Ranchi : झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय CUJ में आयोजित दो-सप्ताहिक आईसीएसएसआर-प्रायोजित क्षमता निर्माण कार्यक्रम (CBP) के सातवें दिन प्रतिभागियों को रांची एवं आसपास के सांस्कृतिक और पर्यावरणीय रूप से महत्त्वपूर्ण स्थलों—विशेष रूप से पतरातू घाटी और हुंडरू फॉल्स के विस्तृत शैक्षणिक भ्रमण (फील्ड विज़िट) का अवसर प्रदान किया गया।
इस शैक्षणिक भ्रमण का उद्देश्य सामाजिक विज्ञान के शोध दृष्टिकोण से प्राकृतिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक संदर्भों का प्रत्यक्ष अवलोकन करवाना था। दिन की शुरुआत पाठ्यक्रम निदेशक प्रो. तपन कुमार बसन्तीआ द्वारा दी गई संक्षिप्त उन्मुखीकरण बैठक से हुई, जिसमें उन्होंने प्रतिभागियों को जिज्ञासा, अनुशासित अवलोकन और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के साथ फील्ड विज़िट में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। NAAC कोऑर्डिनेशन कमिटी के अध्यक्ष प्रो. के. बी. पांडा, शिक्षा विभागाध्यक्ष प्रो. विमल किशोर तथा सह-पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. संहिता सुचरिता भी प्रतिभागियों के साथ रहे और यात्रा को अकादमिक रूप से समृद्ध बनाया। इस कार्यक्रम में पूरे भारत के अलग अलग विश्वविद्यालयों से सहायक प्राध्यापक शोध की उन्नत शिक्षा लेने आए हैं।
पतरातू घाटी की यात्रा ने प्रतिभागियों को यह समझने का मौका दिया कि वहाँ का पर्यटन, प्राकृतिक वातावरण और स्थानीय संस्कृति किस तरह लोगों की ज़िंदगी और रोज़गार को प्रभावित करते हैं। पतरातू डैम में प्रतिभागियों ने नौकायन (Boating) से संबंधित स्थानीय लोगों, नाव चलाने वालों और दुकानदारों से बात की और जाना कि प्राकृतिक संसाधन वहाँ की अर्थव्यवस्था और लोगों के दैनिक जीवन के लिए कितने महत्त्वपूर्ण हैं।
स्थानीय कारीगरों और छोटे दुकानदारों से बातचीत करके प्रतिभागियों ने उस क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपराओं, हस्तशिल्प और पारंपरिक तरीकों के बारे में भी सरल और दिलचस्प जानकारी हासिल की।
इसके बाद समूह हुंडरू फॉल्स पहुँचा, जहाँ प्रतिभागियों ने आसपास की खूबसूरत प्राकृतिक जगह को देखा और पास में रहने वाले अलग–अलग आदिवासी समुदायों के लोगों से बातचीत की। उन्होंने उनकी स्थानीय परंपराओं, पारंपरिक ज्ञान, रोज़ी–रोटी के तरीकों और सामाजिक–सांस्कृतिक जीवन को समझा। प्रतिभागियों ने यह भी जाना कि प्राकृतिक पर्यटन स्थल कैसे स्थानीय पहचान बनाते हैं, लोगों की आजीविका में मदद करते हैं और ईको-टूरिज़्म (eco-tourism) को बढ़ावा देते हैं।
मौसम से जुड़ी कठिनाइयाँ, स्थानीय दुकानदारों की स्थिति और समुदाय की ज़रूरतों को जानना भी इस अनुभव का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा। यह भ्रमण मानवशास्त्रीय (Anthropological) और नृवंशविज्ञान (Ethnographic) अध्ययन को समझने का एक अच्छा मौका था, जिसने दिखाया कि पर्यावरण, संस्कृति और समुदाय किस तरह मिलकर लोगों के जीवन को आकार देते हैं। स्थानीय भोजन का स्वाद लेते हुए प्रतिभागियों ने वहाँ की संस्कृति से अपना जुड़ाव और भी मजबूत महसूस किया।
पूरे दिन प्रतिभागियों ने अवलोकन नोट्स बनाए, अनौपचारिक साक्षात्कार किए, फोटोग्राफी की और समूह-चिंतन सत्रों में भाग लिया। उन्होंने गुणात्मक और मात्रात्मक—दोनों शोध दृष्टिकोणों का उपयोग करते हुए प्राकृतिक और सांस्कृतिक परिवेश को समझने का प्रयास किया। स्थानीय परंपराओं, खान-पान, हस्तशिल्प और सामुदायिक प्रथाओं के प्रत्यक्ष अनुभव ने उन्हें यह समझने में मदद की कि फील्ड संदर्भ किस प्रकार सामाजिक विज्ञान शोध को गहराई और वास्तविकता से जोड़ते हैं।
वापसी के दौरान प्रतिभागियों ने अपने अवलोकन, विचार और शोध से जुड़े उभरते प्रश्न साझा किए। कई प्रतिभागियों ने स्वीकार किया कि इस फील्ड विज़िट ने न केवल उनकी शोध-पद्धति को मजबूत किया, बल्कि उन्हें सिद्धांतों को वास्तविक सामाजिक संदर्भ से जोड़ने की क्षमता भी प्रदान की। दिन का समापन इस अनुभूति के साथ हुआ कि संस्कृति, पर्यावरण और सामुदायिक जीवन के बीच का घनिष्ठ संबंध सामाजिक विज्ञान शोध को वास्तविक आधार प्रदान करता है—और आज का अनुभव इसी का सजीव उदाहरण रहा।

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