारों को फिर से खड़ा कर दिया।
300 साल पुरानी विरासत पर आई सबसे बड़ी चुनौती
जगन्नाथपुर मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है।
यह रांची की पहचान है।
हर साल यहां निकलने वाली भव्य रथ यात्रा झारखंड ही नहीं, बल्कि ओडिशा, बंगाल, बिहार और देश के कई हिस्सों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।
लेकिन 6 अगस्त 1990 को मंदिर के पिछले हिस्से के ढहने की घटना ने पूरे शहर को झकझोर दिया।
लोगों के मन में एक ही सवाल था-
क्या अब यह ऐतिहासिक मंदिर पहले जैसा बन पाएगा?
फिर शुरू हुआ इतिहास को बचाने का मिशन
राज्य के विशेषज्ञों, इंजीनियरों और पारंपरिक कारीगरों ने फैसला लिया कि मंदिर को आधुनिक तरीके से नहीं, बल्कि उसी ऐतिहासिक स्वरूप में दोबारा बनाया जाएगा।
करीब फरवरी 1992 तक पुनर्निर्माण का काम पूरा हुआ।
उस समय इस परियोजना पर लगभग ₹1 करोड़ खर्च किए गए, जो उस दौर के हिसाब से बड़ी राशि थी।
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क्यों खास था यह पुनर्निर्माण?
इसका उद्देश्य केवल टूटी हुई दीवारें खड़ी करना नहीं था।
बल्कि 300 साल पुरानी विरासत को बचाना था।
इसीलिए-
- कलिंग शैली की मूल वास्तुकला को बरकरार रखा गया।
- सुर्खी-चूने से जुड़े प्रस्तर खंडों का उपयोग किया गया।
- कार्निश और शिखर में पारंपरिक पतली ईंटें लगाई गईं।
- मंदिर की ऐतिहासिक पहचान से कोई समझौता नहीं किया गया।
आज भी मंदिर को देखकर शायद ही कोई अंदाजा लगा सके कि यह कभी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुआ था।
आज लाखों लोग आते हैं… लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं यह कहानी
आज जब रथ यात्रा के दौरान नीलांचल पहाड़ी पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है…
तो शायद उनमें से बहुत कम लोगों को पता होता है कि यही मंदिर कभी ढह चुका था।
अगर उस समय इसका संरक्षण नहीं किया जाता…
तो संभव है कि रांची अपनी सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहरों में से एक खो देता।
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यही वजह है कि यह कहानी सिर्फ इतिहास नहीं… एक सीख भी है
कई विरासतें समय के साथ खत्म हो जाती हैं।
लेकिन कुछ विरासतें इसलिए बच जाती हैं…
क्योंकि लोग उन्हें सिर्फ पत्थरों की इमारत नहीं, अपनी पहचान मानते हैं।
जगन्नाथपुर मंदिर उसी पहचान का नाम है।








