Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary 2026: पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की आज, 16 अगस्त 2026 को 8वीं पुण्यतिथि है। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत देश के कई बड़े नेताओं ने नई दिल्ली स्थित ‘सदैव अटल’ स्मृति स्थल पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। वाजपेयी को याद करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने उनके दूरदर्शी नेतृत्व, राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण और देश सेवा को रेखांकित किया।
भारतीय राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी का सफर सिर्फ एक राजनेता के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता के रूप में दर्ज है, जिसने गठबंधन राजनीति के दौर में सरकार चलाने की नई मिसाल कायम की। 1996 में महज 13 दिन की सरकार से शुरू हुआ उनका प्रधानमंत्री पद का सफर 1999 में पूर्ण पांच वर्षीय कार्यकाल तक पहुंचा।
1996: सबसे बड़ी पार्टी के नेता बने प्रधानमंत्री, लेकिन 13 दिन में देना पड़ा इस्तीफा
1996 के लोकसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। भारतीय जनता पार्टी 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति ने सबसे बड़े दल के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया। वाजपेयी ने 16 मई 1996 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन उनकी सरकार लोकसभा में बहुमत साबित नहीं कर सकी। महज 13 दिन बाद, 1 जून 1996 को उन्हें प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उनके पहले प्रधानमंत्री कार्यकाल की अवधि 16 मई से 1 जून 1996 दर्ज है। उनका सदन में दिया गया भाषण आज भी भारतीय संसदीय राजनीति के चर्चित भाषणों में गिना जाता है।1998: दूसरी बार प्रधानमंत्री बने, एक वोट से गिरी सरकार
1996 के बाद एच.डी. देवगौड़ा और आई.के. गुजराल के नेतृत्व में केंद्र में सरकारें बनीं, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता का दौर जारी रहा 1998 के लोकसभा चुनाव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी एक बार फिर प्रधानमंत्री बने। इस दौरान उनकी सरकार ने पोखरण में परमाणु परीक्षण जैसे बड़े फैसले लिए। प्रधानमंत्री कार्यालय के रिकॉर्ड के अनुसार 1998 में राजस्थान के पोखरण में भारत ने श्रृंखलाबद्ध परमाणु परीक्षण किए। हालांकि गठबंधन सहयोगी जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद अप्रैल 1999 में वाजपेयी सरकार लोकसभा में विश्वास मत के दौरान सिर्फ एक वोट से हार गई। इसके बाद देश में फिर आम चुनाव हुए।1999: तीसरी बार प्रधानमंत्री और पूरा किया पांच साल का कार्यकाल
1999 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA को बहुमत मिला और अटल बिहारी वाजपेयी ने 13 अक्टूबर 1999 को प्रधानमंत्री पद संभाला। इस बार उन्होंने गठबंधन सरकार का पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। उनका कार्यकाल मई 2004 तक चला। इस उपलब्धि के साथ वे पूर्ण पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा करने वाले पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में बुनियादी ढांचे, सड़क संपर्क, दूरसंचार और आर्थिक सुधारों पर खास जोर दिया गया। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यक्रमों ने देश के प्रमुख शहरों को बेहतर सड़क नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।पोखरण से कारगिल तक, बड़े फैसलों का दौर
प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भारत ने कई महत्वपूर्ण घटनाएं देखीं। 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद भारत की रणनीतिक स्थिति पर दुनिया का ध्यान गया। 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान वाजपेयी सरकार ने सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी दौर में भारत-पाकिस्तान संबंधों को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने लाहौर बस यात्रा भी की थी। यानी एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर कड़ा रुख और दूसरी तरफ पड़ोसी देशों के साथ शांति की पहल-वाजपेयी की राजनीति में दोनों पहलू साथ दिखाई देते थे।राजनेता ही नहीं, पत्रकार और कवि भी थे अटल
अटल बिहारी वाजपेयी की पहचान सिर्फ प्रधानमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता तक सीमित नहीं थी। वे एक प्रभावशाली वक्ता, पत्रकार और कवि भी थे। उनकी भाषण शैली में राजनीतिक दृढ़ता के साथ संवेदनशीलता भी दिखाई देती थी। संसद में उनके वक्तव्यों को आज भी भारतीय राजनीतिक भाषणों की मिसाल के तौर पर याद किया जाता है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार वाजपेयी चार दशकों से अधिक समय तक सक्रिय संसदीय राजनीति में रहे। वे नौ बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे।‘अजातशत्रु’ की राजनीति और गठबंधन सरकार की मिसाल
वाजपेयी को अक्सर भारतीय राजनीति का ‘अजातशत्रु’ कहा जाता है। गठबंधन के दौर में अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों को साथ लेकर सरकार चलाना उनके राजनीतिक कौशल की बड़ी मिसाल माना जाता है। उनकी राजनीति में विपक्ष के साथ संवाद और संसदीय मर्यादा को भी महत्व दिया जाता था। यही वजह है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद विभिन्न दलों के नेताओं के बीच उनके प्रति सम्मान देखने को मिलता रहा।भारत रत्न से सम्मानित हुए अटल बिहारी वाजपेयी
अटल बिहारी वाजपेयी को वर्ष 2015 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इससे पहले उन्हें 1992 में पद्म विभूषण और 1994 में सर्वश्रेष्ठ सांसद पुरस्कार सहित कई सम्मान मिले थे। 16 अगस्त 2018 को 93 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ। आज उनकी आठवीं पुण्यतिथि पर देश उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है।‘सदैव अटल’ पर उमड़ा श्रद्धांजलि का सैलाब
अटल बिहारी वाजपेयी की 8वीं पुण्यतिथि पर आज नई दिल्ली के ‘सदैव अटल’ स्मृति स्थल पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला समेत कई नेताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित की। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी लखनऊ में वाजपेयी को श्रद्धांजलि देते हुए उनके सार्वजनिक जीवन, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों में योगदान को याद किया।शून्य से शिखर तक पहुंचने की कहानी
अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक जीवन इस बात की मिसाल है कि राजनीति में लंबा सफर सिर्फ सत्ता हासिल करने से नहीं बनता, बल्कि विचार, संघर्ष, वक्तृत्व, धैर्य और स्वीकार्यता भी इतिहास बनाती है। 13 दिन के प्रधानमंत्री से लेकर एक वोट से सत्ता गंवाने और फिर पांच साल की सरकार पूरी करने तक का उनका सफर भारतीय लोकतंत्र की कई महत्वपूर्ण राजनीतिक परिस्थितियों का गवाह रहा। अटल बिहारी वाजपेयी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी राजनीति, कविताएं, भाषण और लोकतांत्रिक सोच भारतीय सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक याद की जाती रहेगी। ये भी पढ़ें: चरखे से AI, चिट्ठी से स्मार्टफोन, कैश से UPI और जमीन से अंतरिक्ष तक- देखिए आजादी के 79 साल में कैसे बदला भारत
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