रांची/धनबाद: झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों को नक्सल विरोधी अभियान में एक ऐतिहासिक और बहुत बड़ी सफलता हाथ लगी है। प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) संगठन के पोलित ब्यूरो सदस्य और 1 करोड़ रुपये के इनामी शीर्ष नक्सली कमांडर मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर को पुलिस ने एक खुफिया और संयुक्त कार्रवाई के दौरान धर दबोचा।
सुरक्षा सूत्रों से मिली पुष्ट जानकारी के मुताबिक, उसकी गिरफ्तारी धनबाद जिले के मनियाडीह थाना क्षेत्र के पास से हुई है। वह एक टाटा मैजिक गाड़ी पर सवार होकर गिरिडीह की ओर जा रहा था, तभी सुरक्षा बलों ने घेराबंदी कर उसे और उसके सहयोगियों को दबोच लिया।
टाटा मैजिक वाहन से हो रही थी आवाजाही, अन्य संदिग्ध भी हिरासत में
खुफिया इनपुट के आधार पर झारखंड पुलिस और स्थानीय पुलिस ने धनबाद-गिरिडीह सीमा क्षेत्र के पास सघन चेकिंग अभियान चला रखा था। इसी दौरान शक के आधार पर रोकी गई एक टाटा मैजिक गाड़ी से माओवादी सुप्रीमो मिसिर बेसरा को पकड़ा गया।
उसके साथ वाहन में मौजूद अन्य संदिग्धों और सहयोगियों—जिनमें संगठन से जुड़े मोछू, सौरभ उर्फ गौरव तथा कुछ अन्य ग्रामीण शामिल हैं—को भी हिरासत में लिया गया है। फिलहाल सभी से विभिन्न सुरक्षा एजेंसियां और पुलिस के आला अधिकारी किसी गुप्त स्थान पर गहन पूछताछ कर रहे हैं।
दशकों से आतंक का पर्याय था मिसिर बेसरा
मूल रूप से गिरिडीह जिले के पीरटांड़ थाना क्षेत्र (मदनाडीह) का रहने वाला 66 वर्षीय मिसिर बेसरा पिछले तीन दशकों से झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के जंगली इलाकों में नक्सल अभियानों का मुख्य संचालक रहा है।
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उस पर झारखंड, केंद्र सरकार तथा अन्य राज्यों द्वारा कुल 1 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था।
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वह झारखंड में माओवादियों का सबसे बड़ा और अकेला सक्रिय पोलित ब्यूरो स्तर का शीर्ष नेता बचा हुआ था।
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उसके खिलाफ सुरक्षाबलों पर बड़े हमलों, लैंडमाइन ब्लास्ट, हत्या, आगजनी और लेवी वसूलने के दर्जनों गंभीर मामले झारखंड के विभिन्न थानों में दर्ज हैं।
खबर मन्त्र एक्सक्लूसिव पड़ताल एवं विश्लेषणExclusive -
वर्ष 2009 में चाईबासा कोर्ट ले जाने के क्रम में पुलिस हिरासत पर हमला कर उसे विस्फोट के जरिए छुड़ाया गया था, जिसके बाद से वह लगातार कानून की पकड़ से दूर जंगलों में सक्रिय था।
लगातार कमजोर हो रहा था नेटवर्क, सुरक्षाबलों का शिकंजा कसा
पिछले कुछ महीनों से झारखंड के सारंडा, कोल्हान और पारसनाथ के जंगलों में चलाए जा रहे व्यापक नक्सल विरोधी अभियानों (ऑपरेशन बुलबुल और अन्य रणनीतिक घेराबंदी) के कारण नक्सलियों की कमर टूट चुकी थी। सुरक्षा बलों के लगातार दबाव और रोटेशनल अभियानों के चलते उसके दस्ते के कई प्रमुख कमांडर और सदस्य या तो मारे जा चुके थे या फिर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर चुके थे।
जानकारों का मानना है कि संगठन के भीतर रसद (लॉजिस्टिक) की भारी कमी और लगातार मिल रही असफलताओं के बीच मिसिर बेसरा का यूं पकड़ा जाना पूर्वी भारत में माओवादी संगठन के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ है। यह झारखंड पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, जिससे राज्य में नक्सलवाद अब अपने खासे अंत की ओर पहुंच गया है।
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक। झारखंड, बिहार और राष्ट्रीय राजनीति, शिक्षा, प्रशासनिक मामलों और विकास नीतियों पर 10+ वर्षों का जमीनी पत्रकारिता अनुभव। निष्पक्ष और प्रमाणिक समाचार रिपोर्टिंग के लिए समर्पित।








