Independence Day 2026: जमीन के नीचे इतनी दौलत, फिर भी सवाल क्यों?
झारखंड को अक्सर “खनिज राज्य” कहा जाता है, और यह टैग यूं ही नहीं मिला। राज्य का सिंहभूम इलाका देश की सबसे समृद्ध लौह अयस्क पेटियों में गिना जाता है, जहां से देश के कुल लौह भंडार का करीब पांचवां हिस्सा निकलता है। कोयला उत्पादन में झारखंड लंबे समय से देश में अव्वल राज्यों में शुमार रहा है, और झरिया कोकिंग कोल के लिए देश-दुनिया में जाना जाता है। इसके अलावा जादूगोड़ा एशिया की पहली और भारत की सबसे महत्वपूर्ण यूरेनियम खान है, जो देश के परमाणु कार्यक्रम के लिए रणनीतिक रूप से अहम मानी जाती है। तांबा, बॉक्साइट और अभ्रक जैसे खनिजों में भी राज्य की हिस्सेदारी उल्लेखनीय है। राज्य सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक झारखंड अपने गैर-कर राजस्व का करीब 85 फीसदी हिस्सा सिर्फ खनन गतिविधियों से जुटाता है — यह आंकड़ा खुद बताता है कि राज्य की अर्थव्यवस्था इन खदानों पर कितनी निर्भर है।Independence Day 2026: आंकड़ों में झारखंड का योगदान
• कोयला उत्पादन में झारखंड देश के प्रमुख योगदानकर्ता राज्यों में है, और झरिया देश की सबसे पुरानी व बड़ी कोयला पट्टी में गिना जाता है। • लौह अयस्क भंडार के लिहाज से झारखंड देश में अग्रणी राज्यों में शामिल है; पश्चिमी सिंहभूम की खदानें इसका सबसे बड़ा केंद्र हैं। • जादूगोड़ा (पूर्वी सिंहभूम) से निकलने वाला यूरेनियम भारत के परमाणु ऊर्जा और सामरिक कार्यक्रम की रीढ़ माना जाता है। • मिनरल बेयरिंग लैंड सेस से राज्य को मिलने वाला राजस्व लगातार बढ़ रहा है — वित्त वर्ष 2024-25 में यह करीब 1,379 करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में बढ़कर करीब 7,488 करोड़ और 2026-27 में करीब 13,215 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।Independence Day 2026: विकास के पैमाने पर तस्वीर उतनी चमकदार नहीं
यहीं से कहानी में मोड़ आता है। इतनी संपदा देने के बावजूद झारखंड आज भी देश के सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाले राज्यों में गिना जाता रहा है। राज्य के हालिया आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक झारखंड की वास्तविक प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के करीब 60 प्रतिशत तक ही पहुंच पाई है, और यह अनुपात पिछले कई वर्षों से लगभग स्थिर बना हुआ है। यानी राज्य की अर्थव्यवस्था भले ही तेज रफ्तार से बढ़ रही हो, लेकिन देश की बाकी अर्थव्यवस्था से बराबरी की खाई अब भी बनी हुई है। बहुआयामी गरीबी के मोर्चे पर जरूर सुधार दर्ज हुआ है — यह 2015-16 के करीब 42 प्रतिशत से घटकर 2019-21 तक करीब 29 प्रतिशत पर आ गई, जो राष्ट्रीय औसत से भी तेज गिरावट है। लेकिन यह सुधार ज्यादातर बिजली, शौचालय, रसोई गैस और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच बढ़ने से जुड़ा बताया गया है, न कि सीधे खनन क्षेत्रों में औद्योगिक रोजगार या स्थानीय उद्यमिता के विस्तार से। खनन बहुल जिलों — पश्चिमी व पूर्वी सिंहभूम, धनबाद, बोकारो, रामगढ़ जैसे इलाकों — में आज भी विस्थापन, प्रदूषण, भूमि अधिग्रहण के मुआवजे और स्थानीय रोजगार से जुड़ी शिकायतें आम हैं। कोयला खदानों के आसपास बसे कई गांवों में सड़क, अस्पताल और स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी की खबरें लगातार आती रही हैं, जबकि उन्हीं की जमीन के नीचे से निकलने वाला ईंधन दूसरे राज्यों की बिजली फैक्ट्रियां चला रहा है। अब लड़ाई किसकी मुट्ठी में रहेगा राजस्व अधिकार, इस पर खनिज संपदा और स्थानीय विकास के बीच का यह असंतुलन ही अब सीधे राजनीतिक टकराव की शक्ल ले चुका है। संसद से पारित नए खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 में एक नया प्रावधान — सेक्शन 9डी — जोड़ा गया है, जिसके तहत राज्य खनिज-युक्त भूमि पर टैक्स, सेस या अन्य शुल्क तो लगा सकेंगे, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा तय की गई शर्तों और सीमाओं के दायरे में। झारखंड सरकार का कहना है कि इससे राज्य के हाथ से मिनरल बेयरिंग लैंड सेस जैसे राजस्व स्रोत पर उसका पूरा नियंत्रण छिन सकता है — वही सेस, जो अब राज्य के लिए हजारों करोड़ रुपये की कमाई का जरिया बन चुका है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इसे “काला बिल” बता चुके हैं और चेतावनी दे चुके हैं कि अगर केंद्र सरकार ने बिल वापस नहीं लिया तो राज्य में बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाएगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पत्र लिखकर भी राज्य की चिंताएं दर्ज कराई हैं। राज्य सरकार के मंत्रियों और नेताओं का तर्क है कि जब खनिज संपदा का बड़ा हिस्सा झारखंड से निकलता है और राजस्व का बड़ा भाग भी राज्य को ही खनन प्रभावित क्षेत्रों व जनकल्याण योजनाओं पर खर्च करना पड़ता है, तो उस राजस्व पर निर्णय लेने का अधिकार भी राज्य के पास ही होना चाहिए, न कि दिल्ली में तय हो।Independence Day 2026: बड़ा सवाल अब भी वही
झारखंड बनने के 25 साल से ज्यादा हो चुके हैं, राज्य की अर्थव्यवस्था लगातार सात फीसदी से ऊपर की दर से बढ़ रही है, और खनिज राजस्व में भी उछाल दर्ज हो रहा है। लेकिन राष्ट्रीय औसत से आय की खाई पाटने की चुनौती अब भी बरकरार है। मौजूदा MMDR संशोधन विधेयक पर छिड़ा विवाद असल में उसी पुराने सवाल का नया अध्याय है — जिस जमीन से देश की भट्टियां जलती हैं और परमाणु रिएक्टर चलते हैं, वहां के लोगों की जिंदगी में रौशनी कब और कैसे पहुंचेगी, यह तय करने का हक आखिर किसके पास होना चाहिए। यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सरकारी आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्टों, खान मंत्रालय के आंकड़ों और हालिया समाचार रिपोर्टों पर आधारित है।
विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
Expertise: Journalism • Digital Media • Ground Reporting • Content & Social Media • Video Production • News Analysis











